अनैतिक दल और जटिल राजनीति

देवेश झा
आखिरकार काफी जद्दोजहद के बाद ने.क.पा.(एमाले) अध्यक्ष के.पीे.ओली ने अपने पद से त्यागपत्र दे ही दिया । अपने प्रधानमन्त्रित्व काल में ओलीजी अपनी कटुक्तियों के लिये मधेस में अधिक जाने गये । जब मधेसी जनता सरकारी गोलियों का निशाना बनाई जा रही थी तो ओलीजी को लगता था कि दो–चार आम के गिर जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा । लाखों मधेसियों द्वारा सैकड़ौं मील लम्बी बनाई गई मानव श्रृंखला उन्हें मक्खियों की श्रृंखला दिख रही थी । फबतियाँ कसना शायद उनकी आदत रही है, पर सरकार प्रमुख के रूप में उनके द्वारा की गई टिप्पणियों ने सामुदायिक रूप से समाज को क्षत–विक्षत कर डाला है । स्थिति की भयावहता को इसी से समझा जा सकता है कि उनके प्रधानमन्त्री पद से हटने पर मधेसियों ने ने.काँ. और माओवादियों के साथ मिल कर दीवाली मना डाली । अपने कार्यकाल में फब्तियाँ कसने और दूसरों को नीचा दिखाने में ही अपना बड़प्पन देखने वाले ओली भी आज अपना पतन देख रहे हैं । हालाँकि कुछ वफादार और राजावादी उनका महिमामण्डन करने में जोड़–तोड़ से लग गये हैं । परन्तु इस पूरी प्रक्रिया में संसदीय मूल्य और मान्यता को चकनाचूर कर दिया गया । के.पी. ओली की अपनी ही पार्टी एमाले के भीतर का चरम ध्रुवीकरण भी इस बार के उठापटक में खुलकर आ गया । के.पी.ओली विरुद्घ के अविश्वास प्रस्ताव पर अपना विचार रखने के बहाने एमाले के शीर्ष नेताओं ने भी अपने ही दल के प्रधानमन्त्री को कोसने में कोई कसर बाँकी नहीं रखा । वैसे एमाले अधिक दिनों तक सत्ता से बाहर रहने वाला दल नहीं है । चाहे ने.काँ. हो या माओवादी, यहाँ तक कि राजा ज्ञानेन्द्र के प्रत्यक्ष शासन में ‘आधा प्रतिगमन सुधारा गया’ कहते हुए इस दल के तत्कालीन अध्यक्ष माधव नेपाल ने प्रधानमन्त्री पद के लिये निवेदन भी दिया था । अभी या कुछ महीनों बाद राष्ट्रीय सरकार के नाम पर अगर एमाले भी सत्ता सुख लेना प्रारम्भ कर दे तो कोई अचरज नही माना जाना चाहिये । साथ ही अन्तिम क्षण में फोरम (लोकतान्त्रिक) और रा.प्र.पा. का सरकार से समर्थन वापस लेना भी रोचक प्रसंग ही माना जाएगा ।
अविश्वास प्रस्ताव के प्रस्तावक माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष प्रचण्ड का मन्तव्य बेहद तिक्ततापूर्ण और कटाक्ष से भरा हुआ रहा । उन्होंने तो ओली को संघीयता एवं गणतन्त्र का विरोधी तक कह डाला । राजावादियों से सामीप्यता पर भी प्रश्न किया प्रचण्ड ने, परन्तु वे स्वयं भी तो उसी सरकार में थे । अद्भुत तो यह रहा कि जिस बजट को उनके दल सहित सम्मिलित मन्त्रीमण्डल ने संयुक्त रूप से पारित किया था, उसी बजट को उन्होंने संसद में असफल करवा दिया । तो क्या प्रधानमन्त्री बनने की अवस्था में वे फिर से नया बजट लाएँगे ? प्रचण्ड अच्छी तरह जानते हैं कि संविधान संशोधन के बगैर मधेस समस्या का समाधान सम्भव नहीं है और अगर मधेस की माँगों के अनुसार संविधान संशोधन हुआ तो संशोधन करवाने में पहल करने वाले दल को राष्ट्रघाती का तमगा जड़ दिया जायगा । कहते हैं कि ‘साँप भी मरे और लाठी भी ना टूटे’। कुछ इसी तर्ज की रणनीति अपनाई है प्रचण्ड ने । इतना कोसे जाने के बाद निश्चित रूप से के.पी. अब किसी भी प्रकार का संशोधन होने नहीं देंगे । बस इसी बात का ठीकरा उनके सर पर फोड़ते हुए प्रचण्ड मधेस में मगरमच्छ के आँसू बहाकर मधेसी जनमानस को मोहने की कोशिश करेंगे । पर ये वही प्रचण्ड हैं जिन्हौने गौर नरसंहार के समय अपनी जनसेना और नेपाली सेना के संयुक्त कार्यवाही द्वारा मधेस को सबक सिखाने का प्रस्ताव किया था ।
ने.काँ. की स्थिति तो और भी दयनीय है । इस दल को दूसरे संविधान में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भी संसद में तीसरा स्थान पाने वाले दल के नेतृत्व को स्वीकार करने को बाध्य होना पड़ा है । देश में बढ़ते हुए बामपन्थी ध्रुवीकरण को रोकने में इस दल के नेतागण बारम्बार असफल हो रहे हैं । काँग्रेस के सभापति गिरिजाप्रसाद कोइराला ने ही पहले मधेस आन्दोलन के दौरान मधेसी आन्दोलनकारियों के साथ सम्झौते किये थे । दस्तावेजी रूप से नहीं लिखे जाने के बावजूद भी पहले मधेस आन्दोलन की मुख्य माँग समग्र मधेस एक प्रदेश ही था । परन्तु सुशील कोइराला ने अपने ही नेता द्वारा किये गये सम्झौतो ंको दरकिनार करते हुए संविधान जारी कर दिया । जिसे मधेस ने सम्पूर्ण रूप से अस्वीकार करते हुए संविधान की प्रतियाँ जलाई थी । उन्हीं के प्रधानमन्त्रित्व काल में ही मधेस में गोलियों की शुरुवात हुई थी जिसके कारण मधेस पाँच महिने से अधिक समय तक आन्दोलित रहा । कोइराला सरकार ने भयावह रूप से मधेस में दमन करना शुरु किया । सप्तरी के भारदह से शुरु किया गया नृशंसता का चक्र कोइराला सरकार के रहने तक विभत्सता के साथ चलाया जाता रहा । अब नये वादों के साथ सत्ता में आ रही यह पार्टी स्वयं द्वारा ही मधेस के साथ विगत में किये गये धोखे को किस प्रकार सुधारेगी, यह देखना बाँकी है ।
इधर मधेसी मोर्चा ने के.पी.ओली के नेतृत्व वाली सरकार को मधेस विरोधी कहते हुए अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में मतदान करने का निर्णय लेकर सत्ता के गलियारे में चोर दरवाजे से घुसने की कोशिश शुरु कर ही दिया । संसद के रोष्टम से मन्तव्य रखते हुए उपेन्द्र यादव ने प्रचण्ड को आने वाले दिनों में सम्भावित ‘मुसा प्रवृत्ति’ से सतर्क होने की सलाह दे डाली । उनका इशारा विजय गच्छदार की ओर था । फोरम का टूटना और नयी सरकार में विजय का उप–प्रम के रूप में सम्भावित पुनः प्रवेश की टीस शायद उपेन्द्र को बर्दाश्त नहीं हो पाया । ‘मुसा प्रवृत्ति’ नेपाली राजनीति का जाना पहचाना विशेषण है । वि.सं. २०५१ के बाद की तरल राजनीतिक अवस्था में लोकेन्द्र बहादुर चन्द की एमाले के समर्थन से बनी हुई सरकार के विरुद्घ अविश्वास प्रस्ताव पर बहस का अन्त होकर ज्योंही तत्कालीन सभामुख रामचन्द्र पौड़ेल ने मतदान किये जाने की प्रक्रिया प्रारम्भ होने की घोषणा की तो चन्द सरकार में मन्त्री रहे गजेन्द्र बाबू ने संसद में खड़े होकर सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी । अत्यन्त मृदु भाषा में कटाक्ष करते हुए तत्कालीन प्रधानमन्त्री चन्द ने इस व्यवहार की तुलना उन चूहों से की जो जहाज के डूबते समय उसमें से बाहर कूदकर भाग जाते है जिसमें वो स्वयं ही छेद करते हैं ।
मधेसी मोर्चा के सरकार में शामिल हो सकने की खबर चारों ओर से आ रही है । मोर्चा के दूसरे, तीसरे दर्जे के नेता÷कार्यकत्र्ता इस समाचार का खण्डन भी कर रहे हैं । परन्तु मोर्चा में शामिल किसी भी दल के अध्यक्ष ने अभी तक अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी है । शायद वे मधेस में सम्भावित प्रतिक्रिया का आकलन कर रहे हैं । मधेसी मोर्चा का बिना उचित तर्क के बारम्बार संसद में प्रदर्शित व्यवहार उन्हें शंका के घेरे में लाएगा ही । कभी सद्भावना पार्टी के सांसदों का संसद से त्यागपत्र का ड्रामा तो कभी सुशील कोइराला को प्रधानमन्त्री बनाने के लिये आन्दोलन को बीच में छोड़कर संसद में मतदान करना । और अब मधेस का हित सुनिश्चित किये बगैर ने.काँ., माओवादी केन्द्र गठबन्धन के पक्ष में वकालत करना मोर्चा का पिछले दरवाजे से सिंहदरबार में घुसने की कोशिश ही माना जाएगा । विजय गच्छदार तो खुले तौर पर सरकारी नेता बन गए हैं । उन्हें मधेस से कोई लेना–देना है ही नहीं । जहाँ कुर्सी वहाँ गच्छदार । देर सवेर बाँकी मधेसी दलपति भी झण्डा वाले गाड़ी पर चढ़ेंगे ही । बस एक कागजी आश्वासन का इन्तजार है उन्हें ताकि मधेस को ठगने का एक मौका और मिले । संघीय गठबन्धन का २६ बूँदे और मधेसी मोर्चा का ११ बूँदे माँग कहीं ओझल हो गया सा लग रहा है । स्पष्ट है कि बिना संविधान संशोधन के मधेस की समस्याओं का समाधान सम्भव नहीं है और संशोधन के लिये संसद में दो तिहाई सांसदों का समर्थन चाहिये । तोे क्या वर्तमान अवस्था में एमाले का सहयोग इस संशोधन के लिये मिलेगा ?
नेपाल की राजनीति बहुत अजब है । ये वो देश है जहाँ पर शासक समुदाय को उनके पुर्खों ने शासन सत्ता के कुछ गुर सिखाए हैं । ये सिर्फ लोगों को इस्तेमाल की चीज मानते हैं । इनके आपसी झगड़े का कोई मतलब नहीं होता । छोटी जगह होने के कारण प्रायः इनकी आपस में रिश्तेदारी निकल ही जाती है । बाँकी सब बाहर वाले हो जाते हैं । कौन सत्ता में है कौन बाहर, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है इस समुदाय को । क्योंकि किसी न किसी रिश्तेदार द्वारा ये अपना काम निकलवा ही लेते हैं । इसी का परिणाम है कि राणा शासन से लेकर शाहवंशीय राजा और उसके बाद अब गणतन्त्र तक भी एक ही समुदाय का बोलबाला रहा है । एकल पारिवारिक शासन प्रणाली से लेकर गणतन्त्र लागू हो जाने के बावजूद भी सामाजिक विभेद यथावत है । आज भी नेपाल में मधेसी, दलित, महिला, आदिवासी÷जनजाति संघर्षरत ही हैं । एक और अद्भुत बात है यहाँ कि राजनीति में । जब भी कोई नेता सत्ता के शिखर पर पहुँचता है तो वो उसे अपने प्रयास की सफलता बताता है परन्तु जब वही नेता सत्ताच्युत होता है तो उसमें उसे भारत का षडयन्त्र दिखाई देने लगता है । पंचशील सिद्घान्तों पर आधारित विदेश नीति का आलम यह है कि किसी भी मित्रराष्ट्र विरुद्घ नेपाली भूमि का प्रयोग नही होने देने का दावा करने वाले इस देश की राजधानी काठमाण्डू से इण्डियन एयरलाइन्स का विमान अपहरण हो जाता है । ‘एक चीन नीति’ पर खुद को अडिग दिखा रहे काठमाण्डू को यह भी नहीं पता है कि देश की उत्तरी सीमा से सटे गाँवों में हर घर में ‘फ्री तिब्बत’ का पर्चा पहँुचाया जा चुका है । अवसरवाद यहाँ के सत्ताधारियों की नस–नस में घुस चुका है । अराजकता अपनी चरम सीमा पर है । नातावाद के बिना किसी का कोई काम नहीं हो सकता । मुकुटधारी राजा के स्थान पर टोपीधारी राजाओं का आसन ग्रहण हो चुका है । सहमतीय राजनीति की व्याख्या यह है कि सर्वोच्च अदालत में भी न्यायाधीशों की नियुक्ति दलीय आधार पर होने लगी है । निराशा अपने चरम पर है । घृणा का सामुदायिकीकरण किया जा चुका है । सामाजिक सद्भाव तार–तार कर दिया गया है । राजनीतिक दलों के नेतागणों में नैतिकता नाम की कोई चीज रह नहीं गई है । सत्ता और भत्ता ही एकमात्र उद्देश्य बन चुका है नेपाल की शासन व्यवस्था में । ऐसे में कब कौन किस चरमपन्थी के लुभावने नारे में आ जाय, कुछ कहा नहीं जा सकता ।

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