अपनी पीठ थपथपाईए !
मुकुन्द अचार्य

यह दुनियाँ बडी जालीम और बर्दर्द है। दूसरे का सुख देखकर इसका दिल बैठ जाता है और दूसरे का दुःख देकर इसका कलेजा ठंडÞा होता है। अजीव फितरत पाई है, इस दुनिया ने। इसलिए हम आपस में मिलकर अपनी पीठ खुद थपथपाएँ। खुद अपनी तारीफ करें। लोग कहेंगे, अपने मुँह मीयां मिठ्ठू। कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। इस में शरमाने की जरुरत नहीं है। जिसने की शरम उसके फूटे करम। दुनियां तो खुदगर्ज है। इसे कहां फुरसत है, जो हमारी तारीफ करे।
अब यकीनन आप फरमाएंगे, हमने कौन सा तीर मार लिया, जो हम खुद अपनी पीठ थपथपाते रहें। यही तो रोना है, हीरे को अपनी कीमत का पता ही नहीं। आईए मैं बताता हूँ, हम आप कितने खुशनसीब हैं। जानकर आप को बेहद खुशी होगी और आप अपनी पीठ थपथपाने को मचल उठेंगे।
राजधानी की सडÞकों का जरा नजारा लीजिए। जगह जगह में ‘रानीपोखरी’ नजर आएंगे। आप उन पोखरों में अपने वाहन सहित तैराकी का मजा ले सकते हैं। वह भी निःशुल्क, विल्कुल प|mी में। फुटपाथ पर बाजार सजे हैं, मजे ही मजे हैं। बेचारे पैदल यात्री हवाई पुल में चढÞते हैं तो वहाँ भी बाजार। खाली जगहों में मानव मल यत्र-तत्रर्-र्सवत्र शोभायमान। फिर भी हम अपनी सभ्यता में किसीसे कम नहीं हैं। वाह रे हम ! वाह रे हमारी सभ्यता !
देश में पिछले अनेक वर्षों से कोई साफ सुथरी सरकार नहीं बन पाई। खुदानखास्ता बन भी गई तो टिक नहीं पाई। फिर भी हम किसी से कम नहीं। हम आराम से हँसते, मौज मस्ती में जी रहे हैं। देश जाय भाँड में !
ऐसा नहीं कि देश में कानून नहीं है। कानून है और उसे तोडÞने के लिए पुलिस-अदालत सब अपनी-अपनी जगह पर मुस्तैद हैं। अपराध भी हो रहे हैं, अपराधी विदेशों से भी यहाँ मस्ती मारने के लिए आ जाते हैं। देश में प्राकृतिक सौर्न्दर्य काफी होने से विश्व के अच्छे-अच्छे अपराधी यहाँ खींचे चले आते हैं। उन लोगों को सुरक्षा देना सहयोग करना पुलिस का परम पावन कर्तव्य है। ‘अतिथि देवों भव’ को हम कैसे भूल जाएं। फिर पर्यटन को बढÞावा भी तो देना है।
देश की पार्टियाँ सत्ता में आने पर देश को लूटती है। सत्ता से हट्ते ही ‘देश सेवा करने के लिए’ अनेक समूह में फूटती हैं। ये पार्टियाँ कयों फूटती हैं, देश को कैसे लूटती है- इस मजेदार खेल के बारे में हर नागरिक जानता है, मगर कर कुछ नहीं सकता। पार्टियाँ थोक में गुण्डागर्दी का अभ्यास करती हैं।
सब को लूटने का मौका मिलना चाहिए। आखिर देश सबका है। सब को लूटने का जन्मसिद्ध अधिकार है। देश की बडÞी पार्टियाँ बारी बारी से देश को लूटें। यहाँ कानून भी बहुत ही लचकदार और उदार है। आप देश को एकमुष्ट भी लूट सकते हैं ओर देश को टुकडÞे टुकडे बनाकर भी लूट सकते हैं। आप की मर्जी, जैसे चाहें लूटें। मगर लूटें जरूर।
देश के सारे जंगलात दिनरात कट रहे हैं। किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं हैं। क्या मस्ती का नजारा है। इस मस्ती में हम क्यों न नाचे, गाएं – जश्न मनाएं – और खुद अपनी पीठ थपथपाएं ! अरे यार दूसरों को इतनी फुरसत कहां कि वे अपना काम धन्धा छोडÞकर आपकी पीठ थपथपाने आएंगे। यह जरुरी शुभ काम आप को खुद करना होगा।
कमसीन और खूबसूरत लडÞकियां खाडÞी देशों में काम करने जा रही हैं। पैसे अच्छे मिलते हैं। याराना भी अच्छा खासा मिल जाता है। फिर क्या चाहिए – देश को भी विदेशी मुद्रा मिल जाता है। सभी की बल्ले बल्ले ! वाह रे हम। अब आप हीं बताएं, हम अपनी पीठ क्यों न थपथपाएं !-
मिठाइयों की दुकान पर छापे, दूध उत्पादन केन्द्र में छापे, होटलों पर छापे, फिर भी हम सभी बडेÞ मजे में उन दुकानों में, होटलों में सब जगह निसंकोच खा-पी रहे हैं। कितना अच्छा स्वास्थ्य भगवान ने हमे दिया है। शराब उत्पादक तो जूते-मोजे भी सडÞागलाकर पकाकर ‘जूतरस’ का सोमरस बनाकर हमें पिलाते हैं। हम शान से पीते हैं। शान से जीते हैं। अब हमारी पीठ हम नहीं थपथपाएँगे तो क्या पडÞोसी को कहें थपथपाने के लिए -!
जब सारी चीजों में मिलावट हैं तो देशभक्ति में भी मिलावट ! इसे जब कोई रोक ही नहीं सकता तो इसे खुशी खुशी स्वीकार कर लेने में क्या हर्ज हैं – हम जैसे खालिस सज्जन तो इस सिद्धान्त कोर् इमानदारी से मानते हैं-
जैसे बीते काल, बिता देना ही होगा,
जो कुछ देगा दैव, हमें लेना ही होगा !
अब एक बार जरा जोर से जयकारा लगाईए- ‘वाह रे हम !’ इस अवसर पर मुझे हिन्दी के प्रख्यात कवि भवानीप्रसाद मिश्र की एक छोटीसी नन्ही मुन्नी कविता ‘नियति’ की याद आई है। लीजिए आप भी आनन्द लेंः-
‘एक अंधरे से दूसरे अंधेरे में
जो पहले से भी घना है
क्या यह देश इसी के लिए बना है -‘

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