अंधेर नगरी चौपट राजा

अंधेर नगरी चौपट राजा
व्यग्ंय बिम्मी शर्मा
DSCN2858एकबार सम्राट अकबर ने मंत्री बीरबल को अपने राज्य में कितने अंधे है, गिनती कर के उनकी संख्या बताने के लिए आदेश दिया । बीरबल को गुस्सा तो बहुत आया पर सम्राट के सामने वह क्या बोलते इसीलिए चुप रह गए । अगले दिन सम्राट अकवर की नजर पड़े ऐसी जगह पर बैठकर जूता पालिस करने लगे । जब अकवर उधर से गुजरे बीरवल को मोची का काम करते देख उन्होंने टोका “बीरवल यह क्या कर रहे हो ?” तब बीरवल अंधो की सूची में सब से उपर सम्राट अकवर का ही नाम लिख दिया । दूसरे दिन अकवर अंधो की सूची में अपना नाम देख कर पहले तो बौखलाए जब पूरी बात समझ में आई तो शर्मिन्दा हुए ।
हमारे देश में भी राज्य संचालन करने वालो कीयही स्थिति है । बस दुखकि बात यही है किकोई अकवर के मंत्रीवीरवलकि तरह चालाखऔर निडर नही है किअपने शहंशाहको आईनादिखा सके । यहां तो बस सभी धृतराष्ट कि तरह पुत्रमोह में अंदर तक फंसे हुंए है । चाटुकार कीभजन मंडली हमेशाअपने शासकों को घेरे रहतीऔर उनकीजीहजूरी कर के हीअपना रोजी रोटी का जुगाड करते हैं । सिर्फ नेताऔर उनकीभजन मंडली हीअंधीनहीं है यहां जनताकाभीवहीहाल है ।
बरसात में जगह–जगह सड़क में गढ्ढे हैं, बारिश के पानी से गढ्ढा भर जाता है । कोई भी सवारी साधन चलते हुए ढुलमुल करने लगता है । पर देश के असल नागरिक इस के लिए सरकार से प्रश्न नहीं करती कि स्तरीय और सुरक्षित सड़क में चलने के उन के अधिकारों से वंिचत क्यों किया जा रहा है ? सड़क पेटी में लोग दुकान और बाजार लगा कर अपना रोजगार जमाते है । पैदल चलने वालों को बचते बचाते निकलना पड़ता है । पर कोई बात नहीं दूसरों के लिए इतना दुख करने से अपना पाप थोड़ा कम हो जाएगा । सभी नागरिक देश से इतना प्यार करते हंै कि सरकार कुछ भी गलत करें कोई विरोध नहीं करते । सरकार का विरोध करने का मतलब देशद्रोही सावित होना है ।
पर तथाकथित देश प्रेम से ओतप्रोत यहां की अवाम प्राण जाए पर वचन न जाए कि तर्ज पर वोट देने के वादअपने अपने कर्तव्य से विमुख हो कर अंधे बन जाते है । आपको दूधवाला, सब्जीवाला और पेट्रोल पंपवाला जितना भी ठगे या लूटे आप ठगाते या लूटाते रहिए । क्योंकि लूटना और ठगना उस का धर्म है और लूटाना और ठगाना हमारा कर्तव्य । क्योंकि हम अंधे युग में जी रहे है । हर महिना या साल में आयात, निर्यात हुए सामानो कें भंसार राजस्व में भंसार कार्यालय सड़क मर्मत के लिएअलग से राजस्व उठाता है । पर सडक की हालत ज्यों की त्यों है । क्योंकि यह अंधायुग है ।
भारत या अन्य देशों से आयात हुए सवारी साधनों मे दो सौ प्रतिशत से ज्यादा राजस्व लिया जाता है पर उन्ही सवारी साधनों को चलने के लिए अति आवश्यक सड़क की हालत दो सौ प्रतिशत खराब है पर कोई कुछ नहीं बोलता । उस बेचारी निर्जीव सड़क की छाती पर असंख्य बुटों के चलने से और लाखों गाड़ियों के रेगंने से कितना छलनी हो गया होगा ? यदि सड़क सजीव होती तो जरुर विलाप करत िऔर अपनें छाती पर बने हुए गढ्ढे और घावों को दिखाती । पर यहां तो सब अंधे और बहरे है देखेगा कौन और सुनेगा कौन ? महाभारत में गांधारी की तरह सबने गलत चीजों पर पट्टी वांध ली है या पर्दा टांग दिया है । जो गलत कामों का विरोध करेगा वही गलत है और बांकी सब सही ।
चारों तरफ बेथीति है, अव्यवस्था है पर किसी को कोई फिक्र नहीं । इस देश में हर वार व्यवस्था परिर्वतन होता आया है पर अवाम की अवस्था कभी नहीं बदलती, बद से बदतर होती जा रही है । इस देश की सरकार खुद ही व्यापार करने में लगी हुई है । पासपोर्ट बनानें मे तीन तरह का शुल्क कायम कर सरकार ने बता दिया कि वह कितना कमीना व्यापारी है । पासपोर्ट एक महिने में बनाने के लिए ५ हजार, एक हप्ते में बनाने के लिए १० हजार और तुरुंत एक ही दिन में जिसको चाहिए वह १५ हजार रुपयां खर्च करे तो बन गया जनाब । सरकार खुद ही तीन तह और वर्ग के नागरिकों का निर्माण कर रही है । पासपोर्ट मे फरक, फरक शुल्क लगा कर व्यापार और नागरिकता में भी अडचन डाल कर राजनीति करनें में सरकार को कोई घिन नहीं आती ।
क्योंकि सरकार को चला ही रहे हैं अंधे और घिनौने इंसान । बाहरी आंख खुली पर मन और विवेक की आंख जहां बंद होती है वहां ऐसे ही अराजकता से हर दिन दो, चार होना पड़ता है । महंगी हर दिन सगरमाथा चूम रही है, जल स्रोत का धनी देश बिजली और पानी का अभाव झेल रहा है । शासक धृतराष्ट्र बन कर हरेक दिन नयां नया महाभारत करते हैं । जनता विदुर, विकर्ण और युयुत्सु की तरह चुपचाप सब तमाशा देख रही है । सत्ता में लार काढे शकुनी हर दिन कपट का नयां पाशा फेकंता है । जनता से बिना कारण बताए किसी भी सेवा शुल्क का दाम और कर बढा दिया जाता है । मूर्ख जनता अपनी पसीने की गाढी कमाई को यू जाया होते देख कर भी कुछ नहीं बोलती ।
जब किसी नगर में अंधेरा छा जाता है तब वंहा का चौपट शासक मिठाई और सब्जी का दाम बराबर रख कर नागरिकों को लूटने लगता है । नागरिक भी मिठाई और सब्जी का भाव एक होने पर न तर्क करता है न प्रश्न ही । लगता है शासक और शासित दोनों एक ही थैली के चट्टे, बट्टे हैं । ढील ढाला नियम कानून होने से सियार की तरह चलाक नागरिक उस के छिद्र से अपना उल्लू सीधा करता है । किसी न किसी पार्टी का भजन गाने वाला यह नागरिक अंधभक्त हो कर सरकार का ही साथ देता है आम जनता का नहीं । क्योंकि उसे मालूम है “जनता जाए भांड में उस का सर तो है कडाही में ।”
“अंधेर नगरी चौपट राजा,
टके सेर भाजी, टके सेर खाजा ।”
यह कहावत ऐसे ही नहीं बना है ।

Loading...
%d bloggers like this: