अनिश्चितता के भंवर में संविधान

प्रो. नवीन मिश्रा:नेपाल के  राजनीतिज्ञों की अदूरदर्शिता और अपरिपक्वता के कारण लगता है, इस बार भी फिर से संविधान निर्माण की प्रक्रिया अनिश्चित के भंवर में फंस गई है । प्रधानमन्त्री कोइराला का कहना है कि किसी भी हाल में नियत समय पर संविधान जारी होकर रहेगा । दूसरी ओर इतनी ही दृढÞता से पुष्पकमल दाहाल का मानना है कि नियत समय पर संविधान बनना असम्भव है । बाबुराम भट्टर्राई भी कह रहे हैं कि अगर नियत समय पर संविधान जारी नहीं हुआ तो कोई आसमान टूट कर नहीं गिर जाएगा । कुछ माओवादी नेता और कांग्रेसी नेताओं का कहना है कि संघीयता के मुद्दे को ताक पर रखकर तत्काल संविधान जारी किया जा सकता है । ताजा स्थिति यही है कि सहमति एवं सुझाव समिति में सहमति नहीं बन पाने की स्थिति में विवादित विषयों को संसद में ले जाया गया है । नेपाली कांग्रेस और एमाले इस पक्ष में हैं कि विवादित विषयों का समाधान संसद के द्वारा ही किया जाए अर्थात् संविधान निर्माण बहुमत के आधार पर हो जबकि एमाओवादी और प्रमुख मधेशी दलों की मान्यता है कि संसद में सहमति नहीं बनने की स्थिति में इसे फिर समिति में ही लौटाया जाए अर्थात् संविधान का निर्माण सहमति के आधार पर हो ।sambidhan
सत्ताधारी दलों ने अपनी बात मनवाने के लिए कोई कसर बाँकी नहीं छोडÞी । जब कोई रास्ता नहीं मिला तो राष्ट्रीय सरकार का झाँसा देते हुए मधेशी दलों की तरफ सरकार में शामिल होने के लिए चारा डÞालना शुरु किया । पहले वाली परिस्थिति होती तो शायद कुछ मधेशी दल और नेता इस चारे में फँस भी जाते लेकिन पिछले आम चुनाव में अपनी करारी हार से भयभीत कोई भी मधेशी नेता या दल इस फन्दे में तो नहीं फँसा । लेकिन नेकपा एमाले के द्वारा मधेशी दलों के समक्ष राष्ट्रीय सहमति की सरकार गठन करने सम्बन्धी प्रस्ताव रखने के कारण नेपाली राजनीति में एक नई बहस की शुरुआत हो गई । संविधान निर्माण के महत्वपर्ूण्ा मुद्दों को दरकिनार करते हुए कतिपय राष्ट्रीय स्तर के नेतागण इस में उलझे पाए गए । प्रधानमन्त्री कोइराला ने इसे सरकार बदलने की साजिश करार दी ।सिद्धान्ततः राष्ट्रीय सहमति की सरकार गठन करने की बात गलत नहीं है, लेकिन इसका उद्देश्य यदि सरकार परिवर्तन है तो ऐसे में निश्चित ही संविधान निर्माण का कार्य बाधित होगा । अभी की परिस्थिति में संविधान निर्माण पर सत्ता को हावी नहीं होना चाहिए । जहाँ तक कोइराला सरकार का प्रश्न है, अपनी सुस्त चाल के कारण यह आलोचना का शिकार रही है । इतना ही नहीं, प्रधानमन्त्री कोइराला ने खुद स्वीकार किया है कि उनके कुछ मन्त्री भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, लेकिन सबूत के अभाव में न तो उन्हें हटाया जा रहा है और न हीं उनके ऊपर कोई कारवाही हो पा रही है । इस में प्रधानमन्त्री की निरीहता झलकती है । जब तक ऐसे लोग सरकार में बने रहेंगे, तब तक सरकार की छवि स्वच्छ और प्रभावकारी नहीं बन पाएगी । लेकिन फिर भी इन मुद्दों के आधार पर सरकार परिवर्तन का यह उचित समय नहीं है । हालांकि एमाले अध्यक्ष केपी ओली ने सफाई देते हुए यह स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टर्ीीा उद्देश्य सरकार परिवर्तन नहीं है सिर्फसरकार का विस्तार कर राष्ट्रीय सरकार गठन करना है । संविधान निर्माण के विषयों पर सहमति जुटाना अभी देश के सामने सबसे बडÞी चुनौती है । इसलिए राष्ट्रीय सरकार गठन से ज्यादा महत्वपर्ूण्ा राष्ट्रीय सहमति है । इससे पहले के संविधान सभा में बाबुराम भट्टर्राई की सरकार को राष्ट्रीय सरकार का जामा पहनाने की कोशिश की गई थी । लेकिन तब भी संविधान निर्माण नहीं हो सका । इसलिए राष्ट्रीय सरकार का औचित्य समाप्त हो जाता है । जिम्मेदार राजनीतिक दलों को सत्तालोलुपता से बचना होगा तथा यथाशीघ्र संविधान निर्माण की प्रक्रिया को पूरा करना होगा । यही उनकी सबसे पहली जिम्मेदारी है ।
कुछ दिनों पहले कांग्रेस, एमाले, एमाओवादी, मधेशी मोर्चा आदि दलों ने राजनीतिक संवाद तथा सहमति समिति में महीनों से लम्बित अवरोध समाप्त करने के उद्देश्य से इसके सभापति बाबुराम भट्टर्राई को यह अधिकार दिया कि वे स्वविवेक से प्रतिवेदन तैयार कर संविधानसभा में पेश करें, जिस पर सदन में अभी बहस चल रही है । संविधान निर्माण के सर्न्दर्भ में निश्चय ही यह एक सकारात्मक कदम था । इससे अनुकूल वातावरण निर्मित हुआ । संविधान निर्माण का कार्य सिर्फनियम और सिद्धान्त निर्माण तक ही सीमित नहीं होता बल्कि यह एक राजनीतिक काम भी है । नेपाली राजनीति शुरु से ही विवादित रही है । जब तक यह विवाद समाप्त नहीं होगा, संविधान नहीं बन सकता । इस कारण अगर संविधान बनाना है तो पहले सकारात्मक राजनीतिक वातावरण का निर्माण करना होगा । लेकिन दर्ुभाग्यवश नेपाली राजनीतिज्ञ अपनी अनुकूलता के हिसाब से संविधान बनाना चाहते हैं । इस संकर्ीण्ा सोच से अगर हम ऊपर उठें तो अभी भी कुछ नहीं बिगडÞा है और नियत समय पर भले ही सम्भव नहीं हो, वैशाख, जेठ तक संविधान बनाया जा सकता है । लगभग दो महीने पहले एमाले और कांग्रेस के द्वारा दो तिहाई बहुमत के आधार पर संविधान बनाने की बात उठाने पर राजनीति गरमा गई थी और कुछ लोग इसके पक्ष में तथा कुछ इसके विपक्ष में अपनी राय व्यक्त कर रहे थे । लेकिन अभी राजनीतिक वातावरण में सहजता देखी जा सकती है । एक ओर जहाँ कांग्रेस, एमाले सहज हर्ुइ है, वही विपक्षी दल संयमित । इसने संविधान निर्माण की प्रक्रिया को सहजता प्रदान की है । लम्बे समय से संघीय संरचना, शासकीय स्वरूप, निर्वाचन प्रणाली जैसे विवादित विषयों पर अगर बहुमत प्राप्त दलों के द्वारा बहुमतीय प्रक्रिया का अवलम्बन किया जाए तो संविधान बन सकता है । प्रजातन्त्र में विवादित विषयों पर मत के माध्यम से फैसला लेना स्वाभाविक प्रक्रिया है । लेकिन विपक्षी दलों की सहमति से अगर संविधान का निर्माण होता है तो यह ज्यादा श्रेष्ठकर होगा ।
संविधान निर्माण का प्रमुख दायित्व कांग्रेस, एमाले, एमाओवादी, मधेशी दलों के ऊपर है । लेकिन इन दलों के चरित्र में अभी तक कोई परिवर्तन नहीं आया है । इनके बीच का विवाद घटने के बजाए दिनानुदिन बढÞता जा रहा है । इनकी मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं आया है । अगर ऐसा ही रहा तो संविधान बन जाने के बाद भी क्या फरक पडÞेगा – कहने को तो अभी भी हमारे पास अन्तरिम संविधान तो है ही । ब्रिटने जैसा देश बिना संविधान के ही सफलतापर्ूवक प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का सञ्चालन कर रहा है, जब तक हम अपनी सोच नहीं बदलेंगे, तब तक संविधान हमारे लिए एक कागज के टुकडÞे से अधिक कुछ नहीं होगा । देश अभी इतिहास के गम्भीर मोडÞ पर खडÞा है । २०६२/६३ का विशाल जनआन्दोलन, शान्ति प्रक्रिया, संविधानसभा का निर्वाचन तथा गणतन्त्र की स्थापना के परिणामस्वरूप देश में जो परिवर्तन की लहर आई है, जब तक हम संविधान नहीं बना लेते, तब तक इसके गन्तव्य तक नहीं पहुँचा जा सकता । मधेश जन आन्दोलन द्वारा स्थापित राजनीतिक शक्ति निष्प्रभावी होती जा रही है । दूसरी ओर कांग्रेस, एमाले को पिछले आम चुनाव में मधेश में भले ही कुछ अधिक सीट प्राप्त हो गया हो, लेकिन मत प्रतिशत में कोई खास वृद्धि नहीं हर्ुइ है । यह मत मधेश केन्द्रित राजनीतिक दलों में ही विभाजित हुआ है । इस कारण अभी मधेश में एक राजनीतिक रिक्तता पैदा हो गई है । जिसने सीके राउत को जन्माया है । मधेशी युवाओं को विशेष कर इस में आशा की किरण नजर आ रही है । अभी बिना सही गलत का विचार किए विरोध के लिए विरोध करने की प्रवृत्ति हावी है । कहीं से भी कोई भी प्रस्ताव आता है तो दूसरा उसका विरोध करने लग जाता है । राजनीतिक दल ही इसके लिए दोषी हैं । उन्हें सही और गलत का विचार कर ही कदम उठाना चाहिए । आजकल  प्रचार का जमाना है । प्रचार माध्यम का सहारा लेकर सही को गलत और गलत को सही ठहरा दिया जाता है । संविधान के प्रमुख विषयों पर आम सहमति और प्रतिवद्धता आवश्यक है । आवश्यकता हो तो विशेषज्ञों की भी राय ली जा सकती है । जिससे अल्पसंख्यकों और मधेशियों के हितों की रक्षा हो सके ।
संविधान निर्माण में राष्ट्रहित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए लेकिन अभी भी इस पर व्यक्तिगत हित ही हावी है । नेताओं की अभिव्यक्ति से ऐसा लगता है कि अभी भी उनकी शक्ति की भूख मिटी नहीं है । स्वयं प्रधानमन्त्री कोइराला यह अभिव्यक्ति दे चुके हैं कि संविधान निर्माण के पश्चात् वे प्रधानमन्त्री की कर्ुर्सर्ीीोडÞ देंगे । उनके इस वक्तव्य में सन्यास से ज्यादा राष्ट्रपति बनने की कामना परिलक्षित होती है । अगर ऐसा हुआ तो नेपाली कांग्रेस पार्टर्ीीें प्रधानमन्त्री बनने के लिए देउवा का रास्ता साफ हो जाएगा । लेकिन यह सब निर्भर होगा आगामी आम निर्वाचन के परिणाम पर । एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली की अपनी ही इच्छा और आकांक्षा है । संविधान निर्माण के पश्चात् उनका भी सपना है कि वे प्रधानमन्त्री बनें । मोदी मन्त्र का प्रभाव है या फिर कुछ और लेकिन आजकल सहमतीय संविधान विरुद्ध ओली का सशक्त प्रतिरोध एकाएक कम हो गया है । अभी के पर्रि्रेक्ष्य में एनेकपा माओवादी को संविधान बनने से सबसे ज्यादा फायदा मिलने की सम्भावना है लेकिन यह दल अभी संविधान नहीं बनने देने के खेल में लिप्त है । संविधान बनने से उसे यह फायदा होगा कि वह आगामी निर्वाचन में अपने एजेण्डÞा की जीत की घोषणा कर आगे बढÞ सकता है । अभी की स्थिति में वह पहले से ही एक छोटा दल है और लगातार इसके कार्यकर्ता वैद्य या चन्द के खेमा तरफ जा रहे हैं । इसके कुछ कार्यकर्ता एमाले की तरफ भी आकषिर्त हो रहे हैं । वर्ग संर्घष्ा का राजनीतिक विचार ढÞोने वाला राजनीतिक दल जातीय संघीयता का पक्षधर बन चित्रबहादुर केसी के साथ प्रतिस्पर्धा में लीन है । एमाओवादी अगर सात या आठ प्रदेश में समझौता कर लोकतान्त्रिक संविधान निर्माण में सहयोग करता है तो भविष्य में उसे इसका लाभ अवश्य मिलेगा, और उसकी राजनीतिक अवस्था सुदृढÞ होगी । लेकिन एमाओवादी को यह समझना पडÞेगा कि द्वन्द्व की राजनीति छोडÞ शान्ति का रास्ता अपनाने के कारण ही उसे पहले आम निर्वाचन में जीत हासिल हर्ुइ थी । लेकिन जनता की कसौटी पर खरा नहीं उतरने के कारण दूसरे आम निर्वाचन में उसे करारी हार का सामना करना पडÞा । वर्तमान सत्ताधारी दल कांग्रेस और एमाले जितना भी लोकतन्त्रवाद का ढÞोल बजाएँ, वास्तविकता यही है कि सरकार, भ्रष्टाचार, नातावाद तथा कृपावाद में लिप्त है । साधारण जनता कितनी भी क्षमतावान क्यों न हो, सरकार में उसकी भागीदारी न्यून है । दलित, महिला, मधेशी को भले ही आरक्षण मिला है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है । आवश्यकता है, जातीय विवाद को छोडÞ कर आर्थिक आधार पर काम करने की ।
संविधान निर्माण का मुख्य दायित्व संविधानसभा का है । संविधान निर्माण के सर्न्दर्भ में संविधानसभा र्सार्वभौम है । प्रधानमन्त्री संविधानसभा की र्सार्वभौकिता का रक्षक है । उसकी भूमिका एक संयोजक की है, जिससे संविधानसभा वाद विवाद में नहीं उलझे । डा. बाबुराम भट्टर्राई, पुष्पकमल दाहाल, माधव नेपाल तथा झलनाथ खनाल आदि अपने प्रधानमन्त्रित्व में संविधान निर्माण नहीं करा सके और एक असफल प्रधानमन्त्री साबित हुए । अब देखना यह है कि वर्तमान प्रधानमन्त्री सुशील कोइराला अपने काल में संविधान निर्माण करा कर एक सफल

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