अनिश्चितता के साए में मधेश–आन्दोलन

कुमार सच्चिदानन्द:मधेश आन्दोलन के लगभग तीन महीने पूरे होने जा रहे हैं, मगर यह अब भी जारी है । एक अनिश्चितता का साया इस पर अब भी लहरा रहा है क्योंकि समाधान की कोई स्पष्ट दिशा नहीं दिखलाई दे रही है । दूसरा पक्ष यह है कि इसका कुप्रभाव समूचे देश पर देखा जा रहा है । तराई के शहरों की सड़कें उजाड़ और बियावान हैं और उद्योग–व्यवसाय पूरी तरह ठप्प । इसके कुप्रभाव की काली छाया से राजधानी भी अछूती नहीं । आवश्यक आवश्यकता की वस्तुओं के अभाव के कारण राजधानी का आम जीवन त्रसित है । लेकिन समस्याओं के समाधान की दिशा में सरकार की ओर से अब तक जो भी पहल हुई हैं उसे नाकाफी कहा जा रहा है । वात्र्ता की मेज पर समस्याओं के समाधान की जो थोड़ी बहुत आशा थी वह वीरगंज के स्थानीय प्रशासन की अदूरदर्शिता की नीति के कारण क्षीण तब हो गई जब उसने १६ गते कार्तिक की सुबह मैत्री पुल को छापामार शैली में खाली कराकर नेपाल में फँसे भारतीय भारी वाहनों को निकालने का प्रयास किया और एक तरह से विश्व समुदाय को यह संदेश देने का प्रयास किया कि वीरगंज नाका का मुख्य मार्ग पर से आन्दोलनकारियों का कब्जा खत्म हो गया और भारत अब सहज रूप में ईंधन तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति कर सकता है । मगर पासा पलटते देर नहीं लगी । मैत्री पुल पर फिर से आन्दोलनकारियों का कब्जा हो गया । हजारों आन्दोलनकारी आनन–फानन में वहाँ पहुँच गए । दिन भर मैत्री पुल के साथ–साथ पूरे शहर में झड़पें होने लगीं । दर्जनों लोग घायल हुए और दो लोगों की मृत्यु भी हुई जिसमें एक भारतीय नागरिक भी है । इस घटना का प्रभाव यह हुआ कि त्योहारों के इस मौसम में त्योहार और आन्दोलन को साथ–साथ ले चलने के मनोविज्ञान में चल रहे मधेश की जनता में एक बार फिर जागरण का संदेश गया और लगभग पूरी तराई एक बार फिर सड़कों पर उमड़ आयी । इस घटनाक्रम से सरकार और आन्दोलनकारी के बीच जो भी विश्वास का वातावरण बना था, वह सब चकनाचूर ।
आज मधेश की जनता का मनोविज्ञान विशाल रेगिस्तान के उस पथिक के समान है जो यात्रा प्रारम्भ कर चुका तो लौटने की बात भी नहीं सोच सकता, परिणाम चाहे जो भी हो । दूसरी ओर सरकार की स्थिति यह है कि लोकतांत्रिक संस्कारों से विमुख होकर वह इस सोच में है कि प्रजातंत्र के नाम पर भी व्यवस्था का ऐसा जाल बुना जाए जिसके तहत वे सदियों से मधेश और मधेशी जनता पर औपनिवेशिक शासन थोपते रहे हैं और आज के बदले हुए सन्दर्भों में भी उसकी निरन्तरता जारी रहे । इसलिए मधेश और मधेशी जनता की जो मुख्य माँगें हैं, उन्हें या तो वे संबोधित करने के मनोविज्ञान में नहीं हैं या शब्दों और विचारों का ऐसा ताना–बाना बुनते नजर आते हैं जिसमें सारी बातें उलझ कर रह जाए । सच यह है कि यह गाँठ तो शताब्दियों की है, सहज ही खुलनेवाली नहीं । दोनों पक्षों का यही मनोविज्ञान टकराव की जमीन है । यही कारण है कि सरकार अपने नागरिकों के लिए आवश्यक चीजों की आपूर्ति नहीं कर पा रही और अन्ध राष्ट्रवाद तथा स्वाभिमान के नारों को पिलाकर उसे सन्तुष्ट करना चाहती है । दूसरी ओर मधेश ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ के मनोविज्ञान में आरपार के संघर्ष में स्वयं को समर्पित कर चुका है और त्योहारों के इस मौसम में आन्दोलन को ही उत्सव बना दिया है । दमन की हर घटना आन्दोलनकारियों में ऊर्जा भरती है । इसलिए यह मान लेना कि टालमटोल कर आन्दोलन को लम्बा किया जाए, धीरे–धीरे यह स्वयं समाप्त हो जाएगा, यह एक अदूरदर्शी नीति ही मानी जाएगी ।
सत्ता के मद या अहंकार में हम चाहे इस तथ्य से मुँह क्यों न मोड़ लें लेकिन इतना तो माना ही जा सकता है कि इसने देश की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह जर्जर किया है । दुकानें बन्द हैं, उद्योग–व्यवसाय ठप्प हैं, शिक्षण संस्थाएँ अवरुद्ध हैं और सरकार की कर वसूली भी किसी न किसी रूप में बाधित है । इसका कुप्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ना स्वाभाविक है । लेकिन इन सबसे अलग बात यह हुई है कि भारत के साथ जो नेपाल के पारम्परिक सम्बन्ध थे, उसे इसने सतह पर ला दिया है । आज तक भारत नेपाल सम्बन्ध एक विरोधाभास से गुजर रहा था जिसके तहत दोनों देशों के बीच विशेष सम्बन्ध होने की बात कही जा रही थी, लेकिन परदे के पीछे यहाँ के राजनीतिज्ञों द्वारा भारत की जड़ें खोदने का प्रयास होता रहा था और नेपाल की मीडिया इसके लिए सक्रिय रही । लेकिन इस आन्दोलन में जिस तरह पूर्ववर्ती और वत्र्तमान सरकार ने भारत को घसीटा उसके बाद भारत को यह समझने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि नेपाल में उसका यथार्थ क्या है । वैसे भी नेपाल विदेशनीति के मामले में अन्तर्राष्ट्रीय जगत में असफल राष्ट्र माना जाता रहा है । प्रत्यक्ष रूप में भारत और चीन के बीच यह संतुलन रखने की बात करता है मगर नेपथ्य में तीसरी या साफ शब्दों में कहें तो पश्चिमी शक्तियों को खुलकर खेलने का अवसर प्रदान करता है । यही कारण है कि जमीनी हकीकत को न समझते हुए हमारे नेता ऐसे अदूरदर्शी कदम उठाते हैं जो देखने में तत्काल तो स्वाभिमान से लबालब दिखmाई देते हैं लेकिन राष्ट्र के लिए यह दीर्घकालीन रूप में विधायी नहीं हो सकता । आज नेपाल के राजनैतिक वृत्त में भारत के विरुद्ध चाहे जितना भी विषवपन किया जाए लेकिन ऐसा नहीं माना जा सकता कि वे इस तथ्य से अनजान है कि चीन के साथ भारत की शर्त पर उनकी आपूर्ति व्यवस्था कितनी प्रभावी और सहज रह सकती है ?bir-2 5

birganj (Jahangast)

birganj (Jahangast)

यह सच है कि मधेश आन्दोलन लम्बे समय से जारी है और जनता में सरकार और सरकारी सन्यन्त्रों के प्रति निराशा की भावना भी है मगर आन्दोलनरत पक्ष अब भी नैराश्य की भावना में नहीं गए हैं । सरकार चाहे इसका जितना भी अवमूल्यन क्यों न करे मगर जो मधेश के जमीनी यथार्थ को जानते हैं, उन्हें इस बात को जानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि इस आन्दोलन को जारी रखने की प्रतिबद्धता के प्रति उनमें कोई कमी नहीं आई है । यही कारण है कि अन्याय की थोड़ी सी धमक पाकर ही लोग सजग और क्रियाशील हो जाते हैं । लेकिन दूसरा पक्ष यह भी है कि आन्दोलन जितना लम्बा होता जा रहा है लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है । खुले तौर पर लोग अब चौपालों पर और समूहों में सशस्त्र संघर्ष की बात करने लगे हैं और कुछ तो अपने नेताओं से बन्दूकें भी माँगने लगे हैं । यह भी सच है कि तराई में सशस्त्र संघर्ष सहज नहीं और इसके लिए जिन आधारभूत चीजों की जरुरी है, वे भी सहज प्राप्य नहीं । लेकिन जिस तरह कमजोर कूटनीति का परिचय यहाँ के राजनीतिज्ञों ने दिया है और एक पारम्परिक मित्र को शत्रु बनाने का प्रयास वे कर रहे हैं, उससे एक बात तो साफ है कि सहयोग की बात तो दूर, अगर वे आँख मूँद लें तो यहाँ सहज ही सशस्त्र द्वन्द्व की अवस्था सृजित हो सकती है और तब अलगाव की आवाज को रोकना मुश्किल सा हो सकता है । इसका खामियाजा चाहे मधेश को चाहे जितना भी भुगतना पड़े लेकिन देश भी इससे अछूता नहीं रहेगा । द्वन्द्व और संक्रमण से निकला हुआ देश अगर पुनः द्वन्द्व में फँसता है तो इस देश का भविष्य क्या होगा, इसे भविष्यवक्ता भी नहीं बता सकते ।
विगत दस वर्षों में मधेश ने जिस रूप में अपनी आवज बुलन्द की है और अपनी भाषा, संस्कृति तथा पहचान की स्थापना के लिए अपना रक्त बहाया और कुर्बानियाँ दी है, दूसरी ओर जिस तरह सरकार ने अधिकारों के नाम पर दिग्भ्रमित करने का प्रयास किया या स्थापित माँगों को कानून से बाहर ले जाने का प्रयास किया, उससे तो साफ है कि सरकार या सत्ता के साझेदार दलों में मधेश के प्रति कोई संवेदना नहीं । इस पंक से नेपाल के हर राष्ट्रीय दल पंकिल हैं चाहे वह नेपाली काँग्रेस या अन्य ही क्यों न हो । आज अवस्था यह है कि पूरा देश दो पाटों में विभाजित है । एक का सही दूसरे को गलत दिखलाई देती है । एक की राष्ट्रीयता दूसरे के लिए हास्यास्पद नजर आती है । ये सारी बातें राजनीति के स्तर पर देखने को मिलती है । मानवीय संवेदना तो ऐसी है कि जब महाभूकंप की महाविपदा से पहाड़ लड़ रहा था तो मधेश भी उसके आँसुओं में साथ था और सहयोग का हाथ लेकर खड़ा था । लेकिन आज अवस्था यह है कि मधेश अधिकारों के नाम पर बहने वाले खून के प्रति संवेदना प्रकट करने में भी लोग झिझकते हैं । इस लिए कहा जा सकता है कि दूरियाँ अगर कम करनी है तो विभेद को हटाना सरकार का दायित्व भी है और आज के सन्दर्भों में मजबूरी भी । विभेद का विश्लेषण आज इतना सूक्ष्म स्तर पर मधेश में हो रहा है कि लोग इन बातों का भी संज्ञान लेते और चर्चा करते नजर आते हैं कि जब नरेन्द्र मोदी का पुतला दहन होता या भारतीय तिरंगे को जलाया जाता तो सरकार की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, मोदी को विषय बनाकर खुलेआम राष्ट्रीय चैनलों पर व्यंग्य के कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते तो भी वे कार्रवाई के पात्र नहीं होते लेकिन जब चीन का झण्डा तराई में जलाया जाता तो पुलिस सीधी कार्रवाई करती है ।
सवाल यहाँ यह नहीं कि झण्डा चीन का जला या भारत का ? दोनों तरह की घटनाएँ किसी भी रूप में उचित नहीं । लेकिन सवाल उठता है कार्रवाई में विभेद क्यों ? स्पष्ट है कि यह शासकीय मनोविज्ञान है और यही विभेद आज भी तराई आन्दोलन को ऊर्जा प्रदान कर रहा है । एक बात तो मधेश के आन्दोलनरत पक्ष को विचार करना ही चाहिए कि जिस तरह सरकार इस आन्दोलन के प्रति दिशाहीन दिखलाई दे रही है । उससे स्पष्ट है कि उन्हों लम्बी लड़ाई अभी लड़नी है । अगर समाधान निकल भी गया तो शासकों के मनोविज्ञान में विभेद का जो कीड़ा अभी भी बैठा हुआ है उसे निष्क्रिय करने के लिए न जाने कितनी खुराकों की जरुरत होगी । इसलिए दोस्त बढ़ाए जाने चाहिए और किसी भी देश का झण्डा जलाकर हम कोई बेहतर संकेत नहीं दे सकते । फिर इससे कोई उपलबिध भी हासिल नहीं हो सकती । यह सच है कि नेपाल में चीन कूटनैतिक भूमिका खेलता है, अपने महत्व को स्थापित करना चाहता है लेकिन भारत से मित्रता की शर्त पर नहीं । यह बात दिल्ली में भारत के लिए चीनी राजदूत के बयान से भी साफ हो जाता है जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा था कि चीन ने जो बारह मैट्रिक टन पेट्रोलियम अनुदान स्वरूप नेपाल को देने की पेशकश की है वह आपातकालीन सहयोग मात्र है । इस सन्दर्भ में उसने कोई व्यापार समझौता नहीं किया । यह अलग बात है कि सरकार और मीडिया में चीन से आए महज कुछ टैंकरों ने जितनी चर्चा पायी उतनी चर्चा महाभूकंप के समय भारत से राहत सामग्री लेकर जानेवाली हजारों ट्रकों ने भी नही ले पायी । हमें यह बात समझ लेना चाहिए कि थोड़े में खुश और अधिक से असन्तुष्ट होना हमारा राष्ट्रीय मनोविज्ञान है ।
एक बात तो मानी ही जा सकती है कि देश में अगर असंतोष, अशान्ति और अराजकता होगी तो अन्य देशों के सरोकार बढ़ेंगे ही । यह सच है कि नेपाल भूपरिवेष्ठित देश है लेकिन इसे भारत परिवेष्ठित देश कहना अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि यह सच है कि चीन के साथ इसकी उत्तरी सीमा जुड़ती है भौगोलिक विषमता और भाषा संस्कृति का अन्तर दोनों देशों के नागरिको को उतना करीब नहीं जाने दे सकता । दूसरी ओर भारत के साथ हमारी खुली सीमा है, भाषिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक स्तरों पर ये एक दूसरे से गहरे रूप में जुड़े हैं और यहाँ के सम्बन्धों को ‘बेटी–रोटी का सम्बन्ध’ कह कर पारिभाषित किया जाता है । इसलिए इस जमीनी यथार्थ को समझे बिना अगर कोई भी नीति या कानून बनता है तो तो वह सर्वस्वीकार्य नहीं होगा और लोकतंत्र के इस युग में उसे बहुत दिनों तक दबाया भी नहीं जा सकता । यह सच है कि चीन भी हमारा पड़ोसी है मगर उसकी ओर बढ़ते हमारे असंतुलित कदम किसी न किसी रूप में हमें और अधिक कठिनाइयों में डाल सकते हैं । एक बात यह भी है कि अब अधिनायकबाद के युग में जाना नेपाल के लिए संभव नहीं ।
आज अवस्था यह है कि किसी न किसी रूप में मधेश के मुद्दों को भारत का नैतिक समर्थन मिल चुका है । इसे अस्वाभाविक भी नहीं माना जा सकता है क्योंकि तराई में पारम्परिक रूप से रहने वाले लोगों को भारतीय मूल का कहकर विभेद की आग को शासन तंत्र के द्वारा हवा दी जाती रही है । इसलिए भारत अगर इनकी राजनैतिक माँगों को संबोधित करने की सलाह दे रहा है तो उसे अस्वाभाविक भी नहीं माना जा सकता है । लेकिन आपूर्ति की असहज अवस्था को सहज करने के लिए जिस तरह के वैकल्पिक उपायों को आज ढूँढा जा रहा है और शीर्ष नेतृत्व द्वारा भारतीय पक्ष के प्रति असहज टिप्पणियाँ की जाती रही है उससे तो साफ है कि परिस्थितियाँ और जटिल हो सकती है । नेपाल की राजनीति और कूटनीति की सबसे बड़ी विफलता यह है कि भारतीय राजदूत के रूप में श्याम शरण के लौटने के बाद अब तक के सारे राजदूत आज नेपाल के प्रति मोदी सरकार के कदमों का समर्थन करते नजर आ रहे हैं और उनमें से एक ने तो यहाँ तक कह डाला है कि भारत का विरोध नेपाल में फैशन की तरह है । आशय साफ है कि हर आदमी एक कदम आगे बढ़कर इस फैशन को अपनाता दिखलाई देता है । दूसरी ओर भारतीय प्रधानमंत्री श्री मोदी की कार्यशैली यह है कि वे अपने ब्युरोक्रेट्स पर अधिक भरोसा करते हैं । यही कारण है कि विशेषदूत के रूप में उन्होंने किसी राजनेता को नहीं बल्कि अपने विदेश सचिव को यहाँ भेजा था । दूसरा पक्ष यह है कि नेपाली राजनीति की पूरी प्रवृत्ति से नेपाल के सन्दर्भ में भारतीय विदेश मंत्रालय की नकारत्मक सोच मानी जा सकती है । इसलिए आलोचना और गलतबयानी से कोई परिणाम निकलनेवाला नहीं है ।
हालत उलझे हुए हैं । मधेश अपनी जिद पर अड़ा है और सरकार की अपनी जिद है । वह यह समझने के लिए ही तैयार नहीं कि मधेश में राजनैतिक माँगों को लेकर कोई आन्दोलन भी हो रहा है । जब भी अवसर मिलता या तो वह आन्दोलन का अवमूल्यन करने में अपनी बुद्धि गँवाती है या उसे निष्प्रभावी बनाने के लिए कसरत करती नजर आती है । लेकिन सारी आड़ी–तिरछी रेखाओं को मधेश के लोग समझते हैं । इसलिए बेहतर है कि वात्र्ता या संवाद को अन्तिम न मानकर समाधान को लक्ष्य माना जाए । यह सोचकर अगर बातचीत होती है तो मधेश की समस्याओं का भी समाधान निकलेगा और देश को भी समाधान मिलेगा अन्यथा इन प्रवृत्तियों को आत्मवंचना का चरमोत्कर्ष ही माना जा सकता है ।

Loading...
%d bloggers like this: