अपने क्यों हुए पराए
प्रो.डा. आशा सिन्हा

अमित और सुमित में नजाने किस बात पर कहासुनी हो गई। दोनों भाई एक दूसरे का मुंह भी नहीं देखना चाहते। रिश्तेदारों के यहाँ होने वाले समारोह में भी वे पहले ही लिख देते हैं कि यदि एक को आमन्त्रित किया गया तो दूसरा वहाँ पैर भी न रखेगा। इससे भी अधिक रोचक दास्तान अन्य दो बन्धुओं की है, जिनमें पिछले दस वर्षों से बोलचाल बन्द है। न जाने किस सद्भावना के बशीभूत होकर छोटे भाई ने अपने बडेÞ भाईको पार्सलद्वारा मिर्ठाई भेज दी। लेकिन बडेÞ भाई ने इसे सरासर अपना अपमान माना और पुनः पार्सल द्वारा ही वह मिर्ठाई वापस भेज दी।
ये सभी उच्च शिक्षित, सम्पन्न और सहृदय लोग हैं। उनका समाज में विशिष्ट स्थान है, ये कार्यालय और काँलोनी में समान रुप से लोकप्रिय हैं। इनके मित्रों की संख्या बहुत अधिक है और ये उनकी मद्द करने के लिए सदैव जी जानसे तत्पर रहते हैं।
यदि कोई व्यक्ति अनपढÞ, संकर्ीण्ा विचारवाला अथवा बदमिजाज हो तब तो उसका अपने सगे भाई-बहनों से झगडÞा होना स्वाभाविक माना जा सकता है, परन्तु जो व्यक्ति समाज में लोकप्रिय, आदरणीय और शिष्ट माना जाता है, उसका अपने खून से मन मुटाव आर्श्चर्यजनक प्रतीत होता है। बहुधा ऐसा देखा जाता है कि जिन व्यक्तियों के अपने संवन्धियो से मधुर सम्बन्ध नहीं होते, वे अन्य सभी के साथ बहुत मधुर सम्बन्ध बनाए रखते हैं। विवाह जैसे बडेÞ समारोह में जब सारा समाज एकत्रित होता है, तब सगे-संवन्धियों की अनुपस्थिति अनेक प्रश्न उठाती है। घरके नौकर चाकर, दूरदराज के मित्र और पडÞोसी समारोह में स्वाभाविक रुप से आनन्द उठाते हैं, हास परिहास करते हैं। खाते-पीते हैं, उस में सगे भाई-भाभी कदम भी नहीं रख पाते। इन परिस्थितियों में कटुता परत दर परत हृदय पर जमती चली जाती है।
ऐसे व्यक्ति, जिनका अपने सहोदर से वैमनस्य हो वे भले ही समाज में आदर के पात्र हों पर उनके मित्र पीठ पीछे अवश्य उनकी भर्त्सना करते हैं, हँसी उडÞाते हैं। उचित भी है, सारे मुहल्ले को आप भोज में आमन्त्रित कीजिए और ठीक बगलके घरमें रहनेवाला भाई सपरिवार निमन्त्रित न हो, तो सामाजिक प्रतिक्रिया तो आप के विरुद्ध होगी ही।
कुछ लोग इतने कठोर नहीं होते कि परिवारिक समारोहों में सगे संबधियोंको निमन्त्रित ही न करे। उन्हें निमन्त्रित तो अवश्य करते हैं। परन्तु उनके आगमन पर ऐसा उपेक्षापर्ूण्ा व्यवहार करते हैं, जिससे वैमनस्य और भी बढÞ जाता है। कुछ लोग विवाह आदि समारोह में भी सगे-संबधियों से वैरभाव निकाल ही लेते हैं।
परेशानी, खासकर दुखदर्द के समय भाई-बहनों के सहायक होने से संबधों में मिठास बढÞती है। छोटे भाईको यदि व्यापार में घाटा हुआ तो उसने किसी अन्य व्यक्ति से सूद पर पैसा उधार लिया। परन्तु उसी शहर में रहनेवाले सगे भाई को कानोकान इस बात की भनक न लगने दी। मुझे यह बात बडी आर्श्चर्यजनक लगी और पूछने पर उसने कहा ‘भैया तो मेरे व्यापार में घाटा जानकर खुश होते। वे आर्थिक मदद तो करते नहीं, ऊपर से दस बातें सुनाते।’ बडेÞ भाई के व्यवहार पर मुझे बडÞा दुःख हुआ कि सगे भाई के प्रति मनमें ऐसा दुराग्रह ! पर शायद यही कडÞवा सत्य है। एक सा दानापानी मिला, एक जैसी ही शिक्षा और संस्कार मिले लेकिन बडÞे होने पर उनके बीच लम्बी दूरी क्यों खिंच गई – हाथ की पाँचों अंगुलियां बराबर नहीं होतीं। मातापिता अपने सभी बच्चों को बराबर प्यार करते हुए भी सब की जिन्दगी एक जैसी नहीं बना सकते। क्योंकि वे विधाता नहीं हैं। दो भाइयों में एक अमीर तो दूसरा गरीब भी हो सकता है, एक के बच्चे कुशाग्र तो दूसरे के मंदबुद्धि भी हो सकते हैं। परन्तु इस मेर्ंर् इष्र्या की क्या बात है –
हमारे पडÞोसी के पास कार है, हमारे पास नहीं है तो हम असंतुष्ट नहीं होते। परन्तु सगे भाई के पास कार है और हमारे पास नहीं है तो हम हीनभावना से ग्रस्त हो जाते हैं, आखिर क्यों – मनोवैज्ञानिक तो इसके कारण गिना देते हैं, तनाव, कुंठा, हीनभावना, बाल्यकाल का असंतोषर्,र् इष्र्या आदि-आदि। परन्तु सामाजिक प्रगतिशीलता जनित अवसरवादिता और स्वार्थी प्रवृत्ति ही इसके मूल कारण हैं। सहनशीलता का अभाव, हदसे अधिक की अपेक्षा और खुदको स्वयंभू समझने का भाव इसके अन्य कारण हैं। बहुधा कहा जाता है कि भाइयों का खून एक होता है, अतः वे सब एकता के सूत्र में बँधे होते है। किन्तु उनकी पत्नियाँ तो अलग-अलग परिवारों से आई होती हैं, वे उनमें वैमनस्य उत्पन्न करा देती हैं। लेकिन वह प्यार ही क्या जिन में कोई दूसरा दरार उत्पन्न कर दे – फिर पत्नी के वहकावे में आकर भाई से बैरभाव रखना कौन सी समझदारी है – यह सच है कि पत्नी अपने पति की आय पर पूरा अधिकार चाहती है। दूसरे घर से आने के कारण पतिगृह के सदस्यों से शीघ्र घुलमिल नहीं पाती। परन्तु ऐसे में समझदार पुरुष अपनी पत्नीको विश्वास में लेकर घर के सदस्यों का आपसी प्रेम बढÞाते हैं, न कि उसके कहने से भाई-भाई के दुश्मन बन जाते हैं। अपने परिवार के सदस्यों के प्रति अपेक्षाएँ होती हैं और अपेक्षाएँ सदैव दुःख का कारण बनती हैं। मित्रों के बीच अपेक्षाएँ न्यूनतम होती हैं, अतः उनके बीच प्रेम भाव बना रहता है किन्तु संबधियों के प्रति अपेक्षाएँ अधिक होने से कटुता अधिक उत्पन्न होती है।
अपनों पर क्रोध आने पर उनका सद्व्यवहार याद कीजिए, एक छोटा सा पत्र, बिगडी बात बना देता है। जोडÞना बडी बात है, तोडÞना तो बहुत आसान है। हृदय को विशाल बनाईए दुःखदर्द को त्यागकर बडÞप्पन सीखिए। आप को मित्र चुननेका अधिकार है, सहोदर चुनने का नहीं। यह जन्म का रिश्ता है, खून का सम्बन्ध है। यह जैसा भी है, आप का अपना है। प्रेम के पौधे को निरन्तर उर्बरक और पानी की आवश्यकता है, इसे सूखने न दीजिए।

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