अगर मधेश में है दम, तो नहीं चाहिए गोला, बारूद, और बम। मधेश में है बुता, तो चलाओ सिर्फ जूता।।

मुरलीमनोहर तिबारी (सिपु), बीरगंज , १६ अगस्त |

मुरलीमनोहर तिवारी

मुरलीमनोहर तिवारी

एक दिन घर लौट रहा था। गाँव के बाहर बांके बिहारी चौबे जी (बी बी सी) ने पकड़ लिया। उन्हें सब बीबीसी के नाम से पुकारते है। अपने नाम के कारण नेपाल में हर महकमे में उन्हें संदेह से देखा जाता है। एक तो उनके नाम में बिहार है, साथ में बाकें ज़िला भी बिहार में ही है। उनके वंशज नागरिकता की जाँच बांके जिला तक हो चुकी है।

अपने नाम से परेशान होकर अपने लड़के का नाम ऐसा रखना चाहते थे, जिससें वह नेपाल का लगे। लड़के का नाम रख दिया गिरजा प्रसाद चौबे। अब बच्चे उसका मजाक उड़ाते है, “ए गिरजा, कब गिरेगा”। एक दिन ये गिरजा से नाराज थे, गुस्से में बोल गए “आज जहा दिखे गिरजा, जुता लेके भीड़ जा” आज तक गिरजा का मजाक उड़ता है।

आज मुझे पकड़ लिए थे, और बीबीसी सेे बच के निकलना, मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। मुझे पकड़ते ही, सवालों की झड़ी लगा दी। क्या हुआ तुम्हारे मधेश का, टुकडा-टुकड़ा हो गया ? अब मधेश के नेता बिरोध का नाटक करेंगें। मैं पूछता हूं, आम मधेशी पर दाव खेलने के बजाए, ख़ुद ही अन्ना की तरह आमरण अनशन पर क्यों नहीं बैठ जाते ?

मैंने कहा – हाँ ! मधेश तो गया ही साथ मेँ भाषा का अधिकार भी गया। साथ ही अंतर्राष्ट्रीय व्यपार, अध्यागमन मामिला, बैदेशिक ऋण, रेल सञ्चालन, हुलाक, नागरिकता नीति, खनिज, योजना निति, गुप्तचर, सेना, सशस्त्र, के साथ-साथ प्रहरी भी गया। मधेश की स्वायत्तता की बात ही छोड़िए, अब तो राष्ट्रीय सभा में मधेश का प्रतिनिधित्व भी न्यून कर दिया गया है। मधेश के मुख्यमंत्री जिला बिकास के सभापति की तरह रहेंगे। मुख्यमंत्री रिक्शा पर घूमेंगे। ये तो होना ही था। लेकिन ये अंत नहीं सिर्फ आगाज है, अंजाम अभी बाक़ी है।

बीबीसी -अरे ! छोडो। आगाज-अंजाम। तुम्हारे आवाज का दम, सब बेकार। मधेश का सूरज डूब गया।

मैं- सूरज कभी भी डूबता नहीं, पृथ्वी उसके चक्कर लगाती है।

sipu-1 Inxt_p_int_shoethrowing sipu-2 sipu-3 shoes-2 edit बीबीसी- तुम सिर्फ बाते बनाओ। मधेश पर लेख लिखते हो। मधेश को जगाओगे। कितने लोग पढ़ते है उसे। आज के लड़के फेसबुक पर सिर्फ यारी-दोस्ती करते है। रोज देखता हु गांव के लड़के फ़िल्म भराकर दिन भर देखते रहते है। काम के ना काज के, दुश्मन आनाज के। तुम अच्छे परिवार से हो, कब तक परिवार में मुफ़्त की रोटी तोड़ते रहोगे। कलम चलाते हो, उससे फूटी कौड़ी भी नशीब होती है ? तुम भी मधेश छोड़ो और रोजी-रोटी में लगो।

मैं – जिसे एक बार मधेश का दर्द समझ आ जाए, उसे अपना दर्द समझ नहीं आता।

बीबीसी – मतलब ! हम नहीं सुधरेंगे। मैंने भी जे पी के सम्पूर्ण क्रांति में भाग लिया था, और जेल भी गया था।

मैं – मैंने तो सुना है मोतिहारी में आंदोलन के समय बाटा की दुकान लूटी गई। आप भी उसी में जूता चुराते हुए पकडे गए।

बीबीसी -(आग बबूला होकर) क्या बकवास कर रहे हो। क्या मैं-मैं जूता चुराऊंगा। जब दुकान टूटी, तो मैं घर भर के लोगो के, साइज़ का जूता मिलान कर रहा था। एक भी जूता ले नहीं पाया, कमबख्त पुलिस आ गई। हालांकि जेल से निकलने के बाद मेरा रुतबा बहुत बड़ गया था।

sipu-5मैं – हाँ चौबे गए, छबे बनने, दुबे बनके आ गए। पर ये जुता चीज ही ऐसी है पहले पैरों में होती थी, अब अक्ल पर पड़ गई है।

बीबीसी – मैं तो मधेश बिद्रोह में भी जूता लूटने के फ़िराक में था। इसमें जूते नहीं लुटे गए, इसीलिए ये सफल नहीं हुआ। जूते बहुत कारगर हथियार है।

मैं – बेरुत में जॉर्ज बुश पर जूता फेकने वाला पत्रकार मुंतजर अल जैदी तो रातोरात सेलिब्रिटी बन गया। और तो और जूता फेकने वाले दिन की बरसी पर “द लास्ट सैल्यूट टू प्रेसिडेंट बुश” नामक किताब भी लिख दी।

बीबीसी – वही तो ! अब तुम जूते की महत्ता समझ रहे हो। मैं तो बचपन से सुनते आया हूं “मास्टर साहब- मास्टर साहब, दो भाई थे, बनारस से जूता चुरा लाए थे”। भारत में चिदंबरम, दिग्विजय सिंह और केजरीवाल पर जूते फेकें गए, तब वे कामयाब हुए। नेपाल में जूते की कमी से, कामयाबी नहीं मिल रही।

मैं- आखिर क्या कारण था, कि कलम के एक सिपाही को, प्रतिरोध दर्ज कराने के लिए, जूते का सहारा लेना पड़ा ? क्या उस पत्रकार ने, मीडिया की ताकत को, जूते से कमतर मान लिया था ? क्या तब उसे जूता ही, प्रतिरोध का सबसे कारगर हथियार दिखाई दिया था? मधेश में दो तरह के लोग है, एक “आका” का जूता चाटकर चमकाने वाला, दूसरा आम मधेशी जो जूते के तलवे की तरह घिसते- घिसते फट जाता है। इसका अर्थ हुआ, अगर मधेश में है दम, तो नहीं चाहिए गोला, बारूद, और बम। मधेश में है बुता, तो चलाओ सिर्फ जूता।।

मेरी बात से बीबीसी तो सहमत हो गए। क्या आप सहमत है…?

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz