अधूरे संशोधन विधेयक में परिमार्जन की जरुरत : मनिष कुमार सुमन

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मनिष कुमार सुमन, काठमांडू ,६ पूस  | मधेश जन–आन्दोलन देश को समावेशी बनने के लिए हुआ था । जन–आन्दोलन की मांग के तहत यह संशोधन विधेयक पूर्ण नहीं है । यद्यपि कुछ ही सही जन–आन्दोलन की मांगो को छुआ जरुर है । मोरचे के अथक प्रयास से उक्त विधेयक अगहन १४ गते संसद सचिवालय में पंजीकृत मात्र हुआ है । इस विधेयक मे समावेसी, समानुपातिक, समान जनसंख्या के आधार पर व चुनाव क्षेत्रों का निर्धारण, नागरिकता प्रमाण–पत्र की प्राप्ति, नागरिकों के पदाधिकार जैसे मुद्दों में चर्चा तक नहीं हुई है । इसी प्रकार विधेयक में सभी मातृभाषाओं को संविधान की अनुसूची में सूचिकृत करने की बात तो कही गयी है, लेकिन उक्त भाषाओं को सरकारी कामकाज की भाषा बनाने के सम्बन्ध में यह विधेयक मौन है । वैवाहिक अंगीकृत नागरिकता को पहले से सहज ढंग से प्राप्त करने की बात स्वीकारी गयी है, लेकिन संघीय कानून के तहत नागरिकता ऐन को पुनः जटिल बनाने की आशंका को जीवित रखा गया है । विधेयक के परिप्रेक्ष्य में निर्मित संघीय सीमांकन आयोग के कार्य–क्षेत्र में सबसे चर्चित झापा, मोरंग, सुनसरी, कैलाली और कंचनपुर के संघीय व्यवस्था सम्बन्धित दृष्टिकोण को मौन रखा गया है । अतः विधेयक को आपसी विमर्श तथा सहमति के आधार पर परिमार्जित कर शोषितों एवं वंचितों को भी संविधान के प्रति स्वामित्व एवं अपनत्व स्थापित करने हेतु मोरचा ने सरकार से मांग की है ।

जहां तक संशोधन विधेयक के विरुद्ध सीपीएन यूएमएल द्वारा जारी आंदोलन की बात है । मेरा मानना है कि सीपीएन यूएमएल विरोधी पार्टी के रुपमें स्थापित होती जा रही है । अगर यूएमएल का यही रवैया बरकरार रहा, तो वह दिन दूर नहीं जबमधेश से यह पार्टी पूर्णतः अलग और मुक्त हो जाएगी । खोज मूलक बात यह है कि विदेशी शक्ति के इशारों के रूप में पंजीकृत इस विधेयक को देखने वाली तत्कालीन यूएमएल पार्टी की सरकार के उपप्रधान व विदेश मंत्री कमल थापा के द्वारा प्रस्तुत किया गया संशोधन प्रस्ताव जो भारत से अनुमोदन कर लाया गया था, अभी के संशोधन प्रस्ताव से मिलता–जुलता है ।

इसी प्रकार सरकार और मोरचे के बीच हुई ४० वीं बार की वार्ता के क्रम में इसी से मिलता–जुलता ४ सूत्री प्रस्ताव मोरचे को भेजे गये पत्र में उल्लेख किया गया था । वह पत्र आज भी हमारे पास सुरक्षित है । फिर आज यूएमएल इस प्रस्ताव से मुंह क्यों फेर  रहा है ? इसी क्रम में संविधान निर्माता कांग्रेस, माओवादी के अतिरिक्त यूएमएल पार्टी ने भी ऐसे ही दर्जनों प्रस्ताव पर मोरचे की मांगों को सम्बोधित करने के उपाय हेतु हस्ताक्षर भी कर चुकी है । वक्त यूएमएल के इस दोगले रवैया की खोज जरुर करेगा और दंडित भी करेगा ।

इसी क्रम में हमने यूएमएल के द्वारा चुने गये मधेशी, आदिवासी सांसदों को भी आग्रह किया है कि वे अपनी पार्टी के लोभ, मोह व आस्था से ऊपर उठकर चुनाव के वक्त मधेशी मतदाताओं से किए गए वादे को अनुभूत करावें । पंजीकृत विधेयक में बृहत रूप से विमर्श करें । सदन संचालनार्थ अपनी पार्टी में दबाब सृजन करें और विधेयक को पारित करने के लिए अग्रसर हों ।

दूसरा मसला देश में चुनाव करवाने का है । मेरे ख्याल में मोरचा अभी कोई रणनीति बनाने का विचार नहीं किया है । हालांकि, सद्भावना पार्टी या अन्य पार्टियां भी जनता के समक्ष वर्षों से किए गए सभी जनकार्यों के मूल्यांकन का अवसर चुनाव को ही मानती है । अतः हम सदैव चुनाव में प्रतिस्पर्धा हेतु आतुर रहते हैं । लेकिन संविधान को क्रियान्वित करने के बहाने कराये जानेवाले चुनाव मोरचे के द्वारा बहिष्कृत ही नहीं, बल्कि विघटित भी किया जाएगा । जहां तक सरकार द्वारा चुनाव संबंधित पंजीकृत विधेयक की बात है । यह सरकार का नियमित और नैतिक कार्य है जिसे हम खास तवोज्जह नहीं देते हैं ।

नेपाल के संविधान में साल २०७४ माघ ७ गते तक स्थानीय, प्रदेश तथा प्रतिनिधि सभा के चुनाव करवाने की कल्पना की गयी है । लेकिन चुनाव संबंधित तैयारियां भी कुछ नही दिख रही है। चुनाव आयोग ने भी चुनाव से १२० दिन पूर्व चुनाव संबंधित ऐन, कानून बनाने की मांग की है जो असहज है । संविधान संशोधन के पश्चात् अगर कोई एक चुनाव हो भी जाए, तो अन्य चुनाव असम्भव है ।

(मनिष कुमार सुमन सद्भावना पार्टी के महासचिव हैं)

 

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