अध्यात्म भविष्य के लिए शुभ विचार कीजिए

रवीन्द्र झा:आपकी पारिवारिक स्थिति से आप को असन्तेष है, पिताजी के व्यवहार से आप को क्षोभ होता है और आप आवेश में आकर गृह-त्याग का और कभी कभी देह-त्याग का विचार करते हैं, तो मेरी समझ से आप को ऐसा विचार भूल कर भी नहीं करना चाहिए । संसार में ऐसा कोई भी नहीं है, जिस के मन की ही सब बात होती है । भगवान का मंगल-विधान मानकर प्रतिकूलता में अनुकूलता का अनुभव करने से ही चित्त में शान्ति हो सकती है । जहाँ आप भगवान के मंगल विधान में विश्वास करने लगेंगे, वहाँ लौकिक परिस्थिति भी बदलने लगेगी । प्रतिकूल भी अनुकूल होने लगेंगे । पर वे न भी होंगे, तो भी आप का क्षोभ तो मिट ही जाएगा । भावी जीवन को संकटमय न देख कर सुखमय देखने का संकट संकल्प कीजिए । जो मनुष्य रातदिन दुःख, संकट और असफलता का चिन्तन करता है, वह क्रमशः दुःखी, क्लेशित, संकटापन्न और असफल ही होता है । मनुष्य की अपनी जैसी दृढÞ भावना होगी, वैसी ही परिस्थिति का निर्माण होगा और अन्त में वह वैसा ही बन जाएगा ।
आप के भगवान र्सवर्समर्थ हैं, आप के परम सुहृद हैं, उनकी कृपा पर विश्वास करके भविष्य को अत्यन्त उज्ज्वल तथा सुखमय देखने का अभ्यास कीजिए । ध्रुव, प्रहृलाद, भरत आदि के इतिहास को याद कीजिए । भगवान की कृपा से क्यों नहीं हो सकता और उनकी कृपा अपरंपार अपार है, इस बात पर विश्वास कीजिए । भगवान ने अपने को स्वयं समस्त प्राणियों का सुहृद बतलाया है । आप घबर्राईए नहीं । मन में जो देहत्याग आदि के असत् विचार आते हैं, इन को निकाल कर मन में बार-बार ऐसे विचार ल्याइए कि आप र्सवशक्तिमान र्सवलोक महेश्वर अकारण प्रेमी भगवान के परम प्यारे हंै । उनकी कृपा-सुधारसधारा निरन्तर आप पर बरस रही है । आप उनके लाडÞले पुत्र हैं । उनकी कृपा से आप की सारी विपदाएं सारी अडÞचनें स्वतः ही दूर हो जाएंगी । उनकी घोषणा है- ‘तुम मुझ में चित्त लगा दो, मेरी कृपा से सारी कठिनाइयों से तर जाओगे ।’
आपकी प्रत्येक स्थिति से वे परिचित हैं और सदा आप के कल्याण-साधन में लगे हैं । उनकी कृपाशक्ति के सामने आप पर विपत्ति डÞालने वाली कोई भी शक्ति कुछ भी नहीं कर सकेगी । आप की वे सब प्रकार से वैसे ही रक्षा करगें, जैसे स्नेहमयी माता बच्चे की रक्षा करती है । आप किसी प्रकार भी निराश, उदास और विषादग्रस्त मत होईए । भविष्य को संकटापन्न और अन्धकारमय देखने का अर्थ है- भगवान की कृपा पर विश्वास न करना । आप जब कर्ीतन तथा भजन करते हंै, सो बडÞी अच्छी बात है, पर जप, कर्ीर्तिन और भजन का प्राण तो भगवान पर विश्वास है । विश्वासहीन भजन निष्प्राण होता है । घर वाले यदि आप के भजन कर्ीतन से अप्रसन्न हैं तो मन ही मन भजन कीजिए, मन ही मन करने से कोई भी नहीं रोक सकता ।
एक बुजर्ुग व्यक्ति ने भगवान के ही प्रसंग में मुझसे पूछा- कहिए तो भगवान को किसने उत्पन्न किया – उन का यह प्रश्न बडÞा विचित्र है । शास्त्र में भगवान अजन्मा, अविनाशी, नित्य, सनातन एवं सब के मूल तथा र्सवाधार होने से स्वयं निर्मूल, आत्ममूल, निराधार, आत्मधार एवं परात्पर कहे गए हैं । उन्ही से सब की उत्पत्ति होती है । उनकी कभी किसी से उत्पत्ति नहीं होती । जो वस्तु सदा रहने वाली है, उसकी उत्पत्ति किससे हो सकती है – जिससे सब की उत्पत्ति, पालन और संहार कार्य होते हैं तथा जो किसी दूसरे से उत्पन्न न होकर सदा विद्यमान रहता है । वही भगवान है- मूले मूला भवादमूलं मूलम्

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