अख्तियार की अख्तियारी और नेताओं की नेताबारी–दोनों फेल

akhtiyar-durupyog
कैलाश महतो,परासी, ९ दिसिम्बर |
नेपाल के राजनीति में कुछ दिन अफरातफरी और भूचाल सी मची रही । कुछ दिनोंतक हर जगह लोकमान, हर तरफ लोकमान रहे । चाहे अनचाहे लोकमान रहा हर जुवान पर और हर दुकान पर । हर दल में और हर मन में । ऐसा लग रहा था जैसे लोकमान चर्चा पाने के लिए ही पैदा हुए हैं ।
करीब २०६७ साल की बात है । परासी में अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग के एक बडे अधिकारी आए हुए थे भ्रष्टाचार निवारण को सशतm बनाने के लिए । वो अख्तियारी को स्वस्थ्य बनाने और भ्रष्टाचारियों को कानुन के घेरे में लाने की बात कर रहे थे । प्रशासन कार्यालय के अफिसर्श क्लब लोगों से भरा हुआ था । उनके निर्देशन को सुनकर मैंने कहा, “तो सबसे पहले अख्तियार दुरुपयोग का ही छानबिन होनी चाहिए । आप और आप के आयोग के सारे अधिकारियों से शुरु होनी चाहिए ।” मैंने उन्हें उदाहरण दिया था कि मैं एक क्याम्पस के प्राध्यापक के घर में मेरे तलब के कारण कभी सब्जी नहीं होती तो कभी दुध नहीं आती । कभी मेरे एक बच्चे का स्कूल फी नहीं भुतmान हो पाता तो कभी घर में ग्यास नहीं होती । लेकिन हमारे ही तलब के हाराहारी में मासिक तलकमान प्राप्त करने बाले अख्तियार लगायत के अधिकारियों के आधा दर्जन बच्चे महँगे स्कलों में पढते हैं । कोई अमेरिका तो कोई यूरोप और कोई जापान तो कोई अष्ट्रेलिया में पढते हैं । कैसे ? दो चार शहरों में आलिशान महल खडे कर लेते हैं । लाखों रुपये की मासिक घरायसी खर्च होते हैं । तो इतने बडे रकम अख्तियार बाले लाते कहाँ से हंै ? अगर वे टि.ए.डी और भत्ता की दलिल देते हैं तो भी उनके खर्चों से सैकडो गुणा नीचे उनकी कमाई होती है । इतने से बात सुनकर अख्तियार बाले भाषण देना ऐसे भूल गये–मानों उन्हें साँप सुघ गया हो । वहीं पर सभाहल में उपस्थित लोगों ने मेरे बातों पर हामी भर दी और अख्तियार की अख्तियारी पर ही प्रश्न उठानी शुरु कर दी । वे बेचारे अधिकारी साहब को जल्द से जल्द कार्यक्रम समाप्त कर के भागना पडा ।
उसी संस्था का प्रमुख हैं लोकमान सिंह कार्की जिनके सम्पतियों को छानबिन करने तथा उनपर महाभियोग लगाने कीे सरकार और कुछ पार्टियाँ नाटक कर रही हैं जबकि सारे नाटकों को छोडकर गणीतिय हिसाब लगाकर उनके जायज कमाई तथा सम्पतियों का हिसाब निकाल कर बाँकी सम्पतियों को कब्जा करना ही सरकार तथा अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग का राज धर्म है । अख्तियार दुरुपयोग सिर्फ किसी के सम्पति को छानबिन न करना ही नहीं, अपितु उस पद पर रहकर पदीय मर्यादा को पालन न करना भी अख्तियार दुरुपयोग है । अपने योग्यता के विपरीत उस पदको प्राप्त करना या करबाना भी अख्तियार की दुरुपयोगिता है । सालों तक उस पद पर रहकर बडे मछली और छाटे मछली कहना भी अख्तियार की दुरुपयोगिता है । क्यूँकि अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग के नजर में सब मछलियाँ अपराधी होनी चाहिए अगर वे हैसियत से ज्यादा अख्तियारी का दुरुपयोग किये हों तो ।
जनता के सामने हाल फिलहाल ही फटिचर जिन्दगी बसर करने बाले जिला नेता समेत की शान शौकत, आर्थिक हैसियत तथा रङ्गीन जीवन शैलियों को देखकर जनता उनसे चिढने लगी है । कुछ ही वर्ष पूर्व एक बनियान खरिदकर पहन न सकने बाले नेताओं के बदन पर पलाये चर्बी, पैरों के जूते, बालों के जेल और तेल, शरीर के पहनावे, आँखों के चश्में, बैंकों के खाते, करोडों की महल, लाखों की गाडी तथा करोडों के व्यापार सब अख्तियार की दुरुपयोगिता नहीं तो क्या है ? उनके सम्पतियों पर छानबिन का नाम देना नाटक नहीं तो और क्या है ? जग जाहेर है कि दो चार सालों में कोई नेता करोडों का मालिक नहीं हो सकता । अगर हुए तो वह भ्रष्टाचार है । उनके सम्पति जब्त होनीे चाहिए । उनके राजनीति करने पर रोक लगनी चाहिए ।
अभी हाल फिलहाल ही राजबिराज में सम्पन्न एमपीएल (मधेश प्रीमियर लिग) को परिकल्पना करने, व्यवस्था करने, झमेला मोलने, उद्घाटन करने, खेलाडी खोजने तथा तैयार करने, एमपीएल का रुप बनाने आदि का काम कोई और ने किया । मगर बने बनाये मञ्च और माहौल को पैसों से खरीदना और किसी द्वारा उसे बेच कर मधेश को बलि का बकरा बनाने बालों से समापन करना और करबाना भी अख्तियार दुरुपयोग होने का काम है । मधेश के नेतृत्व इसी ताक झाँक में रहा है कि माहौल किसी के द्वारा बन जाने के बाद चोर के भाँती मौका मिलाकर उसमें घुस जाना और उसका यश अपने नाम से जोड लेने को ही नेतृत्वदायी भूमिका समझता है । मधेशी यूवाओं से मधेश यह उम्मीद तो कर ही नहीं सकता ।
मधेशी नेतृत्व को अगर सही सलाह की बात भी करें तो उन्हें चोट लग जाती है । उनके जिला नेता लोग तक बौखला जाते हैं । वे न अपने, न अपने केन्द्रिय नेतृत्व के विरुद्ध कोई बात सुनना पसन्द करते हैं न उन्हें कोई सलाह दे सकते । वे चाहे जितने भी अपराध कर लें, घटिया काम कर लें, मगर गाली मधेशी जनता को ही देंगे यह कहते हुए कि मधेशियों ने उन्हें भोट नहीं दी । नहीं तो वे राष्ट्रपति होते, प्रधानमन्त्री बनते और मधेशी जनता को कौडी के भावों में बेच देते ।
जनता से बडा कोई आयोग नहीं हो सकता । जनता को अब उसके अख्तियारों को दुरुपयोग करने बाले अख्तियार के अख्तियारी और नेताओं की नेताबारी दोनों को सीज (जब्त) करना होगा । नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि अपने अख्तियारी को अख्तियार नहीं करने बाली जनता के उपर ही उसके आने बाले सन्तति अख्तियार दुरुपयोग का मुद्दा चला दें । क्यूँकि जब किसी देश का शासक और प्रशासक भ्रष्ट और अख्तियारद्रोही होते हैं तो उसका मूल जड वहाँ की जनता होती है । उसके तथा उसके गलत मतानिर्णय के कारण ही वहाँ के शासक और प्रशासक भ्रष्ट, अत्याचारी और अख्तियार दुरुपयोगी बनते हैं ।

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