अपने सामाजिक समरसता शर्म नहीं गर्व करें : पंकज दास

पंकज दास, काठमांडू , १९ जून |

हमारे यहां सबसे पवित्र पर्व छठ को माना गया लेकिन छठ की पूजा तभी पूरी होती है जब डोम समुदाय के लोगों द्वारा पथिया, सूप, कोनिया तैयार किया जाता है। ऐसे में कहां छुआछुत और जातीय विभेद की बात आती है। सदियों से चली आ रही है यह परम्परा। कभी किसी के मन में नहीं आया कि आखिर सबसे नीची जाति के माने जाने वाले डोम के हाथों से सबसे पवित्र महापर्व की पूजा सामग्री बनाई जाती है।

पंकज दास

पंकज दास

हमारे यहां जन्म पर किन्नर समाज के लोग बच्चे को आशीर्वाद देने के लिए आते हैं। चाहे कितने ही ऊंची जाति के लोग क्यों ना हो किन्नरों से आशीर्वाद लेना हमारे समाज में शुभ सगुन माना जाता है। किसी ने भी उनके साथ विभेद की बात नहीं सोची।

हमारे घरों में जब भी मुंडन संस्कार, उपनयन संस्कार, विवाह संस्कार, श्राद्ध संस्कार बिना नाई समाज के पूरा नहीं होता है। इन सभी संस्कारों में नाई समाज की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है। नाई समाज को हमेशा ही सम्मान दिया गया है।

विवाह जैसे पवित्र संस्कार में नाई, धोबी मोची, हलवाई को ले जाया जाता है। रीति रिवाज के मुताबिक सबके काम बंटे होते हैं। बिना इनके विवाह की रस्म पूरी हो ही नहीं सकती। इतना ही नहीं मंडप पर मिट्टी का जो हाथी, घैला आदि सजा होता है उसे कुम्हाल जाति के द्वारा तैयार किया जाता है। कभी किसी नाई, धोबी, मोची, हलवाई, कुम्हाल के साथ भेदभाव बरतते नहीं देखा।

अंतिम संस्कार के समय बिना डोम के काज किरिया पूरा नहीं माना जाता है। जब ग्रहण लगता है तो सबसे नीची जाति के कहे जाने वाले डोम को ही दान देकर बांकी सब लोग पवित्र समझते हैं। कहां कभी विभेद का भाव आता है।

सदियों से हमारा समाज कर्म के आधार भले ही अलग अलग नामों से पुकारे जाते हों लेकिन समाज के सभी वर्ग एक दूसरे किसी ना किसी रूप में बंधा रहे इसलिए हमारे पूर्वजों ने ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाई है जिससे सभी को किसी ना किसी रूप में सम्मान मिलता रहे।

सामाजिक समरसता का इससे अनुपम उदाहरण कहीं मिल नहीं सकता है। इसलिए अपने सामाजिक समरसता पर शर्म करने के बजाय उस पर गर्व करें। कर्मों के आधार पर विभिन्न समुदाय को जाति का नाम दे दिया गया होगा लेकिन इसका मतलब यह नहीं छोटा कर्म करना या छोटी जाति का होना शर्म और लज्जा की बात है। और ना ही उच्च कूल और उच्च जाति पर अहंकार करने की कोई आवश्यकता है।

हमें ऐसे किसी भी विचार, अभियान, आन्दोलन, संघर्ष को प्रोत्साहन और प्रश्रय नहीं देना चाहिए जो सामाजिक समरसता के इस ताना बाना को ही छिन्न भिन्न कर दे। किसी समय कुछ गलतियां हुईं होंगी, कुछ विभेद किए गए होंगे, कुछ लांछना लगाई गई होंगी लेकिन समाज के कुछ व्यक्तियों की गलती के लिए पूरे सामाजिक बनावट को उच्च जात और निम्न जात में विभाजित करना उचित है क्या?

हमारी या हमारे आगे की पीढी जो कि ना तो इन जातीय बंधन को मानती है ना ही सामाजिक विभेद और छुआछुत या ऊंच नीच को पहचानती है उनके दिलो दिमाग़ में कहीं हम जान बूझकर विभेद और छुआछुत का विष तो नहीं बो रहे हैं।

क्षमा याचना अभियन्ताओं की नीयत चाहे जितनी भी अच्छी क्यों ना हो लेकिन उसके दीर्घकालिक परिणाम बहुत ही आशाजनक नही भी सकता है। जातीय विभेद और छुआछुत के गड़े मुर्दे उखाड कर हम अपनी आने वाली संतति की सोच, विचार और आचरण को कहीं उन्हीं इतिहास के कब्रों में तो नहीं समाहित कर रहे हैं? यह गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए।

अपने गौरवमयी अतीत और इतिहास बताने के बदले इतिहास के कलंकित पन्नों को क्यूं पढाना ? नकारात्मकता को बढावा देकर समाज को नकारात्मक सोच की ओर क्यों धकेलना ? सकारात्मक सोचें, सकारात्मक प्रचार हो, सकारात्मक ऊर्जा का संचार करें। आपलोगों की क्षमता, विद्वता, कौशलता पर कोई संदेह नहीं पर इस पहलू से भी विचार करना आवश्यक है।

खुद ही हाथ जोडकर खुद ही अपनी तस्वीर लेकर खुद के ही फेसबुक पर पोष्ट करने से खुद को खुदा बनाने का संदेश प्रवाहित हुआ। और आलोचना का शिकार होना पडा।

क्षमा याचना हमारी सोच में होनी चाहिए, हमारे आचरण में दिखना चाहिए, हमारे विचार में प्रष्फुटित होना चाहिए, हमारे कर्म से समाज को प्रभावित करना चाहिए और जिनके सम्मान के लिए, जिनका जीवन स्तर उठाने के लिए, जिनको समानता और सदभाव दिलाने के लिए यह अभियान चलाया गया उनके तरफ से प्रशंसा होता, उनकी सोच हमारे आचरण, व्यवहार, कर्म से प्रभावित होती तो शायद यह अधिक प्रभावी और सफल माना जाता।

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