अनशन

अनशन
व्यग्ंय बिम्मी शर्मा
इस देश की सरकार देती है जनता को उपहार मे “टेंशन”,
सरकारी कर्मचारी खुश होते हैं पा कर “पेंशन”,
और देश के सचेत नागरिकों को इन के
विरुद्ध बैठना पड़ता है “अनशन” ।

 

Dr. Govinda KC Photo: THT File

मजबूरी का दूसरा नाम महात्मागांधी ऐसे ही नहीं कहा गया है । जो मजबूर हैं वह हर प्रकार का दुख और अपमान सहने के लिए भी बाध्य हैं । इसीलिए तो गरीबी और भूख से लाचार आदमी खाली पेट सोता है तो कोई उस की सुध लेने वाला नहीं होता । पर जब पढ़ा लिखा आदमी राजनीति मे कूद कर अपनी मांग पूरी करवाने के लिए बहुत दिनों तक भूखा रहता है तो आधुनिक परिभाषा में उसे अनशन कहते हैं । अनशन या भूख हड़ताल में बैठते ही आदमी के वारे न्यारे हो जाते हैं ।
त्रेतायुग में अपने बेटे भरत को राजा बनाने के लिए कैकेयी ने राजा दशरथ को मनाना चाहा । पर जब राजा दशरथ नहीं माने तो कैकेयी अन्न, जल और श्रृंगार त्याग कर कोप भवन में चली गयी । तब राजा दशरथ मरता क्या नहीं करता वाले हालत में आ गए । वह स्त्री हठ और अनशन के आगे नतमस्तक हो गए । उसका परिणाम यह हुआ कि भगवान श्रीराम १४ साल के लिए वनवास चले गए । वास्तव में देखा जाए तो अनशन की जननी महारानी कैकेयी को माना जाना चाहिए ।
आधुनिक युग में भी हमारे पड़ोसी देश भारत में अँग्रेंजो के शासनकाल में महात्मागांधी अनशन यानी सत्याग्रह पर बैठते थे । २ सौ साल भारत में राज करने वाले अँग्रेजो को यहां से हमेशा के लिए चलता करने के लिए गांधीजी २१ दिनों तक अनशन में बैठे थे । तब विश्वबिजयी अँग्रेज भी गांधीजी के अनशन और उन के तेवर देख कर डर गए थे । तो देखा आपने यह अनशन कितनी कारगर चीज है ? कोई आपकी बात नहीं मान रहा उससे विवाद या झगड़ा करने से आप जीत नहीं पाएँगें । तो झट से अनशन पर बैठ जाइए । आपका अधूरा काम पूरा हो जाएगा और सब आपकी बात मान लेंगें ।
भारत में लोकपाल विधेयक लाने ेक लिए श्री अन्नाहजारे महाशय बार–बार अनशन पर बैठे थे । हजारे के अनशन के समाचार से उस समय मीडिया भरी पड़ी थी । घर में बच्चे को अपने मां–बाप से कुछ माँगना वा खरीदना हो तो पहले वह प्लीज, प्लीज करके माँगता है । अगर मां–बाप नहीं माने तो फिर रोने लगता है, अगर रोने से भी मांँ बाप नहीं माने तो अन्तिम अस्त्र के रूप में बच्चा भूख हड़ताल कर देता है । तब मां–बाप बच्चे के सामने हथियार डाल देते हैं । यही हथकंडा पत्नियां भी पतियों सें अपनी पंसद के गहने और कपडेÞ खरीदवाने के लिए प्रयोग करतीं हैं ।
हमारे देश में अनशन १२ महीने पाए जाने वाले फल जैसा है । यहां लोग खुद अनशन पर नहीं बैठते दूसरों को महान और बलिदान बनाने के लिए अनशन बैठने के लिए उकसाते हैं । बेचारा अनशन पर बैठने वाला आदमी मजबूरी का दूसरा नाम महात्मागांधी का फार्मूला का जाप करते हुए झट से अनशन में बैठने को तैयार हो जाता है । गोया महान जो बनना है और मीडिया पर छा जाना है ।
देश के स्वास्थ्य क्षेत्र, मेडिकल कलेज और सरकारी अस्पतालों में व्याप्त भ्रष्टाचार और अव्यवस्था को हटाने या जड़ से मिटाने के लिए डाक्टर गोविन्द केसी बार, बार शनशन पर बैठ चुके हैं । पर कुम्भ कर्ण की तरह सोई हुई इस देश की निक्कमी सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगी । रविवार से डा. केसी फिर अनशन में बैठ गए हैं । यह उनका आठंवे चरण का अनशन है । सरकार को एक आदमी देश में नीति नियम को ट्रैक पर लाने के लिए जितने भी बार अनशन में बैठे कोई फर्क नहीं पड़ता । सरकार तो सिंहदरवार और बालूवाटार में भरपेट नीति नियम को खा–पी कर कानून से कुल्ला कर संविधान के अंगोछे से मुँहं पोछ कर रेमिटेन्स के पलगं पर कुम्भकर्ण की नींद सोती है ।
सरकार हर बार डा. केसी के अनशन से घबरा कर उनको अनशन स्थल में जा कर जूस पिला कर उनकी मांगे मानने की बात करके ठगती आई है । इस देश में सरकार कभी बिमार पड़ती ही नहीं या पड़ती भी है तो उसका इलाज विदेशों में होता हैं यहां नहीं । तो सरकार क्यों चाहेगी स्वास्थ्य क्षेत्र के विकृतियों में कोई सुधार हो । जितनी ज्यादा विकृति उतनी ही ज्यादा मेडिकल माफिया और सरकार को फायदा है । बेचारे डा. केसी हर बार सरकार के हाथों ठगे जाने पर भी अनशन का जाप करना नहीं छोड़ते । उनको लगता है कि वह अपना बलिदान दे कर इस देश के सिस्टम को ठीक कर देंगें ।
पर हंसी आती है इस बात पर कि डा. केसी के अनशन में बैठने पर सब वाहवाही करते हैं, ताली बजाते हैं और उनको हर हाल में साथ देने का वादा भी करते है । पर अनशन में डा. केसी के अलावा कोई नहीं बैठता । क्या देश के बांकी नागरिक खाना नहीं खाते, उनके पास पेट ही नहीं है या उन्हे भूख नहीं लगती ? क्या डा. केसी ही सिर्फ भूक्खड़ है जो हमेशा वही अनशन पर बैठते हैं । क्या इस देश में सुव्यवस्था और नीति नियम सिर्फ डा. केसी को चाहिए औरों को नहीं ?तो फिर क्यों नहीं कोई उनके साथ साथ अनशन पर बैठता ? क्या ताल ठोकना ही साथ देना है ? सुर में सुर मिला कर बोलना या दिव्यगीत गाना कोई क्यों नही चाहता ?
क्योंकि सभी को मालूम है इस देश में जितने भी अनशन या आंदोलन हो जाए कभी कुछ नहीं बदलेगा । बेकार में अपना खाना और जल त्याग कर, शरीर को गला कर क्यों कोई अपना वलिदान देना चाहेगा? इसी लिए अकेला वृहस्पति की तरह डा. केसी को वलि का बकरा बनाने पर तुले हुए हैं । जब देश की कोई संवैधानिक और गरिमामय पद पर आसीन करने की बात आती है तो डा. केसी को कोई याद नहीं करता । पर जब दुख और कष्ट झेलने के लिए डा. केसी को आगे कर देते हैं । लगता है डा. केसी ने ही सिर्फ ईस देश का नमक खाया है और उसी की अदायगी कर रहें है ।
और डा. केसी इस अंधेर नगरी और चौपट राजवाले देश में धृतराष्ट्र जैसे शासकों से न्याय और सुव्यवस्था की उम्मीद करते हैं । डा. केसी को शायद मालूम नहीं है कि धृतराष्ट्र जैसे शासक उनकी बात मान कर देश में सुव्यवस्था ले आना तो दूर उल्टा महाभारत करवा देते हैं । इस का ताजा उदाहरण तो मधेश आंदोलन है, जिस मे मधेशियों को पेड़ से आम की तरह गिरा कर सरकार मधेश को पके आम की तरह चूस लिया था ।क्योंकि…………
इस देश की सरकार देती है जनता को उपहार मे “टेंशन”,
सरकारी कर्मचारी खुश होते हैं पा कर “पेंशन”,
और देश के सचेत नागरिकों को इन के
विरुद्ध बैठना पड़ता है “अनशन” ।

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