अध्यात्म परमानंद स्वयं के भीतर

वेदना उपाध्याय:मेरा स्व महिलाओं और सज्जनों के रूप में स्वामी रामतर्ीथ ने ये कहते हुए अपना वक्तव्य आरम्भ किया कि राम योरोपीय अथवार् इर्साई  देशों को जो हर वक्त अपनी सेनाओं और जत्थों को दूसरे देशों को विजित  करने के लिए तत्पर रहते हैं, को दोषी नहीं मानता । ये भी किसी राष्ट्र की आध्यात्मिक उन्नति की एक अवस्था है जो किसी एक समय पर आवश्यक होती है । भारत इस अवस्था से गुजर चुका है । भारत एक अति प्राचीन राष्ट्र है जो कभी सांसारिक सम्पत्तियों को संतुलित करने के काम  में संलग्न रह चुका है और इस क्रम में उसने पाया कि वे अपर्याप्त हैं । आगे चलकर यही अनुभव उन समस्त शक्तियों को भी होगा जो अभी संसार की समस्त सम्पत्तियों को अर्जित कर लेना चाहते हैं । हर एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को पद दलित करने की लालसा से भरा है ये सब करके उन्हें आखिर क्या मिलेगा मात्र एक वस्तु है जिसकी खोज है, वह है आनंद –परम आनन्द । कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि उन्हें खÞुशी की  नहीं ज्ञान की  तलाश है । दूसरे ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि उन्हें आनंद की नहीं क्रियाशीलता की तलाश है । ये सब ठीक है, पर यदि एक औसत इंसान के हृदय और उसके मस्तिष्क की परीक्षा करो तो तुम पाओगे कि उसने अपने सम्मुख जो अंतिम लक्ष्य निर्धारित किया है, प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष ,चेतनावस्था में अथवा अचेतनावस्था में वे सब जिसकी तलाश में लगे हैं वह है आनंद परमआनंद, दिव्य आनंद और कुछ भी नहीं ।।
चलो आज की शाम इस बात का परीक्षण करें कि वह परम आनंद रहता कहाँ है -महलों में या झोपडÞों में, स्त्री सौर्ंदर्य में अथवा उन वस्तुओं में जिन्हें सोने चांदी से खरीदा जा सकता है उस परम आनंद का निवास आखिर  है कहाँ, आनन्द का भी अपना इतिहास है  । जैसे मनुष्य यात्रा करता है वैसे ही आनंद भी यात्रा करता है,  इसी  यात्रा की  कुछ चर्चा ।
इस परम सुख की  पहली झलक शिशु को शैशव में ही हो जाती है तब इस संसार का समस्त सुख उसे अपनी माँ  के आँचल में अथवा प्यारी माँ  के स्नेहिल वक्ष में होता है । ये सडÞक का पहला पडÞाव है, पहली अवस्था है जहाँ शिशु अपना मुख माँ के आँचल में छिपाकर उससे कहता है मुझे ढूढों मैं कहाँ हूँ  उसका सारा सुख इसी गोद में भरा है ।
एक वर्षव्यतीत होता है और आनंद अपना केंद्र परिवर्तति कर लेता है अब ये कुछ अन्य वस्तुओं की ओर अभिमुख होता है अब माँ की गोद की खुशियों का स्थान खिलौने ,गुड्डे – गुडिÞया ले लेते हैं अब कई बार तो खिलौनों के लिए माँ से भी झगडÞा हो जाता है । परन्तु कुछ वर्षों के बाद अब उसका मन उन खिलौनों से नहीं भरता अब आनंद फिर से अपना केंद्र परिवर्तित कर लेता है और अब उसे किताबों में रूचि जगती है विशेष रूप से कहानी की किताबें । अब खिलौने से ध्यान हटकर कहानी की किताबों पर केंद्रति हो गया । विद्यालयी छात्र काँलेज में प्रवेश करता है अब उसका आनंद भी फिर से थोडÞा आगे सरकता है अब उसे विज्ञान की, दर्शन की पुस्तकों में आनंद मिलता है वह उन्हीं में कुछ करना चाहता है । कभी – कभार उसका मन विश्व विद्यालय के सम्मान प्राप्ति की ओर यात्रा करता है । विश्व विद्यालय से रंगीन सपने आँखों में भरे युवक बाहर निकलता है अब उसे  लाभप्रद पद प्राप्त करना है, उसे पद मिलता है और वह उससे सुन्दर धनार्जन भी करता है अब उसे इससे भी आनन्द नहीं मिलता, अब उसे जीवन साथी की  आवश्यकता महसूस होती है अब वह अपनी अर्जित समस्त संपत्ति देकर भी उसे प्राप्त करना चाहता है । उसे पत्नी की प्राप्ति  हो जाती है कुछ समय आनंद प्रमोद में बीतता है और अब उसका आनंद पुनः अपना केंद्र परिवर्तति करता है अब उसे अपने घर में एक संतान की आवश्यकता महसूस होती है और अब उसके लिए  प्रयत्न करता है, चिकित्सकों की मदद, पीर फकीरों की दुआ, स्वयं को संतान सुख से गौरवान्वित करने के लिए । उसे संतान की प्राप्ति हो जाती है अब उसका सारा का सारा आनंद उस नन्हें से बालक में समा  जाता है । उसका चाँद सा मुखडÞा उसे अति सुकून देता है । पर आनन्द कभी बाहरी चीजों में टिकता नहीं सो वह फिर थोडÞा सा सरकना चाहता है । अब बालक बडÞा हो गया तरुण लडÞका बन गया अब उसमें वह पहले के जैसा आनंद कहाँ – अब व्यक्ति फिर से अपने अन्य काम काजों में व्यस्त हो जाता है । वह कार्यालय में कर्मरत है कि अचानक फोन बजता है वह उठाकर बात करता है कि सकते में आ जाता है, वह इधर उधर कहीं भी नहीं देखता बस जल्द से जल्द कार्यालय से बाहर निकलता है, शीघ्र से शीघ्र वह घर पहुंचता है वहाँ का दृष्ट देखकर उसके होश उडÞ जाते हैं पूरा परिवार घर से बाहर है घर ऊँची ऊँची लपटों से घिरा है वह पत्नी से बच्चे के बारे में पूछता है वह रोटी बिलखती कहती है कि शायद बच्चा घर के अंदर है अपने पालने में, वह घबराता है और चीखता है कोई मेरे बच्चे को बचाओ मैं अपना सब कुछ उसे दे दूंगा जो मेरे बच्चे को बचा लेगा । अब ये स्पष्ट हो जाता है कि बच्चा धन से अधिक प्रिय है बच्चे के लिए वह सब कुछ छोडÞने को तत्पर है पर एक बात अभी भी है वह बच्चे के लिए स्वयं को छोडÞने को तैयार नहीं ।
अब हम आनंद के कदाचित थोडÞा नजदीक आ गए है बच्चे के लिए बच्चा प्रिय नहीं होता वह अपने आनंद के लिए  प्रिय होता है, पत्नी के लिए पत्नी प्रिय नहीं होती वह अपने आनंद  लिए प्रिय होती है पति, पति के लिए प्रिय नहीं होता वह अपने आनंद के लिए प्रिय होता है
नीरो के बारे में सब जानते हैं जिसे सुन्दर विकसित और उपयोगिता से भरे रोम में रूचि न होकर वह उसे अपने आनंद के लिए लपटों से घिरा देखना चाहता था । वह बहुत खुश था जब विकसित महानगर धुआंधार जल रहा था ।
भारत में एक  सुन्दर कहानी है, एक बार एक बूढी स्त्री अपनी र्सर्ुइ अपने ही घर में कहीं खो देती है । वह इतनी गरीब थी कि उसके पास अपने घर को रोशन करने के लिए भी पैसे नहीं थे अतः वह अपनी घर में खोई हर्ुइ र्सर्ुइ को खोजने के लिए बाहर सडÞक पर आती है और उसे ढूँढती है, एक भद्र पुरुष उससे पूछता है कि वह सडÞक में इस प्रकार क्या खोज रही है वह बताती है कि उसकी र्सर्ुइ घर में खो गई है जिसे वह यहाँ खोज रही है । प्रस्तुत कहानी बिलकुल मानव जीवन पर चरितार्थ होती है जबकि आनंद का सागर उसके अंदर ही हिलोरे मार रहा है वह उसे पाने के लिए बाहर भटक रहा है ।
सारांशतः महसूस करो कि र्स्वर्ग तुम्हारे ही भीतर है एक बार जब सारी इच्छाएं भर जाए, सारी गरीबी सारी व्यथा  किनारे लग जाती है ।
देखो जंगल के वृक्ष मेरे दूसरे सम्बन्धी है
और  चट्टानें उन धडÞकनों के साथ जीवित हैं जो मुझमें जीवित है
मेरी वासना की प्रतिमा और मेरी खाल का भेडिÞया
मैं डांस  के रूप में प्रचंड हूँ और मधुमक्खी के रूप  में मधुर
पुष्प कुछ भी नहीं मात्र मेरे प्रेम की बहार है
और पानी धार का कलकल संगीत मेरा स्वप्न है
र्सर्ूय मेरा फूल है जो बहुत ऊपर लटका है
मैं नहीं मर सकता चाहे कितनी भी मौतें आये
फिर मेरी आत्मा के ताने बाने पर मैं बुना जाऊँगा
मैं कभी जन्मा ही नहीं ,मेरी जन्मों की साँसे जैसे कि
अनिन्द्रित सागर बार बार बुनता रहता है ।
ओह, र्स्वर्ग तुममें है आनंदको बहिरी इन्द्रीय जन्य वस्तुओं में तलाश करने की चेष्टा न करो अनुभूति करो कि वह सच्चा आनंद तुम्हारे ही भीतर स्थिर है ।
-प्रस्तुत आलेख स्वामी रामतर्ीथ के द्वारा १७ डिसेम्बर १९०२ को एकेडमी आँपÞm साइंसेस, सन प|mांसिस्को अमेरिका में दिए गए वक्तव्य का छोटा सा सारांश है ।)

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