अगर मधेश के नेता सर्वस्व न्योछावर का संकल्प लेंतो आंदोलन जरुर सफल होगा : मुरली मनोहर तिवारी(सिपु)

मुरली मनोहर तिवारी(सिपु)

मुरली मनोहर तिवारी(सिपु)

 बीरगंज ,११ जुलाई | मधेश में आंदोलन की तैयारी शुरू हो चुकी है। आंदोलन से पहले नेताओ के बयानबाजी भी उफान पर है। कैसा होगा आंदोलन, उसका स्वरुप क्या होगा। मांगे क्या है। उसे मनवाने के हथकण्डे क्या होंगे। नेतृत्व कर्ता कौन होंगे। इन बातो पर गौर करना आवश्यक है। जहा निर्णायक आंदोलन का दावा किया जा रहा है पहले ये समझने की जरुरत है की मधेश में अभी तक आंदोलन हुआ ही नहीं है।
”आंदोलन”’ तो स्थायी-सत्ता या व्यवस्था द्वारा शोषण और अन्याय के खिलाफ पैदा हुआ संगठित, सुनियोजित अथवा स्वतःस्फूर्त सामूहिक संघर्ष है। इसका उद्देश्य सत्ता या व्यवस्था में सुधार होता है। सिर्फ समझौता और नकली उपलब्धि नही होता है जो ०६३ माघ मे हुआ। अगर ०६३ माघ प्रदर्शन को क्रांति कहे तो ”’क्रांति”’ अधिकारों या संगठनात्मक संरचना में होने वाला एक मूलभूत परिवर्तन है जो अपेक्षाकृत कम समय में ही घटित होता है। अरस्तू ने राजनीतिक क्रांतियों का वर्णन किया है की क्रांति एक संविधान से दूसरे संविधान में पूर्ण परिवर्तन या मौजूदा संविधान में संशोधन के लिए होता है।
०६३ माघ की उपलब्धियों के हिसाब से उसे क्रांति भी नहीं कहा जा सकता। ०६३ माघ के प्रदर्शन को मधेश बिद्रोह और ०६४ फागुन संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेसी मोर्चा के प्रदर्शन को मधेश संघर्ष तो कह सकते है पर आंदोलन या क्रांति नहीं। इस बार आंदोलन ही नहीं निर्णायक आंदोलन की बात हो रही है। इस भावी आंदोलन में तमलोपा, सद्भावना, और फोरम का नेतृत्व रहेगा। फोरम लो.तो मधेशी दल ही नहीं है, उसकी चर्चा करना ब्यर्थ है। इन संसदवादी दलों की चर्चा करे तो मधेश में इनका जमीनी पकड़ ढ़ीला पड़ चूका है। इनका प्रभाव इतना कमजोर है की हर गांव हर वार्ड में पहाड़वादी दल इनसे दोगुने-तिगुने संख्या में है। सम्पूर्ण मधेश इन मधेशी दलो को ही शंका के निगाह से देख रहा है।
madheshkhabarस्मरण रहे की नंद वंश के राजा से नाराज चाणक्य ऐसे शख्स की खोज में थे जो नंद राजा का नाश कर सके। पाटलीपुत्र की गलियों में उन्हें एक सात-आठ साल का बालक खेलता मिला। नाम था चंद्रगुप्त। एक बड़ी सिंहासननुमा कुर्सी पर वह राजा की तरह बैठा था और भ्रष्ट व अन्यायपूर्ण आचरणों के बारे में ऊंची आवाज में नसीहतें दे रहा था। उसके चेहरे पर तेज और आवाज में बुद्धिमता व ईमानदारी देखकर चाणक्य को समझते देर नहीं लगी कि नेतृत्व के गुणों से संपन्न यही बालक वह राजा है जिसे वह खोज रहे हैं। वही बालक मौर्य वंश का शासक चंद्रगुप्त मौर्य बना। ढाई हजार साल पहले चाणक्य के जमाने में लोकतंत्र नहीं था। लाजिमी था कि वह ऐसा शख्स चुनें जिसमें नेतृत्व के जन्मजात गुण हों और जिसे प्रशिक्षण देकर राजा के कर्तव्यों के लिए तैयार किया जा सके। आज मधेश में इसी नेतृत्व कौशल को पहचानने की जरुरत है। इस लिहाज से आज हर मधेशी के कंधों पर यह जिम्मेदारी है कि वे चाणक्य की तरह योग्य और होनहार व्यक्ति को आंदोलन की जिम्मेदारी संभालने के लिए चुनें।

मधेश में हुए कुछ जनमत सर्वेक्षण बताते है की मधेश की जनता अपने नेताओं को किस रूप में देखना चाहती है। विनम्र और मृदुभाषी  नेता के बजाए बड़बोले, दंभी या चुपा नेता मधेश के लोगों का समर्थन हासिल नहीं कर सकते। मधेश ने जिस दल और नेताओं में अहंकार की झलक भी दिखाई दी, उन्हें अपने वोट से वंचित करने में कभी कोताही नहीं की। एक बार बड़बोला और दंभी साबित होने के बाद मधेशी जनता को दोबारा अपनी विनम्रता से कायल कर पाना आसान नहीं है। इससे कोई मधेशी दल अछूता नहीं है। सत्ता के मद् में चूर होकर अपना दंभी चेहरा दिखाने में इन्हें कभी लज़्ज़ा नहीं आई।opendra yadav
सकारात्मकता  की कमी के कारण मधेश की जनता ने कई बार नेताओं और दलों को नकारा है। नेताओं के व्यक्तित्व में नकारात्मकता को वह अक्सर पसंद नहीं करती। मधेश ने प्राय: ऐसे नेताओं को ही चुना है जो दूसरों की कमियों पर जोर देने की बजाय अपनी राजनीति का सकारात्मक पक्ष सामने रखते हैं। यही कारण है कि महात्मा गांधी के भाषणों में ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों के खिलाफ लंबी तकरीरें नहीं मिलतीं। देश की जनता के सामने वह हमेशा बेहतरी का सकारात्मक पक्ष ही रखते थे।
निर्णय क्षमता की कमी से जरूरी फैसले लेने में कतराने और टालमटोल करने वाले नेताओं को मधेश का समर्थन नहीं मिल सकता। वैसे भी यह नेतृत्व क्षमता का पहला और अनिवार्य गुण माना जाता है। ०६३ के मधेश बिद्रोह के बाद उमडा जनसैलाब उपेन्द्र यादव के निर्णय क्षमता के कमी के कारण कभी सिटौला का इस्तीफा का मांग करना कभी छोड़ देने के कारण उन्की लोकप्रियता २२बुँदे तक आते-आते समाप्त सी ही गई।
विश्वसनीयता किसी भी व्यक्ति का वह प्राथमिक गुण है जो अगर न हो तो दूसरे सभी गुण बेकार हैं। नेता का व्यक्तित्व अगर विश्वास करने योग्य न हो, न तो उसकी विनम्रता प्रभावित करेगी और न ही निर्णय लेने की क्षमता। मौजूदा वक्त में मधेशी राजनीतिज्ञों की विश्वसनीयता रसातल में है, तब नेताओं के लिए यह और भी जरूरी है कि वे अपने को विश्वसनीय बनाने के लिए अतिरिक्त जतन करें। लेकिन लफाजी बातो के अलावे कोई लक्षण दिखाई नहीं देता।
rajendra mahatoजनता से जुड़ाव सामंती वक्तों में जनता राजा से प्राय: यह उम्मीद नहीं करती थी कि वह लोगों के बीच दिखाई दे। इसीलिए अगर राजा किसी कारण से लोगों के बीच जाता था या भेष बदलकर प्रजा का हाल-चाल लेने निकलता था, तो वह किंवदंतियों और जनश्रुतियों का विषय बन जाता था। लोकतंत्र में जनता स्वाभाविक ही अपेक्षा करती है उनके प्रतिनिधि नियमित रूप से उसके बीच दिखाई दें। जब से राजनीतिज्ञों ने सुरक्षा के नाम पर अपने को जनता से काट लिया है और सत्ता की अट्टालिकाओं में कैद कर लिया है, तब से लोगों में ऐसे राजनेताओं का आकर्षण बढ़ा है जो जनता के बीच दिखाई देते हैं। मधेश के नेता बाते मधेश की करते है लेकिन सत्ता के लोभ में ठिकाना काठमांडू में रखते है
समय की पहचान जनता ऐसे नेताओं को पसंद करती हैं जिनका हाथ बदलते समय की नब्ज पर हो और जो उसके हिसाब खुद को बदल सकें। देश में बदलाव इतने बारीक और भिन्न स्तरों पर हो रहे हैं कि एक ही पुराने फ्रेम में जड़े नेताओं का आकर्षण खत्म हो गया है। पहाड़वादी दल सत्ता में है और चतुर चालाक भी है उनसे आगे निकलने के लिए समय की नजाकत और जरुरत समझने वाले नेता की जरुरत है।
इन हालात के मद्देनज़र मधेश के नेतृत्वकर्ता की कमी कमजोरी बयान होती है। अगर नेतृत्व ठीक होता तो जहा नागरिकता के सम्बन्ध में साजिश हो चुकी है। हम भारत से बेटी-रोटी के सम्बन्ध से जुड़े है उसे तोड़ने का षडयंत्र हो रहा था हमारे नेता मौनी बाबा बने रहे। संसद मे प्रतिनिधित्व में हमें बदनीयत पूर्ण तरीके से गुलाम करने का काम हुआ है उस समय ये सर्वदलीय सरकार गठन के प्रयास में अपनी हिस्सेदारी मिलाने में ब्यस्त थे। एक मधेश का नारा रटते-रटते मधेश को पांच टुकड़ो में बाटने तक में सहमत दिखे। अब मधेश आंदोलन का ड्रामा होगा। मधेश बंद किया जायेगा, प्रहरी से दमन होगा। कुछ नए शहीद होंगे उनके मजार पर मेले भी लगेंगे। दिन भर बंदी होगी रात भर सारा सामान काठमांडू जायेगा। कुछ दिन के बंदी के बाद भारत के दबाव में कुछ समझौते होगें। हो गया आन्दोलन सफल।

tamaraआन्दोलन के भी कई तरीके हो सकते है। जैसे चिपको आंदोलन यह बात सन्‌ १९७४ की है जब भारत के रैंणी गाँव के जंगल के लगभग ढाई हज़ार पेड़ों को काटने की नीलामी हुई। गौरा देवी ने महिला मंगलदल के माध्यम से उक्त नीलामी का विरोध किया। इसके बावजूद सरकार और ठेकेदार के निर्णय में बदलाव नही आया। जब ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने पहुँचे तो गौरा देवी और उनके २१ साथियों ने उन लोगों को समझाने का प्रयास किया। गौरा देवी ने कहा कि ये जंगल हमारे देवता हैं और यदि हमारे रहते किसी ने हमारे देवता पर हथियार उठाया तो तुम्हारी खैर नहीं। जब ठेकेदार के लोगों ने पेड़ काटने की ज़िद की तो महिलाओं ने पेड़ों से चिपक कर उन्हें ललकारा कि पहले हमें काटो फिर इन पेड़ों को हाथ लगाना। काफी जद्दोजहद के बाद ठेकेदार के लोग चले गए।
आंदोलन और क्रांति की बात करनेवाले ये नेता पूर्णतः समझैतवादी चरित्र के है। ये तो आंदोलन से ज्यादा अपने पूर्वजन्म के पाप से मुक्ति के लिए उसी स्थाई सत्ता से गलबहियां करते देखे जा सकते है। ये नेपाली सत्ता के दलदल में इतने धस चुके है की चाह के भी निकल नहीं सकते। अगर मधेश के नेता समय पर जग जाएं, अपना सर्वस्व न्योछावर करने का संकल्प के साथ आह्वान करे, और सभी मधेशी सिर्फ काठमांडो छोड़कर वापस आ जाए तो यह भी एक सफल आंदोलन ही होगा। मधेशी नेता पर बिश्वास करके मधेशी कर्मचारी काम बंद करे। सभी मधेशी सड़को पर आये। मधेशी किसान कुछ समय अपने अनाज की बिक्री रोक दे। सभी मधेशी राजस्व देना रोक दे। मधेशी ब्यापारी सामान मंगाना और भन्सार कार्य रोक दे तब आंदोलन पूरा होगा। नही तो यह आंदोलन का खेल होगा आंदोलन नहीं।
जय मधेश।।

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz