अन्धराष्ट्रवाद के चपेट मे अर्थतन्त्र: नीता कर्ण

बीते सप्ताह की बात है । साईकिल पर आइसक्रीम बेचनेवाले एक भारतीय को पश्चिम नेपाल मे पीट पीट कर मार दिया गया । समाचार के मुताबिक पीटने वाले दोनों युवक महज १७ व १८ साल के थे । आइसक्रीम बेचकर गुजारा चलानेवाला वह भारतीय सुदूर पश्चिम नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र का बताया जाता है । ५० वर्षाें में नेपाली शासक ने मुल्क में क्या पैदा किया ? इसका जवाब यह घटना आपको देगी । सीमावर्ती क्षेत्र के चेहरे मिलते हैं । शासकों ने सीमा भीतर के लोगों को भी भारतीय कहकर सम्बोधन करना ,व्यवहार करना और भारत विरोधी अन्धराष्ट्रवाद का जहर कुछ इस तरह से सींचा है जिसका परिणाम यह घटना है । भारत विरोधी अन्धराष्ट्रवाद के जहर से किसी का भला नही हुआ है । नेपाल का भला होने के लिए भारत के साथ रिश्ते बेहतर होने होंगे । भारत के साथ अनबन हो तो उसका खामियाजा भारत को नही नेपाल को ज्यादा होता है और होगा । इसका गवाह पिछला बीता हुआ साल बता रहा है ।

भारत ने नेपाल के शासकों को सबका साथ लेकर क्या चलने को कहा उन्हें लगा भारत उन्हें दबाब दे रहा है । आज का दौर कुछ और है । दुनिया बदलती गयी है । रिश्ते बदलते गए हैं । दोस्ताना रिश्ते की अहमियत बढ़ती गयी है । कभी दो बड़ी लड़ाइयाँ लड़ने वाले नेपाल के दो आसन्न पड़ोसी के बीच आज दोस्ताने रिश्ते बढ़ते जा रहे हंै । ये बात और है दोनाें अपने सीमा विवाद को दरकिनार कर के अपने रिश्ते आगे बढ़ा रहे हैं । ये दोनों मुल्कों के लिए जरूरी माना जा रहा है । दोनो मुल्कों के बीच के आर्थिक और व्यापारिक रिश्ते बढ़ते जा रहे हैं । पर नेपाल अपने आसन्न एवं विशिष्ट पड़ोसी भारत के साथ के रिश्तों को इस कदर खराब करते आया है कि अर्थतन्त्र चौपट हो गया । कुछ भी भारत अच्छा सोचे उसमे हस्तक्षेप की बू नजर आने लगती है । इस कारण भारत विरोधी अन्धराष्ट्रवाद की जन्मघूँटी इस कदर पिलायी गयी है कि उसका तत्काल आँकलन कर पाना मुमकिन नहीं । नेपाल के शासकों को चाहिए सरकार बीच के रिश्तों को सुधार करने से काम चलनेवाला नही है । रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए भारत विरोधी जमीनी हकीकत को बदलना होगा । इसके लिए आन्दोलनरत मधेशवादी दलों के मधेश जनहितकारी मांगो को ईमानदारी पूर्वक मानना जरूरी है और उसको क्रियान्वयन करना जरूरी है । इस तरह के रवैये से नेपाल को क्या घाटा हुआ और क्या घाटा होने वाला है उसका आँकलन करना जरूरी है ।

नेपाल के जल सम्पदा के दोहन नेपाली जनता के हित के लिए करना जरूरी था, है और रहेगा । नेपाल सरकार ने अभी तक करीब ६ हजार २२ मेगावाट बिजली पैदा करने के लिए इजाजत पत्र जारी किया है । पनबिजली के उत्पादन के लिए भारतीय निवेशकर्ताओं ने ५१५७ मेगावाट उत्पादन करने के लिए इजाजत पत्र ली है ।

निवेश करो और तत्काल कोई निवेश कर दे ऐसा सोचना निवेश विधि प्रक्रिया को न समझनेवाली बात होगी । निवेश के लिए वातावरण बनाना बहुत जरूरी है । नेपाल के अधिकारी भारतीय निवेशकर्ता को दोष देते हैं । वे कहते हंै नेपाल मे जलविद्युत् आयोजना निर्माण कार्य पूरा न कर लाइसेन्स होल्ड करने वाला सबसे ज्यादा भारतीय प्रवद्र्धक है । ऊर्जा मन्त्रालय ने अभी तक ६ हजार २२ मेगावाट पनबिजली उत्पादन करने का लाइसेन्स वितरण किया है । जिनमें भारतीय प्रवद्र्धकों का हिस्सा ८५.६ प्रतिशत का है ।
भारत के सार्वजनिक तथा निजी दोनों क्षेत्रों को मिलाकर कुल १४ कम्पनियों के पास ५ हजार १५७ मेगावाटवाले बड़े क्षमतावाले १५ बड़ी आयोजनाओं का लाइसेन्स है । इसमे एस्सर ग्रुप के साथ संयुक्त लगानीवाले परियोजना में ८२ मेगावाट पनबिजली उत्पादन करनेवाले सोलु आयोजना का निर्माण कार्य जारी है । अन्य आयोजनाओं की बात करे तो पनबिजली उत्पादन अनुमतिपत्र के लिए विद्युत् विकास विभाग मे आवेदन दिया हुआ है ।

अन्य आयोजना के लिए होनेवाली शुरूवाती काम अभी अटका पड़ा है । भारतीय प्रवद्र्धकों ने विस्तृत आयोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार कर अनुमतिपत्र के लिए भी आवेदन दिया है । कुछ लगानीकर्ताओं ने नेपाल विद्युत् प्राधिकरण के साथ बिजली खरिद–बिक्री सम्झौता (पीपीए) करने के लिए भी आवेदन दिया है । कुछ लगानीकर्ताओं ने अमेरिकी डलरमा पीपीए करने के लिए भी आवेदन दिया है ।
सन् २००६में नेपाल में सम्पन्न प्रथम ऊर्जा सम्मेलन के बाद भारतीय निवेशकर्ताओं ने पनबिजली आयोजनाओं के लिए लाइसेन्स लेना शुरू किया था । उससे पहले भारत विरोधी नाराओं के साथ देश में माओवादियों ने सशस्त्र आन्दोलन छेड़ रखा था । सशस्त्र द्वन्द्व के वक्त लाइसेन्स लेने की चाहत भारतीयों मे नहीं थी । वैसे ऐसे वक्त मे निवेशकर्ता अपना निवेश डुबोना नही चाहते । निवेश डूबने के डर से जिन्दल पावर लिमिटेड जैसे कुछ बडेÞ भारतीय निवेशकर्ताओं ने आयोजना मे दिलचस्पी लेना छोड़ा था । उन्हें निवेश डूब जाने का डर था । निवेश करे न करें इस खीचतान मे उन लोगों का लाइसेन्स खारिज किया गया ।

निवेश बोर्ड के जरिए आगे बढ़ाया गया ९ सौ मेगावाट क्षमतावाली ऊँचीे कर्णाली और ९ सौ मेगावाट क्षमतावाली अरुण तृतीय पनबिजली आयोजनाओं के प्रवद्र्धक क्रमशः जीएमआर अपर कर्णाली हाइड्रोपावर लिमिटेड र एसजेभीएन अरुण ३ हाइड्रोपावर को भाद्र और पौष महीनों के भीतर निवेश संकलन करने का समय दिया गया है । ८ वर्ष पहले सरकार ने प्रतिस्पर्धा के माध्यम से ज्यादा ऊर्जा एवं शेयर निवेश करने की सहमति की थी । उसी के आधार पर जीएमआर को ऊँची कर्णाली और सतलज जलविद्युत् निगम लिमिटेड को अरुण तृतीय बनाने को कहा गया है । निवेश बोर्ड के साथ इसके लिए आयोजना विकास समझौता (पीडीए) हो चुका है ।

जीएमआर अभी भी निवेश के लिए साझेदार निवेशकर्ताओं को ढंूढ रहा है । ऊँची कर्णाली में एसियाली विकास बैंक (एडीबी), अन्तर्राष्ट्रीय वित्त निगम (आईएफसी) एवं युरोपियन इन्भेस्टमेन्ट बैंक (ईआईबी) के साथ निवेश के बारे में विचार विमर्श किया जा रहा है । इसी तरह सतलज ने भारत के पावर फाइनान्स कार्पोरेशन और पञ्जाब नेशनल बैंक से निवेश लाने का वादा किया है । इस सम्बन्ध मे उन लोगों के बीच ऋण सम्झौता नही हो पाया है । बैंक से ऋण लेने के विषय मे सहमति हो चुकी है और निवेश समझौता शीघ्र होंगे ऐसा एसजेभीएन के नेपालस्थित प्रतिनिधियों का कहना है ।

पनबिजली के क्षेत्र मे भारतीय निवेशकर्ता निवेश डुबाने के लिए नही करेंगे । उन्हें निवेश सुरक्षा के पुख्ता इन्तजाम करने चाहिए थे । जिससे निवेशकर्ता विषम परिस्थितियों मे भी आयोजनाओं को पूरा कर सकते थे । पर सारा का सारा खामियाजा भारत के निवेशकर्ताओं के मत्थे मढ़ा जा रहा है । नेपाल के पनबिजली का सबसे बड़ा बाजार भारत का होना और ज्यादातर निवेशकर्ता भारतीयों का होना नेपाल के आर्थिक विकास के लिए मजबूत पहल मानी जानी चाहिए थी पर ऐसा दिखा नही । सन् २००६ से पहले की बात छोड़ दें तो भी १० वर्षों तक निवेशकर्ताओं को आयोजना पूरा करने के लिए प्रोत्साहित करने चाहिए थे । पर ऐसा दिखा नही ।
अब बीते वर्ष की बात करें । मधेशी आन्दोलनकारियों ने सीमा पर अवरोध सृजना कर आन्दोलन करने पर सरकार और वर्तमान प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली ने भारतीयों का आन्दोलन कहा । भारत सरकार ने नाकाबन्दी लगाई कह कर देश भर भारत विरोधी जहर को फैलाने का काम किया गया।

भारतीय नाकाबन्दी के वक्त चिनियाँ सरकार ने अनुदान स्वरूप नेपाल को ‘इन्डक्सन’ चुल्हा दिया था । आन्दोलन के ५ महीने बीत चुके हैं । नाकाबन्दी खुल गया है । इन्धन एवं अन्य उपभोग्य वस्तुओं का आयात सहज हो चुका है, पर एक भी इन्डक्सन बिक्री नहीं हो पाया है । सरकार ने अनुदान मे मिले इन्डक्सन का मूल्य ४ महीने पहले ११ हजार ९९६ रुपये तय किए । इसको बिक्री करने का जिम्मा नेशनल ट्रेडिङ कम्पनी को दिया था ।
सीमा अवरोध के उस दौर में चीन द्वारा दिया गया १० हजार ५०० इन्डक्सन काठमाडू के त्रिभुवन अन्तर्राष्ट्रीय विमानस्थल के गोदाम में और १ हजार ३०० नेशनल ट्रेडिङ के टेकु स्थित गोदाम में रखा गया है । मंहगे दामो के चलते उसको खरीदने वाला कोई ग्राहक अभी तक नहीं मिला है । अधिकारियों के मुताबिक सरकार द्वारा तय किया मूल्य बजार मूल्य से ज्यादा होने के कारण एक भी इन्डक्सन नहीं बिका है ।
इसी तरह चीन ने अनुदान में सीमा अवरोध के समय १३ लाख लीटर पेट्रोल भी अनुदान दिया था । नेपाल आयल निगम ने भारत से आयात किए गए तेल के मूल्य में ही पेट्रोल बेचा था । पर कहा जाता है चीन से लाए गए पेट्रोल की लागत मूल्य १९० रुपये थी ।
इस तरह देखने से साफ पता चलता है कि नेपाल कोई उद्यम व्यापार व्यवसाय नहीं करना चाहता । देश को भारत विरोधी नारों के लिए सत्तासीन पार्टियों से मिलनेवाली धनराशि और कुछेक विदेशी सहयोग के बलबूते शासक देश को चलाना चाहते हैं । अन्धराष्ट्रवादी दृष्टिकोण को समाप्त कर एवं विश्व आर्थिक राजनीतिक परिदृश्य के साथ अर्थतन्त्र के विकास के लिए समकालीन रास्ते नेपाल को लेने हाेंगे । इसके लिए भारत की भूमिका को नेपाल में नजरअन्दाज करना बन्द करना होगा । भारत नेपाल के दरवाजे पर खुला दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है जहाँ नेपाल अपना उत्पाद सहजता एवं सरलता के साथ बेच सकता है और आवश्यक वस्तुएँ खरीद सकता है । इसके लिए देश के अन्दर जमे अन्धराष्ट्रवादी जहर को बदलना होगा । वरना कोई भी निवेशकर्ता साइकल पर सवार आइसक्रीम बेचनेवालों की तरह हविगत बनने के लिए खुद उतारु नहीं होना चाहेंगे ।

Loading...