अपूर्ण बजेट के लिए प्रतिपक्ष जिम्मेवार नहीं

अर्थशास्त्र में विद्यावारिधि करनेवाले डा. विजयकुमार पौडेल नेपाल के वरिष्ठ मार्क्सवादी अर्थशास्त्री माने जाते हैं। वे नेकपा-एमाले) के केन्द्रीय सदस्य हैं और बिघटित संविधानसभा के सदस्य रह चुके हैं। इन्होंने अपनी पार्टर्ीीी तरफ से विभिन्न समय के वाषिर्क बजट निर्माण में सक्रिय भूमिका अदा की है। प्रस्तुत हैं, उनके साथ हिमालिनी के अतिथि सम्पादक मुकुन्द आचार्य द्वारा ली गई अन्तरवार्ता का सारसंक्षेप ः

० वर्तमान सरकार ने “दोतिहाई बजट” लाई है। कहा जाता है कि आप की पार्टर्ीीेकपा -एमाले) और नेपाली कांग्रेस जैसे मुख्य विपक्षी दलों ने सरकार को पूरा बजट प्रस्तुत करने से रोका। ऐसा आरोप मूलतः वर्तमान सरकार की तरफ से लगाया गया है। इस बारे में आप का क्या कहना है –
पौडेल- नेपाली जनता ने अमूल्य त्याग और बलिदान करके यह लोकतान्त्रिक गणतन्त्र हासिल किया है। हम तानाशाही और शासकीय स्वेच्छाचारिता के विरुद्ध लडÞे थे। यह जो लोकतान्त्रिक गणतन्त्र है, एनेकपा-माओवादी) और तथाकथित मधेशी मोर्चा के लोगों का इस में एकाधिकार नहीं है। किसी भी सरकार को संविधान और कानून के दायरे में चलना चाहिए। बजट प्रस्तुत करने के लिए इस वक्त संसद नहीं है। संविधानसभा और संसद की हत्या स्वयं एनेकपा -माओवादी) और सत्ता गठबन्धन में सामिल मधेशी मोर्चा ने किया है। ऐसी अवस्था में प्रमुख दलों के बीच में सहमति कर के बजट जारी करना चाहिए था। अन्तरिम संविधान की भावना यही होनी चाहिए। इस भावना के विपरीत बडÞी भद्दी कूटनीति अपनाते हुए दोतिहाई बजट जारी किया गया है। सरकार का यह कदम जनता के विरुद्ध किया गया सबसे बडा धोखा है।
जहाँ तक आप ने पूछा है कि विपक्षी दलों ने पर्ूण्ा बजेट जारी करने से रोका है। इस बारे में आप की जिज्ञासा का जवाव देने से पहले मैं दो साल पहले की एक घटना का जिक्र करना चाहता हूँ। उस वक्त हमारी पार्टर्ीीे वरिष्ठ नेता कामरेड माधवकुमार नेपाल प्रधानमन्त्री थे। कामरेड सुरेन्द्रकुमार पाण्डेय अर्थमन्त्री थे। वह सरकार पर्ूण्ा वैधानिक प्रक्रिया के तहत बनी थी और नियमित हिसाब से ही बजट भाषण होने जा रहा था। उस वक्त माओवादियों ने क्या किया, कैसी उद्दण्डता प्रस्तुत की गई, सारी दुनिया जानति है। अर्थमन्त्री कामरेड सुरेन्द्र पाण्डेय के साथ संसद भवन में बदतमीजी की गई थी और बजटका ब्रिफकेस निर्लज्जता के साथ तोडÞफोडÞ कर दिया गया था। माओवादी जब विपक्ष में थे तो उन्हों ने वैसा असंवैधानिक और अशोभनीय काम किया। अब सत्ता में हैं तो फिर सत्ताका दुरुपयोग करके तानाशाही दिखा रहे हैं। हम ने बजटका विरोध नहीं किया है। हमने र्सवसत्तावाद का विरोध किया है। बजट या किसी भी संकट का बहाना बनाकर र्सवसत्तावाद लादने को हम कभी स्वीकार नहीं करेंगे।
०     प्रस्तुत बजेट में विकास खर्च गत वर्षकी तुलना में २० अर्व कम है। इस से विकास-निर्माण की प्रक्रिया वाधित होगी ही ! इस की जिम्मेदारी प्रतिपक्ष की है या नहीं है –
उत्तर( राजनीतिक अस्थिरता के कारण विगत कुछ वर्षों से विकास बजट में विनियोजित रकम का आधा या पचास प्रतिशत भी खर्च नहीं हुआ है। यह हमारा दर्ुभाग्य है कि गरीब देशका बजट खर्च नहीं हो पा रहा है। जबतक राजनीति की गाडÞी सही लीक में नहीं चलेगी तब तक यही बदहाली कायम रहेगी। इसलिए मुझे पक्का यकीन है कि जितनी भी रकम विनियोजित की गई है, वह भी पूरी खर्च नहीं होगी। इसलिए विपक्ष पर तीर दागने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। यह सरकार सर से पाँव तक भ्रष्टाचार में डूबी हर्ुइ है। भ्रष्टाचार दिन दूना, रात चौगुना बढÞ रहा है। अनुचित और राष्ट्रविरोधी गठबन्धन के आधार पर यह सरकार खडÞी है। इस सरकारको प्रतिपक्षी पार्टियों पर आरोप लगाने का कोई अधिकार नहीं है।
० सरकार ने तो बारबार सहमति के लिए प्रयास किया था। विपक्षी दलके लोगों ने ही सहमति में आने से इन्कार किया। ऐसा प्रधानमन्त्री जी का कहना है। इस बारे में आप की राय –
पौडेल( सहमति का मतलब सत्तासीन दल की बात मानना ही नहीं होता है। सहमतिका मतलब होता है किसी साझा मिलन विन्दु में पहुँचना, कुछ अपनी कहना और कुछ दूसरों की सुनना। ‘मै जो करता हूँ वही सही है’ वाले रवैये से सहमति नहीं हो सकती। प्रधानमन्त्री जी कह रहे हैं- उन्होंने सहमतिका प्रयास किया मगर यह सरासर झूठी बात है। प्रधानमन्त्री जी हर कदम पर सहमति तोडÞने को उतावले हैं। उनकी सारी गतिविधियाँ इस वात के प्रमाण हैं।
० प्रमुख पार्टर्ीीे नेता लोग दलीय स्वार्थ में फँसे हुए हैं। जब तक देश के प्रमुख नेता गण दलीय स्वार्थ छोडÞकर बृहत्तर राष्ट्रिय हित के पक्ष में एकजूट नहीं हो जाते तब तक देश की हालत नहीं सुधरेगी। यही आम जनता और बौद्धिक तबके का मानना है। इस तथ्य को स्वीकार करने की हिम्मत नेता लोगों में नहीं देखी गई। आप लोग जनताको कब तक भेंड-बकरी समझते रहेंगे –
उत्तर( जनता र्सर्वेर्सवा होती है। जनताको वे लोग भेंड-बकरी समझते हैं, जो लोकतन्त्र के विरोधी होते हैं। हमारी पार्टर्ीीलीय स्वार्थ छोडÞने को तैयार है। जनताको भेंड-बकरी तो एनेकपा-माओवादी) और सत्ता में सामिल तथाकथित मधेशी मोर्चा के लोगों ने समझ रखा है। माओवादियों ने जनताको जातजाति में विभाजित किया और साम्प्रदायिकताको बढÞावा दिया। कम्युनिष्ट पार्टर्ीी साइनबोर्ड लगाकर वे जनताको जातजाति के नाम पर विभाजित कर रहे हैं। इस से ज्यादा गैरजिम्मेवाराना रवैया क्या हो सकता है – इसी तरह अपने को मधेश के मसीहा समझने वाले लोग तर्राई और पहाड की जनता के बीच में वैमनस्यता फैलाकर अपनी गन्दी राजनीति की रोटी सेक रहे हैं। इस लिए जबतक एनेकपा -माओवादी) और सत्ता में सामिल मधेशी मोर्चा के लोग साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से ऊपर नहीं उठते हैं तब तक देश में शान्ति बहाल नहीं हो सकती और प्रगति भी नहीं हो सकती। जबतक जनताको आपस में लडÞाने वाली नीति परास्त नहीं होती तबतक आर्थिक प्रगति की बातें करना और बजट के बारे में बहस करना बेकार है।
० क्या सालाना बजटको राजनीतिक दांव-पेंचके ऊपर नहीं रखा जा सकता – जो भी सरकार हो, और जो भी अर्थ मन्त्री हो, वो निश्चित समयपर बजट प्रस्तुत करे। क्या ऐसी व्यवस्था नहीं की जा सकती है –
पौडेल( आप ने बहुत सही और गम्भीर सवाल उठाया है। इस प्रश्न के लिए मै आपको सच्चे मन से धन्यवाद देना चाहता हूँ। सालाना बजटको राजनीतिक दावपेच से ऊपर रखना ही चाहिए। आपने जो सुझाया, वैसी ब्यवस्था होनी चाहिए। जो भी अर्थ मन्त्री हो वो निश्चित समय पर बजट प्रस्तु करे। अगर वैसी ब्यवस्था हो सकती है तो देशको आर्थिक प्रगति के राहपर ले जाने में आसानी रहेगी। लेकिन वैसी ब्यवस्था संविधान और कानून बनाकर ही लागू कि जा सकती है। जब संविधान जारी करने की अवस्था तयार होगी तो हम सबको वैसी धारा संविधान में ही समावेश करने पर ध्यान देना चाहिए।
० अब प्रसंग बदलें। राष्ट्रपति महोदय और प्रधानमन्त्री जी के बीच में टकराव की सी स्थिति बन गई है। राष्ट्रपति महोदय ने सहमतीय सरकार बनाने के लिए आहृवान किया है और प्रधानमन्त्री जी ने इसका खुलकर विरोध किया और भण्डाफोर तक करने की धमकी दे डाली है। इस स्थितिका देश के अर्थतन्त्र पर क्या असर पड सकता है – आप क्या आकलन करते हैं –
उत्तर( यह बहुत ही दर्ुभाग्यपर्ूण्ा बात है कि देश के दो प्रमुख संवैधानिक निकाय आपस में आमने-सामने होने की स्थिति बन गई है। यद्यपि यह स्थिति लम्बे समय तक नहीं रहेगी तथापि इस टकराव का अर्थतन्त्र पर बहुत नकारात्मक असर पडÞेगा। आप स्पष्ट रुप से देख सकतें हैं कि इस टकराव का पूँजी बाजार पर नकारात्मक असर पडÞ चुका है। अगर यह टकराव जल्दी समाप्त नहीं होती है तो हालत और भी बदतर हो जाएगी।
० समाधान का क्या उपाय हो सकता है –
पौडेल- प्रधानमन्त्री जी को अपना हठ छोडÞकर पीछे हटना चाहिए। इसी तरह देश की राजनीतिको टकराव में जाने से बचाया जा सकता है। जब संसद नहीं है तो रास्ता दिखाने वाला कोई न कोई होना ही चाहिए। वह काम राष्ट्रपति महोदय ही कर सकते हंै।
० अगर मौके का फायदा उठाकर राष्ट्रपति महोदय सक्रिय हो गए तो –
उत्तर( राष्ट्रपति महोदय ऐसा नहीं कर सकते। हमारे वर्तमान अन्तरिम संविधान में राष्ट्रपति महोदय को संविधानका पालनकर्ता के रुपमें मानार्थ भूमिका दी गई है। वे संकट के समय में संविधान की बाधाओं को दूर करने की भूमिका पूरा कर सकतेे हैं। वो उसके आगे नहीं जा सकते।

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