अपनी अधिकार सुरक्षित करने का वक्त आ गया है (भाग ३)

हम लोग विखण्डनकारी नहीं हैं
हम लोग गर्व के साथ कहते हैं– हम बहुजातीय हैं, बहुभाषिक हैं । हमारी यही पहचान हमारे लिए ताकत भी है । लेकिन शासक वर्ग ने हम लोगों को विभाजित कर दिया है । हम लोग विभाजित होने के कारण ही कमजोर हो गए है । हमारी यही कमजोरी ही उन लोगों को सत्ता में हरदम बने रहने के लिए सुरक्षित करता है । दूसरी बात, हम विभाजित होने के कारण ही हमारी पहचान स्थापित नहंी हो रही है । पहचान स्थापित करना है तो अब संयुक्त होकर लड़ना होगा । हम लोगों के ऊपर जो विखण्डनकारी का आरोप है, वो गलत है । हमारी लडाई पहचान और अधिकार की है । हमारा संघर्ष अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास के संरक्षण के लिए है । क्योंकि हमारे ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण कहां हो रहा है ? हमारे धार्मिक स्थलों का संरक्षण कहा हो रहा है ? हमारी भाषा का संरक्षण कहा है ? नहीं, कहीं भी नहीं । मैं चाहता हूँं हमारी भावी पीढ़ी अब इस तरह का प्रश्न ना करें । इसीलिए हम लोग हमारी पहचान का संरक्षण चाहते हैं ।
हमारे शासक वर्ग के लोग अभी गर्व के साथ कह रहे है कि हम लोगों ने संविधान निर्माण किया, अब वह संविधान कार्यान्वयन करने जा रहे हैं । वे लोग कहते हैं कि चुनाव के बाद संविधान कार्यान्वयन सफल हो जाएगा । लेकिन यह संविधान खूनी संविधान है । जिस दिन संविधान जारी किया, उस दिन संविधान के विरोध में खून बहा है । इसीलिए वर्तमान संविधान सर्वस्वीकार्य नहीं है, खूनी है यह संविधान । संविधान को सर्वस्वीकार्य बनाना है तो उस में हम जो चाहते हैं, उसके अनुसार संशोधन होना चाहिए । संविधान के ३०६ धाराओं में से लगभग १८० धारा में संशोधन की आवश्यकता है । उन्हीं धाराओं में हमारा अधिकार संकुचित हो रहा है ।

मधेश आंदोलन के क्रम में तत्कालीन राज्य सत्ता से लिखित सहमति की गई थी, उसमें लिखा है कि मधेश में रहनेवाली जनता की भावना को उच्च सम्मान करते हुए मधेश एक स्वायत्त राज्य बन जाएगा । अन्य जातजाति की भी स्वायत्त राज्य बनाने की बात उस सम्झौता में की गई है । आन्दोलन के बाद की गई सम्झौता में कहा गया है कि हर राज्य स्वायत्त और अधिकार सम्पन्न हो जाएगा । लेकिन जब संविधान निर्माण हो रहा था, उस वक्त हमारे साथ की गई सहमति को पूरी तरह अनदेखा कर दिया । हम लोगों ने जनआन्दोलन, मधेश आन्दोलन और जनजाति आन्दोलन से जो उपलब्धि हासिल किया था, वह सब वर्तमान संविधान के कारण खो गया है । अन्तरिम संविधान में ही उल्लेख है कि आन्दोलन और क्रान्ति से प्राप्त उपलब्धि को संविधानसभा द्वारा संस्थागत किया जाएगा । लेकिन नयाँ संविधान निर्माण करते वक्त उस को लागू नहीं किया गया ।
आज शासक वर्ग ‘गांव–गांव में सिंहदरबार पहुँच रहा है’ कह कर चिल्ला रहे हैं । वे लोग कहते हैं– ‘सिंहदरबार का अधिकार गांव तक पहुँच गया है । नहीं, यह झूठ है । सत्य तो यह है कि सिहंदरबार ही गांव तथा नगरपालिका को कब्जा कर रहा है । गावँपालिका में जो कर्मचारी जाते हैं, वह सिंहदरबार से जाते हैं । अगर अधिकार गांव में होता तो यह अधिकार स्थानीय तह को होता था ! ऐसा क्यों नहीं हो रहा है ? इसीलिए कि आज जो संघीयता है, वह सिर्फ नाम मात्र की संघीयता है ।
अन्तरिम संविधान ने हमारे महिला मां–बहन को जो अधिकार दिया था, वह अधिकार वर्तमान संविधान के जरिए कब्जा कर लिया है । विविध जातजाति और भाषाभाषी को प्राप्त अधिकार भी वर्तमान संविधान ने अपने कब्जा में लिया है । सुरक्षा निकाय हो अथवा निजामती प्रशासन, वहां भी हम लोग अपना चेहरा नहीं देख पाते हैं । वहां एक ही बनावट के ‘नाक’ वाले व्यक्ति रहते हैं । संविधान इस तरह जारी किया है कि शासक वर्ग स्वयम् ने खुद को सुरक्षित किया है । ३१ प्रतिशत का आरक्षण शासक वर्ग ने खुद के लिए रखा है । खुम्बुवान में उसकी उपस्थिति अत्यन्त न्यून हो सकती । लेकिन वहां शासक वर्ग के लिए ३१ प्रतिशत सीट सुरक्षित करना पड़ता है । अभी जो शासक वर्ग है, उनकी उपस्थिति भी मधेश में कम है । लेकिन वहां भी उनके लिए ३१ प्रतिशत सीट सुरक्षित किया गया है । यह कैसी व्यवस्था है ? इसीलिए वर्तमान संविधान, अन्तरिम संविधान से भी पश्चगामी है, जिसने हमारे अधिकारी का कटौती किया है । इसीलिए हमारा संघर्ष वर्तमान संविधान के विरुद्ध में भी है । क्योंकि अभी जो संघीय संरचना प्रस्तावित है, वह वर्तमान संविधान के अनुसार ही बना है । जब तक इस संरचना में परिवर्तन नहीं होगा, तब तक शोषण से मुक्ति पाना सम्भव नहीं है । इसीलिए हमारा संघर्ष मुक्ति के लिए है । वर्तमान संविधान, नियम–कानून और संरचना से हम लोगों को मुक्ति प्राप्त करना ही होगा । जब तक इस तथ्य को स्वीकार नहीं करते हैं, तब तक मुक्ति सम्भव नहीं है ।


चुनावः लडाई का दूसरा मोर्चा
अभी हम निर्वाचन में सहभागी होने जा रहे हैं । हमारे लिए यह एक लडाई ही है । अब वोट देनेवाले आम मतदाता को सोचने का समय आ गया है । वोट किसके लिए ? किस लिए ? क्या हमारा वोट अमुक नेताओं को चुनाव जिताने के लिए ही है या मुक्ति के लिए भी ? हम जिसको वोट देते हैं, उससे शहीदों का सम्मान होता है कि नहीं ? अगर नहीं होता है तो उस तरह का वोट देने का कोई अर्थ नहीं है । हमारे वोटों से हमारे ही अधिकार को सुरक्षित करना चाहिए । मुझे लगता है कि हम में से कुछ लोग फिर भी शासक वर्ग के नारें में ही आकर्षित हो रहे हैं । हम लोग ‘राष्ट्र और राष्ट्रीयता बचाव’ के झूठे नारा में ही बहक रहे हैं । शासक वर्ग ‘राष्ट्र बचाव’ और ‘देश बचाव’ का नारे लगा रहे हैं । आप ही बताइए कि हमारे देश को कहां से खतरा है ? अपने ही देश में रहनेवाले नागरिक से भी कहीं देश को खतरा हो सकता है ? इसीलिए शासक वर्ग के गलत और झूठा नारा में बहक कर अपनी वोट का दुरुपयोग न करें । हां, खतरा तो उन लोगों के शासन पर है, जो हमारा अधिकार हड़प कर शासक बन रहे हैं । निश्चय ही हमारे अधिकार को कब्जा कर शासन करनेवालों के ऊपर अब खतरा होना ही चाहिए । हो भी रहा है । इसीलिए अब राष्ट्र और राष्ट्रीयता के झूठे नारे से बाहर निकलना होगा और अपनी पहचान और अधिकार सुरक्षित करने का समय भी यही है । अब तो सही व्यक्ति को वोट देकर अपना अधिकार और पहचान सुरक्षित करना है ।
देश, हमारा है । इसका संरक्षण करना भी हमारा कर्तव्य है । लेकिन राष्ट्र और राष्ट्रीयता के नाम में विशेष जातजाति, भाषाभाषी और सांस्कृतिक समुदाय के ऊपर शोषण किया जाता है तो वह स्वीकार्य नहीं हो सकता । इसीलिए अब राष्ट्र और राष्ट्रीयता के नाम में बिछाए गए शब्द जालों से बाहर आना होगा, नहीं तो हम लोग आगे नहीं बढ़ पाएंगे । मैं पहले भी कह चुका हूँ– जब–जब शासक वर्ग कमजोर पड़ते जाते हैं, वे लोग राष्ट्र और राष्ट्रीयता का नारा लगाते हैं । अभी वही हो रहा है । इसीलिए इन सब ढोंगी शासक वर्गों की झूठी प्रचारबाजी से हम लोगों को बाहर निकालना ही होगा । समाप्त
(राजपा और खुम्बुवान राष्ट्रीय मोर्चा के बीच सम्पन्न पार्टी एकीकरण कार्यक्रम में राष्ट्रीय जनता पार्टी (राजपा) के अध्यक्ष मण्डल के संयोजक महन्थ ठाकुर द्वारा दिए गए मन्तव्य का सम्पादित अंश)

प्रस्तुतिः लिलानाथ गौतम

 

हमारी आवाज की गलत व्याख्या की जाती है (भाग १)

हमारा संघर्ष विखण्डन के लिए नहीं, पहचान के लिए हैं (भाग २)

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