अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद

प्रो. नवीन मिश्रा
राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने एक बड़ी चुनौती अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद की है । अलगाववादी तथा आतंकवादी संगठनों या व्यक्तियों के अध्ययन से, अपने शत्रु पर अघोषित परोक्ष रुप से युद्ध थोपना आज सम्भव है । जम्मू काश्मीर राज्य में घुसपैठिया भेज हजार प्रहारों से संहार वाली अपनी रणनीति का दुनिया भर में ढिंढोरा पीटने में पाकिस्तान को कभी संकोच नहीं हुआ । हालांकि ११ सितंबर २००२ को अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमलों के बाद अपने समर्थक, संधि मित्र अमेरिका की संवेदनशीलता को देखते उसने थोड़ा संभव बरतना आरम्भ कर दिया है ।
यह सोचना भ्रामक है कि अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद इस्लामी कट्टरपन्थी तक ही सीमित है या इसका शिकार सिर्फ संयुक्त राज्य अमेरिका या भारत ही है । रुस हो या चीन, जापान हो या इंडोनेशिया अथवा फ्रांस, स्पेन, आयरलैंड, कोई भी आतंकवादी खतरे से मुक्त नहीं । कहीं इस आतंकवाद की जड़े अल्पसंख्यक जातीय, उपराष्ट्रीय असंतोष में दवी है तो कहीं हिंस्रक हमलावर शुद्ध अराजकतावादी अथवा असामाजिक अपराधी तत्व हैं ।

श्रीलंका जैसे देशों की स्थिति बेहद सोचनीय है जहाँ राष्ट्रीय गृहयुद्ध से इतर किसी ओर परिप्रेक्ष्य में किया ही नहीं जा सकता । मध्यपूर्व में फिलिस्तानियों और इजराईलियों की रक्तरंजित मुठभेड़ों का इतिहास इस्लामी कट्टरपन्थी के उदय से कहीं अधिक पुराना है । अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद का अध्ययन करने वाले विद्वानों का मानना है कि कुछ राष्ट्र राज्यों का आचरण भी खुद आतंकवादी जैसा ही रहा है । वियतनाम में अमेरिका हो या चेचन्या में रुस यह आक्षेप दोनों महाशक्तियों पर लगाया जाता रहा है । संप्रभुराष्ट्र के आतंकवाद पर नकेल कौन लगा सकता है ? लिबिया, इरान, सद्दाम युगीन इराक, कट्टरपन्थी इस्लाम को राह देने वाला सऊदी अरब, उत्तर कोरिया और आतंकवादियों को पनाह देने को हर पल तैयार पाकिस्तान की गणना आतंकवादी राज्यों में की जाती रही है ।

विश्लेषकों का यह भी मानना है कि अपने अस्तित्व की सुरक्षा के लिए और अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए, वैचारिक भेदभाव भुलाकर आतंकवादी संगठन गठजोड़ द्वारा परस्पर एक सहायक बिरादरी का गठन कर चुके हैं । नेपाल के माओवादियों का नाता श्रीलंका के लिट्टे मुक्तिचीतों के साथ बताया जाता रहा है ।
एक और पेचीदगी, अपने राष्ट्रीय हित साधन के लिए बड़ी शक्तियों द्वारा बैरी या प्रतिद्वन्द्वी राज्य में सक्रिय आतंकवादियों को सहायता समर्थन देने की है । यह बात आज छुपी नहीं रह गई है कि अफगानिस्तान से सोवियत संघ का कब्जा हटाने के लिए ही संयुक्त राज्य अमेरिका ने तालीवान जैसे भस्मासुर–रक्तबीज जैसे राक्षसों को जन्म दिया । अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ अन्तर्राष्ट्रीय सुमदाय के संयुक्त मोर्चे को स्थापित करने के लिए अबतक के प्रयत्न आंशिक रुप से ही सफल हुए हैं । राष्ट्रीय सुरक्षा पर सोच विचार करते वक्त अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद को अनदेखा करना असम्भव हो गया है ।
मानवाधिकारों वाली गुत्थी बेहद उलझी हुई है । इनके प्रति अपनी पक्षधरता जगजाहिर करते वक्त अमेरिका को इस बात का जरा भी अहसास न था कि इसके कारण उसके सामने निकट भविष्य में ही कैसा भीषण संकट उठ खड़ा होगा । अक्सर बात कही जाती है कि जो व्यक्ति एक पक्ष को मुक्ति सैनिक लगता है, वहीं वह दूसरे पक्ष के लिए खुंखार आतंकवादी के रुप में प्रकट होता है । अपने मानवाधिकारों की रक्षा के लिए जिन लोगों ने हथियार उठाये, उनके आक्रोश के निशाने पर अक्सर अमेरिका या उसके साथी ही नजर आते रहे । यह भी सच है कि सोवियत संघ के विघटन और विलय के बाद खुद रुस को भी मानवाधिकारों की रक्षा का कवच ओढ़े सांप्रदायिक आतंकवाद का सामना करना पड़ा है ।
जहाँ तक दक्षिण एशिया का सवाल है, भारत की एकता और अखण्डता इस चुनौती के कारण संकटग्रस्त रही है ।

आमतौर पर इस सिलसिले में जन्मू–कश्मीर राज्य की उपद्रवग्रस्त स्थिति का उल्लेख किया जाता है, जहाँ लगभग चौथाई सदी से घुसपैठिये अलगावाद ने बढ़ती इस्लामी कट्टरपन्थी ने, आन्तरिक सुरक्षा को खतरे में डाला है । इसके पहले भी पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में उपराष्ट्रीय जनजातीय तत्वों ने, केन्द्र के प्रभुत्व को शास्त्र बगावत से चुनौती दी थी । आज नागालैंड और मिजोरम में युद्ध विराम लागू है, पर मणिपुर और असम में अभी भी विपल्वकारी, मानवाधिकारों की दुहाई देते, छापामार युद्ध को अपना मुक्ति संग्राम घोषित कर आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते रहे हैं । कुछ वर्ष पहले, पंजाब में खालिस्तान की स्थापना की मांग को भी भारतीय संघ में सिखों के मानवाधिकारों के उल्लंघन के साथ जोड़ कर अन्तर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश की गई थी ।
बांग्लादेश का जन्म जिस मुक्ति संग्राम से सम्पन्न हुआ था, उसका सुत्रपात भी नृशंस तानाशाह भाह्य खान और उसके भरोसेमन्द जनरल टिक्का खान द्वारा पूर्वी बंगाल के नागरिकों के मानवाधिकारों के उल्लंघन से ही हुआ था । आज भले ही, श्रीलंका में हुई सर्वनाशक गृहयुद्ध में युद्ध विराम न होने देने के लिए पाशविक मनोवृत्ति वाले लिट्टे मुक्ति चीतों और उनके नेता प्रभाकरण को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा, परन्तु इस बात से इन्कार करना कठिन है कि श्रीलंका में तमिलों के साथ हिंसलों के वर्षों तक चले अत्याचारी व्यवहार ने ही इस हिंसक नेतृत्व को उभरने और तेजी से आगे बढ़ने का मौका दिया ।
नेपाल में माओवादी नौजवानों ने राजा ज्ञानेन्द्र के अत्याचारी वंशवाद शासन को समाप्त करने के लिए और नेपाल में गणतन्त्र को समाप्त करने के लिए और नेपाल में गणतन्त्र की स्थापना के लिए एक क्रान्तिकारी आन्दोलन आरम्भ किया । उनकी अपनी पहचान औपनिवेशिक दौर के स्वाधीनता सैनिकों जैसी ही थी । पर ११ सितम्बर २००२ को हुए आतंकवादी हमलों के अनुभव के बाद अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद की चोट से तिलमिला रहा अमेरिका उन्हें भी आतंकवादी घोषित कर उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बतलाता रहा । कुछ विश्लेषकों के मत में इन नेपाली माओवादियों का घनिष्ट सम्बन्ध भारत के अनेक राज्यों में सक्रिय माओवादियों, नक्सलियों एवं्र जनसंग्रामियों के साथ रहा है जो भारत के अनेक राज्यों में सक्रिय हैं । एक बार फिर अपने मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संघर्षरत किसी भी सशस्त्र विद्रोही को आतंकवादी के रुप में बदनाम कर घरने, पराजित करने का संकट यहाँ भी प्रकट होता है । व्

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