अगर सत्ता अब भी नहीं चेती तो जनता अब अधिकार नहीं स्वतंत्रता की मांग करेंगें : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू,१७ मई |

एक बार फिर संघीय गठबन्धन के बैनर तले जनता सड़कों पर है अन्तर सिर्फ इतना है कि ये सड़कें मधेश की नहीं हैं, बल्कि राजधानी की हैं । शायद इसलिए अब तक किसी अप्रिय घटना की खबर नहीं आ रही । पर तीन दिनों के बाद भी सत्ता की ओर से कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई है, हाँ एक बार फिर प्रधानमंत्री को जनता की यह भीड़ तमाशाई नजर आ रही है । किन्तु कोई यह पूछे उनसे कि अगर यह तमाशा ही है, तो उन्हें किस बात का डर है ? उन्हें तो इस तमाशा से भरपूर मनोरंजन करना चाहिए जैसे उनके भाषण से जनता करती है । फिर क्यों सैनिकों की पूरी फौज सड़कों पर तैनात किए हुए हैं ? क्यों तमाशाइयों और प्रहरियों में झड़प हो रही है ? क्यों तमाशाई घायल हो रहे हैं ? क्यों उन्हें राज्य में प्रवेश करने से रोका जा रहा है ? क्यों उन्हें जेल में डालने की बात की जा रही है ? यानि कहीं ना कहीं आप डरे हुए हैं और डर जब हावी होता है तो बेतुकी बातें ही निकलती हैं । खैर, इस बीच जो एक्यबद्धता आन्दोलनकारियों में दिख रही है वो तारीफेकाबिल है । अगर सत्ता अब भी नहीं चेती तो निःसन्देह यह उनके धैर्य की अंतिम परीक्षा होगी । मधेश आन्दोलन को भारतीयों का आन्दोलन कह कर राष्ट्रवाद को बहुत भजा लिया गया है, कम से कम अब तो राष्ट्रवाद का नारा लगाने वाले यह देखें कि काठमान्डू की सड़कों पर उतरे लोग भारतीय नहीं हैं । पर कब तक अधिकार की इस लड़ाई में मधेशी गाली और गोली खाते रहेंगे और अपनी राष्ट्रीयता सिद्ध करते रहेंगे ? हद हो गई अब तो । अपनी ही मिट्टी में अपनी अस्तित्व की लड़ाई है और जिसे सत्ता किसी हालत में स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है । मधेश शब्द को सुनना उन्हें गँवारा नहीं है तो भला अधिकार देने की बात कहाँ से मानेंगे ? वर्षों से जिस विभेद का शिकार मधेश होता आया है और जिसे करने के आदी रहे हैं शासक, वो भला अपनी ही शक्ति को कमजोर क्यों होने देना चाहेंगे ? किन्तु आज अगर सत्ता ने अपनी नीति नहीं बदली तो यही जनता अधिकार नहीं स्वतंत्रता की बात पर आगे बढ़ेंगे । वैसे एक कड़वी सच्चाई तो यह है कि मधेश और मधेशी हमेशा दोयम दर्जे पर ही रहेंगे ।

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अच्छी बात ये है कि इन सब हालातों के बीच प्रधानमंत्री सब्जबाग दिखाने से बाज नहीं आ रहे । अब शायद युवाओं को विदेश नहीं जाना पड़ेगा क्योंकि प्रधानमंत्री जी हर गाँव के एक–एक लाख युवाओं को एक साथ ही रोजगार देने वाले हैं । कुछ दिनों पहले सर्टीफिकेट पर ऋण देने की योजना बनी और अब रोजगार देने की योजना है । इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है । पर एक बात तो सोचने वाली है कि सचमुच अगर ऐसा हो गया तो रेमिटेन्स पर चलने वाला यह देश आगे कैसे बढ़ेगा ? वैसे यह तो लग रहा है कि देश सक्षम और समृद्ध हो रहा है (भले ही खोखले दावों में) क्योंकि अब अपने दम पर सड़क बनाने की भी बात की जा रही है । इस बीच प्रधानमंत्री एक और हवाईकिला सामने ला रहे हैं कि अब नेपाल बहुत जल्द प्रशान्त महासागर और हिन्द महासागर में अपनी जहाज चलाने वाला है और तीन दिनों के भीतर सामान नेपाल आने वाला है । पर यह नहीं बताया उन्होंने कि क्या जहाज के साथ साथ समन्दर और बन्दरगाह भी खरीदने वाले हैं या फिर जिस तरह भगीरथ ने जनकल्याण के लिए धरती पर गंगा को उतारा था उसी तरह प्रधानमंत्री नेपाल की धरती पर समन्दर लाने वाले हैं ? जाहिर सी बात है कि ऐसा हो नहीं सकता तो ऐसे सब्जबाग क्यों ? जिस अनदेखी सोच को हवा दे रहे हैं उसके लिए भी किसी ना किसी की सहायता ही चाहिए फिर कड़वी बोली क्यों ? इस बीच चीनिया रेल की खबरें भी मीडिया में सुर्खियों के साथ छाई रही । रेल चीन की पटरियों पर दौड़ रही है पर समाचार ऐसा बनाया जा रहा है जैसे पूरे नेपाल में पटरी बिछ गई हो और रेल नेपाल की उन्हीं पटरियों पर दौड़ रही हो । जनाब देश की असंतुष्ट जनता को सपनों की जरुरत नहीं है । सपने बेचने का काम बन्द कीजिए । आखिर कब तक जनता को बहलाया जा सकता है ? जनता को सुकून, अधिकार, रोजगार और विकास चाहिए वो दीजिए ।

जिस तरह चीन के बल पर भारत विरोधी बातें की जा रही हैं क्या यह कूटनीतिज्ञ दृष्टिकोण से सही है ? देश अगर चाहता तो अपनी सही नीति के द्वारा इन दो समृद्ध देशों के बीच अपने देश को सुदृढ़ करने की नीति बनाता पर यह नहीं हो रहा है । देश की इस दोमुँही नीति के तहत ही भारत के संसद में यह प्रश्न उठने लगा है कि क्यों नहीं नेपाल भारत की खुली सीमा को बंद कर दिया जाय । देश के एक वर्ग ऐसे हैं जो बड़े जोश खरोश के साथ यह कह रहे हैं कि भारत से पहले नेपाल को सीमा बन्द कर देना चाहिए । पर शायद उन्हें यह नहीं पता कि सीमाएँ सिर्फ मधेश से नहीं जुड़ी हुई हैं बल्कि कई ऐसी दुर्गम जगहें हैं जहाँ अगर सीमा बन्द हो जाय तो खाने के भी लाले पड़ जाएँगें । वर्षों से जो रिश्ता रहा है इन दोनों देशों के बीच क्या इन्हें खत्म किया जा सकता है ? नहीं, क्योंकि पहाड़ से अधिक मधेश इस रिश्ते के करीब है और हमेशा रहेगा । यह अलग बात है कि भारत ने भी मधेश के साथ इस करीबी रिश्ते को ज्यादा तवोज्जह नहीं दिया है । जानकी नवमी के अवसर पर जनकपुर भ्रमण के दौरान भारतीय राजदूत ने कहा कि जनकपुर का भी लुम्बिनी की तरह विकास होना चाहिए । शायद यही विकास यहाँ की सरकार नहीं देखना चाहती थी इसलिए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की जनकपुर यात्रा रद्द कर दी गई थी । कम से कम अब तो इस सच को समझना ही होगा ।

वक्त अब भी है कि इन सभी हालातों पर गम्भीरता के साथ बहस होनी चाहिए न कि बेतुकी बातों या आरोपों से हालात को और बद–से–बदतर बनाया जाना चाहिए ।

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