अकथ कहानी प्रेम की

डा. मो. मजीद मिया:कबीर के अध्ययन की समस्याएँ भक्ति संवेदना के, भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन की समस्याएँ भी है – इसी मानसिकता और जिज्ञासा के साथ शुरू होती है प्रो. पुरुषोतम अग्रवाल की कबीर यात्रा । पुस्तक कबीर की कविता और उनके समय पर केन्द्रित है । कबीर के कवि रूप की पहचान और कबीर को कवि न मानने के तर्कों की गहरी पड़ताल उन्होंने की है । खोज कबीर और उसकी कविता की ही नहीं अपने समय और समाज की भी है कबीर के माध्यम से । Athak Khahani ...
भारतीय समाज की जटिल संरचना और बदलते सामाजिक प्रतिमानों के कारण कबीर के अध्ययन की पद्धति में बदलाव आता रहा है कबीर की अध्ययन की पद्धति बहुधा प्रचलित सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों से प्रभावित होती रही है । समाज सुधारक, उपदेशक से लेकर कबीर के समाज विरोधी स्वरूप की व्याख्या समय–समय पर की गई है । हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल है कि क्या कबीर का कोई साहित्यिक महत्व है जिसके आधार पर हम उनका अध्ययन हिन्दी साहित्य में करें । अगर कबीर का मूल कार्य समाज सुधार या उपदेश पर ही केन्द्रित था तो निश्चित रूप से आचार्य शुक्ल नाथों, सिद्धों और जैनों के साहित्य की तरह कबीर को साहित्य में शामिल नही कराते । असल में कबीर को साहित्य के भीतर जगह देने में आलोचकों को कभी असुविधा नहीं हुई किन्तु समस्या कबीर का साहित्यिक स्थान कितना बड़ा है यह तय करने में आती रही ।
कवि कबीर का निर्धारण एक साहित्यिक चुनौती रही है । प्रो. पुरुषोतम की मूल चिंता कवि कबीर की खोज ही है । इस मार्ग में कई समस्याएँ आती है । पहला कबीर या उनके समकालीन रचनाकारों का कविता के प्रति क्या दृष्टिकोण था । दूसरा कबीर का अपनी कविता के प्रति जो दृष्टिकोण था उसको देखने का नजरिया आधुनिक आलोचकों की कैसा रहा और तीसरा महत्वपूर्ण बात है औपनिवेशिक ज्ञानकांड ने कबीर की कविता की कैसी छवि बनाई । प्रो. पुरुषोतम लिखते हैं कि ‘कवि शब्द का जो अर्थ सर्वमान्य था, वह कबीर और उनके जैसे अन्यों को कवि कहलाने में बाधक था । लेकिन कबीर की शब्द–साधना केवल घट–भीतर के सबद–अनहद की ही नहीं, जिसे लोग सब समझते हैं, उस शब्द की, भाषा की भी साधना है, इस बात को भक्ति का लोकवृत समझता और सराहता था । (पृ. ३९७)
इसके साथ पुस्तक में कबीर की कविता का भावोन्मेष, शब्द का संरचनात्मक प्रयोग, रूपशक्ति, पारिभाषिक शब्दावली का पुनः संवेदनात्मक प्रयोग आदि पर विस्तार से चर्चा की गई है जिसकी अपेक्षा कवि कबीर से की जानी चाहिए ।
कबीर के अध्ययन की सबसे बड़ी बाधा है चेतना का उपनिवेशिकरण । इस प्रक्रिया में दो रोचक अतिवादों का जिक्र पुस्तक में किया गया है । कुछ लोगों को लगता है कि अँग्रेजी राज की स्थापना के पहले का भारत धरा पर स्वर्ग समान था । दूसरा अतिवाद है अँग्रेजी राज आया तो मुक्ति आई । दोनों अतिवादों के खतरे एक समान हैं । पुरुषोतम अग्रवाल लिखते हैं परस्पर विरोधी दिखने वाले ये मूल्यांकन असल में एक ही जमीन पर खड़े हैं । वह जमीन है – भारतीय समाज को औपनिवेशिक ज्ञानकांड के चश्मे से देखने की जमीन । इसका परिणाम हमेशा एक ही होता है किसी और के द्वारा निर्धारित प्रश्नों के तार्किक उत्तर ढूँढने में अपनी सारी ऊर्जा लगा देना । परिणाम होता है हिन्दी साहित्य का अध्येता कबीर में भारतीय–अभारतीय, कबीर की उलट बासी उनका हठयोग, नाथों, सिद्धों का प्रभाव जैसे प्रश्नों के आलोक में उनका मूल्यांकन करने में सुविधाजनक महसूस करता है । कबीर के समय और समाज, प्रकारांतर से अपने समय के विरोधाभाषों, उसके सांस्कृतिक रूपकों को समझने के लिए आवश्यक है कि कबीर के समय को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझा जाए । इसलिए कबीर एवं कबीर पंथ से संबन्धित सभी महत्वपूर्ण अध्ययनों से लेखक ने जिक्र किया है ।
यह जानना रोचक है कि कबीर के अध्ययन पर औपनिवेशिक प्रभाव के कारण कैसे–कैसे निष्कर्ष निकाले गए है । इस अध्ययन से औपनिवेशिक सोच की परतें भी उदघाटित होती है । पुरुषोतम अग्रवाल प्रश्न उठाते हैं कि कबीर का समय ‘मध्यकालीन’ है या यह औपनिवेशिक ज्ञानकांड की निर्मित हैं । पुस्तक में औपनिवेशिक ज्ञानकांड द्वारा निर्मित कई मिथकों का जिक्र किया गया है जिसे अपनी सुविधा के लिए गढ़ा गया है । उन्होने यह प्रमाणित किया है कि कबीर मध्यकालीन कवि नहीं वरन ‘आरंभिक देशज आधुनिकता’ के कवि हैं । यहाँ आधुनिकता की अवधारणा पर विस्तार से विचार किया गया है । पुस्रुतक में प्रस्रुरुतावित रुदेशज आधुनिकतारु की अवधाररुणा को विमर्श के दायररुे में लाया जाए तो हिन्दी साहित्य के इतिहास औरुररु काल विभाजन पररु नई ररुोशनी पद सकती हैरुरु। औरुपनिवेशिक ज्ञानकांड से तार्किक विमर्श पुस्रुरुतक की विशेषता हैरुरु। हिन्दी साहित्य के अध्येताओं के लिए यह इस मायने में भी खास हैरु कि पूररुी दुनिया में हो ररुहे कबीररु संबंधी सभी महत्वपूर्ण अध्ययनों की जानकाररुी एक स्रुरुथान पररु उपलब्ध कररुाई गई हैरुरु।
तक में प्रस्तावित ‘देशज आधुनिकता’ की अवधारणा को विमर्श के दायरे में लाया जाए तो हिन्दी साहित्य के इतिहास और काल विभाजन पर नई रोशनी पद सकती है । औपनिवेशिक ज्ञानकांड से तार्किक विमर्श पुस्तक की विशेषता है । हिन्दी साहित्य के अध्येताओं के लिए यह इस मायने में भी खास है कि पूरी दुनिया में हो रहे कबीर संबंधी सभी महत्वपूर्ण अध्ययनों की जानकारी एक स्थान पर उपलब्ध कराई गई है ।
भारतीय समाज अँग्रेजी के पहले या बाद में कभी भी जड़ समाज नहीं था । अपनी आंतरिक सामाजिक और आर्थिक गतिशीलता के कारण भारतीय समाज सदैव ‘उत्तेजित और डायनेमिक’ रहा है । इसका सुन्दर विश्लेषण पुस्तक में किया गया है – “अन्य समाजों की तरह, भारत में भी, औपनिवेशिक आधुनिकता के आने के पहले के आरंभिक आधुनिक काल के सामने चुनौती पारम्परिक चिंतन और सामाजिक स्मृति की निरंतरता बनाए रखने की थी । व्यापार के विस्तार के कारण रोज नई पैदा हो रहे जातियों के प्रसंग में पद्धति यह बनी कि किसी जाति को पेशे के आधार पर चार में से एक वर्ण के अन्तर्गत रख दिया जाए और इस रखाव की व्यवस्था किसी पौराणिक संदर्भ के आधार पर कर दी जाए ।” इसके आगे वे लिखते हैं – “भारतीय समाज, सामाजिक वरीयता का निर्धारण वास्तविकता ताकत के आधार पर करता था कोरी कर्मकांड के उच्चता के आधार पर नहीं ।” यहाँ यह ध्यान देना जरूरी है कि वर्णाश्रम का पदानुक्रम चेतना निर्माण का निर्णायक तत्व था । असल रणनीति थी कि अपनी जाति को पदानुक्रम में फिट कहाँ किया जाए । यह रणनीति ही इतिहास में निर्णायक सिद्ध हुई । भारतीय समाज का ‘शक्ति विमर्श’ इसी के आस–पास घूमता है । समाज के शक्ति संघर्ष को समझने के लिए पदानुक्रम और उसमें जातियों के संचरण के सिद्धान्त को समझना आवश्यक है । इसका कबीर के समय और समाज से गहरा सम्बन्ध है । औपनिवेशिक ज्ञानकांड ने इस पर अपनी सुविधानुसार अलग रंग चढ़ा दिया जिसके दूरगामी परिणाम हुए । इन प्रश्नों से यह किताब लगातार टकराती है और तार्किक ढंग से भारतीय परम्परा और लोकहित के परिप्रेक्ष्य में इसको समझने का प्रयत्न करती है ।
कबीर के अध्येताओं के लिए कबीरवाणी के प्रामाणिक पाठ निर्धारण दुष्कर कार्य रहा है । पुरुषोतम अग्रवाल का मानना है कि इसके निर्धारण में विद्वानों ने बहुत प्रतिभा और परिश्रम खर्च किया है । प्रामाणिकता के सवाल से टकराने की उनकी चाभी है – कबीर की कविता से संवाद । वे कबीरवाणी की समवेदना को ‘लोकवृत’ के माध्यम से पकड़ना चाहते हैं । कबीर की ‘सामाजिक उपस्थिति’ इसका आधार बनती है । कबीर के कई पद भले ही प्रचलित प्रामाणिकता की कसौटी पर खरे न उतरते हो किन्तु कबीर की ये रचनाएँ याद दिलाती है कि कबीर व्यक्तित्वविहीन होने के अर्थ में नहीं, अद्वितीय लोगों से संबन्धित और लोक–स्वीकृत के अर्थ में लोक कवि हैं । “इन अर्थ में कबीर एक व्यक्ति का अतिक्रमण करके विचार में परिणत हो जाते हैं । कबीर का विचार में परिणत होना समाज के शक्ति संतुलन को प्रभावित करता है जो कई लोगों के लिए असुविधाजनक हो सकता है । लेखक ने आगाह भी किया है कि “कबीर की बहुवचनात्मक्ता उन्हें बहुत परेशान करती है, जो अपने राजनैतिक और इंटेलेक्चुयल समझ पर कबीर के समर्थन का ठप्पा लगाना चाहते हैं ।” (पृ.४३) कबीर वाणी के रूप में प्रचलित पदों को रचना और उपरचना के रूप में स्वीकार कर अपना ध्यान कबीर की संवेदना को रेखांकित करने पर केन्द्रित हैं । कबीर को पढ़ने की उनकी प्रविधि है –‘संवाद’ और ‘भागीदारी’ । वे लिखते हैं “भक्ति की भाषा में समर्पण और भागीदारी दोनों के मुहावरे की गुंजाइश है । अध्येताओं का ध्यान केवल समर्पण के मुहावरे तक सीमित रहा है ।” इसलिए वह जÞोर देकर कहते हैं “कबीर की भक्ति आत्म समर्पण से कहीं अधिक भागीदारी के आग्रह को व्यंजित करती है ।”(पृ.५२)
‘काशी बसे जुलाहा एक …..’ अध्याय में कबीर के ‘जुलाहे से धर्मगुरु’ तक की यात्रा की कहानी कही गई है । मिथकों और किंवदंतियों के निर्माण की रणनीति को समझने के लिए कबीर का जीवन अद्भुत मिसाल है । अग्रवाल जी ने दिखाया है कि औपनिवेशिक ज्ञानकांड ने अपनी सुविधा और हितों को ध्यान में रखते हुए कबीर सम्बन्धी जगत प्रसिद्ध मान्यताओं को या तो उलट दिया या भ्रांतिपूर्ण बना दिया । पुस्तक में एच एस विल्सन द्वारा खड़ी की गई उस भ्रांति की चर्चा है जिसमें विल्सन ने कहा था “हो सकता है कि कबीर नाम का कोई व्यक्ति कभी हुआ ही न हो, और ‘कबीर’, ज्ञानी जैसे नाम मात्र जेनेरिक नाम या अनेक फ्रीथिंकर्स द्वारा चुन लिए गए ‘तखल्लुस’ भर रहे हों ।” (पृ.१५१) ऐसी भ्रांति सहज ही विरोध, विकृति और समाहार की अवधारणा की याद दिला देती है । जब कोई मान्यता समुदाय विशेष के हितों के अनुकूल न हो तो उसका पुरजोर विरोध करें । विरोध से बात न बने तो मान्यताओं को विकृत रूप में प्रस्तुत किया जाए या उन मान्यताओं को अपने भीतर समाहित कर लिया जाए । इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं । कबीर के मामले में ‘विरोध’ और ‘विकृति’ की अवधारणा तो चल निकली किन्तु ‘समाहार’ की छूट कबीर की कविता से कभी मिल नहीं पाई । परिणामस्वरूप अन्य षडयंत्रों का सहारा लिया गया । ऐतिहासिक तथ्यों के द्वारा प्रामाणिक ढंग से दिखाया गया है कि कबीर जैसे सहज(संवेदनशील व्यक्ति को स्वयं उनकी कविता से अलग करके किंवदंतियों में बादल दिया गया जो सभी तर्कों और विश्लेषण से परे हो जाता है । इसलिए लेखक ने इस बात पर बार–बार जÞोर दिया है कि तमाम दावों के बावजूद इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि कबीर की कविता क्या कहती है ? आखिर कबीर तक पहुँचने का सबसे अच्छा जरिया वही तो है ।
यह पुस्तक कई अर्थों में एक सुखद एहसास भी करती है । समसामयिकता के दवाबों से मुक्त होकर कबीर पर चार सौ से अधिक पृष्ठों के पुस्तक प्रकाश हिन्दी आलोचना के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है । आलोचना में प्रयुक्त होने वाले कई पारिभाषिक शब्दों की सटीक व्याख्या की गई है जैसे ‘लोकवृत’, शास्त्रोक्त, कवयोक्त, धर्मेतर आख्यान आदि । पुरुषोतम अग्रवाल ने यथास्थान अपने छात्रों का भी उल्लेख किया है जिनकी सक्रियता और संवाद से पुस्तक इस रुप में आ सकी । छात्रों के प्रति यह आत्मीयता पुस्तक को संवादपरक बनती है जो बकÞौल लेखक कबीर को समझने की कुंजी है ।
हिन्दी साहित्य में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की पुस्तक कबीर का ऐतिहासिक महत्व है । कबीर के अध्येताओं के लिए यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि आचार्य द्विवेदी के कबीर और पुरुषोतम अग्रवाल और कबीर सम्बन्धी अध्ययनों में क्या फर्क है । आचार्य द्विवेदी जी भारतीय चिंतन परम्परा और धर्म साधना में कबीर के महत्व को निरूपित करते हैं । उन्होने कबीर के उपसंहार में लिखा है कि “कबीर धर्मगुरु थे । इसलिए उनकी वाणियों का आध्यात्मिक रस ही आस्वाध्य होना चाहिए, परंतु विद्वानों ने विभिन्न रूपों में उन वाणियों का अध्ययन और उपयोग किया है । काव्य रूप में उसे आस्वादन करने की तो प्रथा ही चल पड़ी है ।” (द्विवेदी ग्रंथावली, ४, पृ.३६६) ‘कबीर’ की भूमिका में द्विवेदी जी ने अपना उद्देश्य स्पष्ट कर दिया है “ ‘कबीर’ लिखते समय विभिन्न साधनों की चर्चा प्रसंगवश आ गई है । उनके उसी पहलू का परिचय विशेष रूप से करवाया गया है जिसे कबीरदास ने अधिक लक्ष्य किया था ।” (वही, पृ.१९५) पुरुषोतम अग्रवाल का दृष्टिकोण आचार्य द्विवेदी सेभिन्न है । अग्रवाल जी कबीर को कवि मानते हैं और पूरी किताब में कबीर के कवि रूप की व्याख्या और कबीर को कवि न मानने की रणनीति का विवेचन करते हैं । दृष्टिकोण और प्रस्थान बिन्दु के फर्क के कारण पूरी अध्ययन पद्धति बदल जाती है । द्विवेदी जी भारतीय साधना में कबीर का स्थान तलाशते हैं और अग्रवाल जी काव्यपरम्परा में । कबीर के अध्येताओं का तत्काल किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले यह आवश्यक है कि पुरुषोतम जी को पढ़ने के बाद आचार्य द्विवेदी को एक बार फिर पढ़ा जाए । इसके बाद कबीर, मध्यकालीन इतिहास के अध्ययन की पद्धति, रसास्वादन के प्रतिमान, कालविभाजन जैसे कई बुनियादी सवालों पर नए सिरे से विचार करना प्रसांगिक लग सकता है । साहित्य, इतिहास और समाजशास्त्र के जिज्ञासु और गंभीर अध्येताओं के लिए पुस्तक रुचिकर और विचारोतेजक है ।

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