अगर नहीं बदला ताे राजनेताअाें का चरित्र

गंगेश मिश्र

बैसाख २ गते

POD
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” तब जवान थे, गठा शरीर, घनी लम्बी मूँछों के धनी परधान जी; तब जवान थे।”
अब तो सर से सारे बाल, सिकुड़ी हुई खाल, लड़खड़ाती चाल से बदहाल हैं,  बुढ़ऊ परधान।
यह एक की बात नहीं, अनेक ऐसे परधान हैं; जो परधानी की बाट जोहते-जोहते बूढ़ा गए; कुछ का तो राम नाम सत्य हो गया; कुछ को अभी भी उम्मीद है, ” अन्तिम बेर सही, बकिर परधान वाली कुर्सिया पे बैठहिक बा।” आगरे कै लड्डू परधानी, जे खाय उहो पछताय, जे न खाय उहो …..
लम्बे अर्से बाद सत्ता को याद आई, परधानी; स्थानीय निकाय की रिक्तता खलने लगी या भत्ता का विकेन्द्रीकरण करने की सूझी; भगवान जाने।
उन्नीस साल पहले,जवान थे; आज के बुढ़ऊ परधान; धूप-छाँव वाला चश्मा आँखों पर चढ़ाए; जब निकलते, तो देखते ही बनता था।और आज जो चश्मा लगा है, आँखों पर, ढक्कन वाला; पूछने पर पता चला, ” बुढ़ऊ परधान, मोतियाबिंद कै आपरेशन करवाये हैं ।” काफ़ी कुछ बदल चुका है, इन दो दशकों में; बदला नहीं है, तो बस ! हमारे राजनेताओं का चरित्र।

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