अनुदान और सहयोग में सिमटी राजनीति-श्वेता दीप्ति

वर्ष-१९,अंक-१,अप्रिल  २०१६ (सम्पादकीय)

आत्मनिर्भरता मनुष्य को सबल बनाता है और सबल मनुष्य समाज को और समाज राष्ट्र को सबल बनाता है । नेपाल की वस्तुस्थिति पर अगर नजर डाली जाय तो यह तथ्य स्पष्ट होता है कि नेपाल ने आज तक सबल होने की कोशिश ही नहीं की है । अनुदान और सहयोग की अपेक्षा में राजनीति सिमटी रही और उसके भरोसे देश चलता रहा । राजतंत्र, प्रजातंत्र और अब लोकतंत्र की राह पर चलता देश फिलहाल कई असामान्य परिस्थितियों से गुजर रहा है । हर समस्या का समाधान होता है अगर ईमानदारी से समाधान खोजा जाय तो, किन्तु जब सोच ही बेईमान हो तो राह मिल ही नहीं सकती है । प्रधानमंत्री आज भी मधेश की सोच और माँग को दरकिनार करने की मनःस्थिति में नजर आ रहे हैं । सीमांकन की माँग को विखण्डनवाद से जोड़ा जा रहा है और विखण्डन का दोष कहीं और मढ़ा जा रहा है । जबकि इस सोच को बढ़ावा देश की सत्ता ही दे रही है । असंतुष्टता ही विखण्डन की सोच को पैदा करती है, इस सच से कोई इंकार नहीं कर सकता । जैसे–जैसे विलम्ब हो रहा है असंतोष की ज्वाला बढ़ती जा रही है और सत्ता की बेरुखी ज्यों की त्यों है ।
२०७२ का कैलेन्डर अपने अंतिम पृष्ठ पर है । एक बार फिर बैसाख का महीना दस्तक दे रहा है और उसके साथ ही बैसाख की कड़वी और दुखद यादें भी जेहन में ताजी हो रही हैं । वक्त गुजरा लेकिन जो जख्म दिया था प्रकृति ने वह दिलो दिमाग में पूर्ववत है । आज भी जिन्दगी खुले आसमान के नीचे बसर कर रही है । उम्मीद ही जीने का सहारा होती है और इसी के सहारे मनुष्य जी भी लेता है । आनेवाले वर्ष पर आशायुक्त नजरें टिकी हुई हैं । २०७३ सुखद हो, समृद्ध हो, मंगलमय हो । देश को एक सुनिश्चित आधार मिले और एक विकसित राष्ट्र की पहचान मिले इन्हीं शुभेच्छाओं के साथ—
उठो !
क्योंकि अभी बनना है तुम्हें सूर्य
बिखेरना है धरा पर वह प्रकाश
जो समस्त जन को उर्जस्वित करेगा
और निर्माण होगा एक नए युग का ।

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