अपेक्षा है, विषाद की जननी

रवीन्द्र झा ‘शंकर’:श्री मद्भागवत पुराण का कथन है– ‘आशा हि परमं दुःख नैराश्य परमं सुखम्’ । अर्थात् आशा यानी अपेक्षा मानव–जीवन का सबसे बड़ा दुःख है और निराशा यानी जगत् में उदासीनता या अनपेक्षिता सबसे बड़ा सुख है । मनुष्य जीवनभर विभिन्न प्रकार की अपेक्षाओं के सागर में डूबता–उतराता रहता है । यह उसकी स्रुवाभाविक वृत्ति हैरुरु क्योरुंकि इसकेरु बिना उसकेरु जीवन की नाव चल नहीं सकतीरु। जब हम किसी केरु काम आतेरु हैरुं तोरु प्राकृतिक रुप सेरु अपेरुक्षा होरुती हैरु कि यह भी आवश्यकता केरु समय हमाररुी सहायता कररुेरुरु। यदि अपेरुक्षा केरु अनुरुप व्यक्ति का इच्छित कार्य होरु जाता हैरु तोरु उसेरु विशेरुष प्रसन्नता नहीं होरुतीरु। क्योरुंकि वह सोरुचता हैरु कि ऐरुसा तोरु होरुना ही थारु। लेरुकिन जब अपेरुक्षा अनुसाररु कार्य नहीं होरुता हैरु तोरु उसेरु निररुाशा होरुती हैरु औरुररु वह दुःख केरु सागररु मेरुं डूब जाता हैरुरु। कई बाररु तोरु वह इतना दुःखी होरु जाता हैरु कि वह विषाद सेरु उबररु ही नहीं पाता कभीरुकभी तोरु वह अवसादग्रस्रुरुत होरुकररु अपनी जीवनरुलीला भी समाप्त कररु बैरुठता हैरुरु। अपेरुक्षा केरु पूर्ण न होरुनेरु केरु दुःख सेरु उपजी यह स्रिुरुथति विषाद की पररुाकाष्ठा हैरुरु।
वाभाविक वृत्ति है– क्योंकि इसके बिना उसके जीवन की नाव चल नहीं सकती । जब हम किसी के काम आते हैं तो प्राकृतिक रूप से अपेक्षा होती है कि यह भी आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे । यदि अपेक्षा के अनुरूप व्यक्ति का इच्छित कार्य हो जाता है तो उसे विशेष प्रसन्नता नहीं होती । क्योंकि वह सोचता है कि ऐसा तो होना ही था । लेकिन जब अपेक्षा अनुसार कार्य नहीं होता है तो उसे निराशा होती है और वह दुःख के सागर में डूब जाता है । कई बार तो वह इतना दुःखी हो जाता है कि वह विषाद से उबर ही नहीं पाता कभी–कभी तो वह अवसादग्रस्त होकर अपनी जीवन–लीला भी समाप्त कर बैठता है । अपेक्षा के पूर्ण न होने के दुःख से उपजी यह स्थिति विषाद की पराकाष्ठा है ।
दैनिक जीवन में हम देखते हैं कि माँ–बाप अक्सर अपने पुत्र से कुछ अपेक्षाएँ पाल लेते हैं । वे सोचते हैं कि बेटा हमारे बुढ़ापे का सम्बल बनेगा, निरीह हाथों की लाठी बनकर जीवनरूपी नाव को सुखपूर्वक किनारे लगायेगा । लेकिन जब वही बेटा माँ–बाप की आशाओं पर खरा नहीं उतरता तो उन्हें घोर निराशा होती है । उनकी उम्मीदों पर पानी फिर जाता है । कई बार तो वे स्वयं को कोसने भी लग जाते हैं । वे भूल जाते हैं कि उन्होंने अपनी सन्तानों के लिए जो कुछ भी किया, वह ममता, वात्सल्य, प्रेम के वशीभूत होकर किया अथवा अपना कर्तव्य समझकर किया । बदले में किसी प्रकार के उपकार की आशा या अपेक्षा से नहीं किया । माता–पिता एवं सन्तान के मध्य जो रिश्ता है, वह किसी व्यवसाय की तरह सञ्चालित नहीं होता है । जब हम अपेक्षा की धरातल पर उतर जाते हैं तो यह सम्बन्ध व्यापार की श्रेणी में आ जाता है । कहने का तात्पर्य यह नहीं कि सन्तान का अपने माता–पिता के प्रति कोई कर्तव्य नहीं है । वृद्ध माता–पिता की सेवा–सुश्रुषा करना शास्त्रों के अनुसार संतान का कर्तव्य है । हम बात यहाँ अपेक्षा की कर रहे हैं । यदि अपेक्षा नहीं की जाती तो दुःख भी नहीं होता । यदि सामनेवाले व्यक्ति के द्वारा कर्तव्य पालन न करने पर हमे दुःख पहुँचाता है तो यह स्थिति सुखद नहीं कही जा सकती ।
प्रेम जीवन का आधार होता है । अपेक्षा भाव जीवन को व्यापार बना देता है । केवल देने पर आधारित है, उस में लेना कुछ नहीं होता, जबकि व्यापार में लेना–देना दोनों ही विद्यमान रहते हैं । माँ–बाप भी अपनी सन्तान से अपेक्षा करने लगते है । पति–पत्नी भी बिना अपेक्षा के साथ चल नहीं पाते । जीवनस्रुतररु इसी अपेरुक्षा केरु काररुण मानवीय धररुातल सेरु गिररु कररु पशुवृत्तियोरुं केरु हवालेरु होरु जाता हैरुरु। येरु वृत्तियाँ अलगरुअलग परिरुस्रिुरुथतियोरुं मेरुं अलगरुअलग स्रुरुवरुप मेरुं प्रकट होरुती ररुहती हैरु, जोरु मानसिक हिंसा का एक नयाँ संसाररु ररुच देरुती हैरुरु। फलस्रुरुवरुप जीवन सेरु सुख, विदा होरु जाता हैरु, अपेरुक्षा की शक्ति का अनुमान इसी बात सेरु लगाया जा सकता हैरु कि यह व्यक्ति कोरु सही मायनेरु मेरुं मानव बननेरु ही नहीं देरुतीरु। उसकी इच्छाशक्ति सदैरुव हाररु बैरुठती हैरुरु। अपेरुक्षा तोरु व्यक्ति कोरु व्यष्टि भाव सेरु बाहररु निकलनेरु ही नहीं देरुती, जिससेरु मानवदेरुह का उपयोरुग समष्टि केरु लियेरु होरु नहीं पातारु। उसका अहंकाररु आकररुण ही दूसररुेरु कोरु तुच्छ मान बैरुठता हैरुरु। अपेरुक्षा मेरुं तोरु काररुण भी नहीं होरुतारु। सम्पूर्ण सुखाेंरु औरुररु सुविधाओरुं केरु मध्य बैरुठा हुआ व्यक्ति भी सुखी ररुहनेरु की अपेरुक्षा दुःखोरुं सेरु घिररुा ररुहता हैरुरु। क्योरुंकि अपूर्ण ररुही अपेरुक्षा उसेरु सुख का अहसास कररुनेरु ही नहीं देरुतीरु।
तर इसी अपेक्षा के कारण मानवीय धरातल से गिर कर पशुवृत्तियों के हवाले हो जाता है । ये वृत्तियाँ अलग–अलग परिस्थितियों में अलग–अलग स्वरूप में प्रकट होती रहती है, जो मानसिक हिंसा का एक नयाँ संसार रच देती है । फलस्रुवरुप जीवन सेरु सुख, विदा होरु जाता हैरु, अपेरुक्षा की शक्ति का अनुमान इसी बात सेरु लगाया जा सकता हैरु कि यह व्यक्ति कोरु सही मायनेरु मेरुं मानव बननेरु ही नहीं देरुतीरु। उसकी इच्छाशक्ति सदैरुव हाररु बैरुठती हैरुरु। अपेरुक्षा तोरु व्यक्ति कोरु व्यष्टि भाव सेरु बाहररु निकलनेरु ही नहीं देरुती, जिससेरु मानवदेरुह का उपयोरुग समष्टि केरु लियेरु होरु नहीं पातारु। उसका अहंकाररु आकररुण ही दूसररुेरु कोरु तुच्छ मान बैरुठता हैरुरु। अपेरुक्षा मेरुं तोरु काररुण भी नहीं होरुतारु। सम्पूर्ण सुखाेंरु औरुररु सुविधाओरुं केरु मध्य बैरुठा हुआ व्यक्ति भी सुखी ररुहनेरु की अपेरुक्षा दुःखोरुं सेरु घिररुा ररुहता हैरुरु। क्योरुंकि अपूर्ण ररुही अपेरुक्षा उसेरु सुख का अहसास कररुनेरु ही नहीं देरुतीरु।
वरूप जीवन से सुख, विदा हो जाता है, अपेक्षा की शक्ति का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह व्यक्ति को सही मायने में मानव बनने ही नहीं देती । उसकी इच्छाशक्ति सदैव हार बैठती है । अपेक्षा तो व्यक्ति को व्यष्टि भाव से बाहर निकलने ही नहीं देती, जिससे मानवदेह का उपयोग समष्टि के लिये हो नहीं पाता । उसका अहंकार आकरण ही दूसरे को तुच्छ मान बैठता है । अपेक्षा में तो कारण भी नहीं होता । सम्पूर्ण सुखाें और सुविधाओं के मध्य बैठा हुआ व्यक्ति भी सुखी रहने की अपेक्षा दुःखों से घिरा रहता है । क्योंकि अपूर्ण रही अपेक्षा उसे सुख का अहसास करने ही नहीं देती ।
महापुरुषों का कथन है कि अपेक्षा एक काल्पनिक विचार है । बिना किसी यथास्रिुथति विचाररु केरु व्यक्ति अपनेरु मन मेरुं कुछ सोरुच लेरुता हैरुरु। यह स्रुरुवपन देरुख लेरुनेरु जैरुसा कार्य हैरुरु। हम अपनेरु मन मेरुं ही अपेरुक्षा पालकररु दुःखी होरु ररुहेरु हैरुंरु। वस्रुरुतुतः यह दुःख वास्रुरुतविक नहीं हैरु, मात्र कल्पना पररु आधारिरुत हैरुरु। अपेरुक्षा अर्थ ही आप इच्छा अर्थात् कुछ बुररुा, खोरुट देरुखना, विचाररु ररुखना ही हैरुरु। आक्रमकता, हिंसा, क्रोरुध जैरुसा कृत्य ही तोरु इस मेरुं प्रमुख रुप सेरु छायेरु ररुहतेरु हैरुरु। इनकेरु सामनेरु हमाररुा मन तोरु बहुत कमजोरुररु होरुता हैरुरु। जोरु शररुीररु मेरुं भयंकररु पीडथति विचार के व्यक्ति अपने मन में कुछ सोच लेता है । यह स्रुवपन देरुख लेरुनेरु जैरुसा कार्य हैरुरु। हम अपनेरु मन मेरुं ही अपेरुक्षा पालकररु दुःखी होरु ररुहेरु हैरुंरु। वस्रुरुतुतः यह दुःख वास्रुरुतविक नहीं हैरु, मात्र कल्पना पररु आधारिरुत हैरुरु। अपेरुक्षा अर्थ ही आप इच्छा अर्थात् कुछ बुररुा, खोरुट देरुखना, विचाररु ररुखना ही हैरुरु। आक्रमकता, हिंसा, क्रोरुध जैरुसा कृत्य ही तोरु इस मेरुं प्रमुख रुप सेरु छायेरु ररुहतेरु हैरुरु। इनकेरु सामनेरु हमाररुा मन तोरु बहुत कमजोरुररु होरुता हैरुरु। जोरु शररुीररु मेरुं भयंकररु पीडवपन देख लेने जैसा कार्य है । हम अपने मन में ही अपेक्षा पालकर दुःखी हो रहे हैं । वस्तुतः यह दुःख वास्तविक नहीं है, मात्र कल्पना पर आधारित है । अपेक्षा अर्थ ही आप इच्छा अर्थात् कुछ बुरा, खोट देखना, विचार रखना ही है । आक्रमकता, हिंसा, क्रोध जैसा कृत्य ही तो इस में प्रमुख रूप से छाये रहते है । इनके सामने हमारा मन तो बहुत कमजोर होता है । जो शरीर में भयंकर पीड़ा भी उत्पन्न कर सकता है ।
अपेक्षा भाव ही परिग्रह का कारण बनता है । यह ईष्र्या, लोभ, चोरी का मार्ग प्रशस्त करता है । व्यक्ति का मायाभाव चेतन से अचेतन में प्रवेश करता है । दबी हुई समस्रुत वृत्तियाँ भी अचेरुतन मन मेरुं संग्रहीत ररुहती हैरुरु। यह अचेरुतन मन ही जीवन मेरुं भ्रमजाल का निर्माण कररुररुकेरु यथार्थ कोरु ढक लेरुता हैरुरु। माया औरुररु मित्रता दोरु विररुोरुधी तत्व हैरुरु। व्यक्ति मित्रता सेरु हटकररु वस्रुरुतुओरुं की ओरुररु आकर्षित होरुता हेरुरु। कामना औरुररु अपेरुक्षा दोरुनोरुं की दिशा एक सी होरुती हैरुरु। परिरुणामस्रुरुवरुप जीवन मेरुं नकाररुात्मक मानसिकता विकसित होरु जाती हैरु, जोरु अनन्तः हमाररुेरु दुःखोरुं कोरु काररुण बनती हैरुरु। अपेरुक्षा एक ऐरुसा विचाररु हेरु, जिससेरु पूररुी मानव जाति ग्रस्रुरुत हैरुरु। युग मेरुं व्यक्ति अपनोरुं सेरु अपेरुक्षा कररुता ररुहा हैरुरु। यह बात दीगररु हैरु कि अपेरुक्षा पूर्ण न होरुनेरु केरु काररुण उसेरु दुःखी होरुना पडत वृत्तियाँ भी अचेतन मन में संग्रहीत रहती है । यह अचेतन मन ही जीवन में भ्रमजाल का निर्माण कररके यथार्थ को ढक लेता है । माया और मित्रता दो विरोधी तत्व है । व्यक्ति मित्रता से हटकर वस्तुओं की ओर आकर्षित होता हे । कामना और अपेक्षा दोनों की दिशा एक सी होती है । परिणामस्वरुप जीवन में नकारात्मक मानसिकता विकसित हो जाती है, जो अनन्तः हमारे दुःखों को कारण बनती है । अपेक्षा एक ऐसा विचार हे, जिससे पूरी मानव जाति ग्रस्त है । युग में व्यक्ति अपनों से अपेक्षा करता रहा है । यह बात दीगर है कि अपेक्षा पूर्ण न होने के कारण उसे दुःखी होना पड़ा है ।
कहते हैं कि व्यक्ति जब धन, पद या शरीर सौष्ठव के शिखर पर होता है, तब अपेक्षाओं का ताण्डव और भी भयंकर होता है । अपने से कमजोर को देखते ही वह आक्रमक हो जाता है । अपेक्षा चूकि मन के संकुचन का कार्य करती है, अतः विवेकद्वारा इसका निवारण भी हो सकता है । जो भीतर अर्थात् सीमित कारण से मुक्त कर भी हो सकता है । जो मित्र अर्थात् सीमितिकरण से मुक्त कर सके, वही पशु से मित्रता भी कर सकता है । व्यक्ति को पशुता से मुक्त कराते ही वह मानवीय धरातल पर जीना शुरु कर देता है । मानव ज्याें–ज्यों अपेक्षाओं से मुक्त होगा, उसका अचेतन मन खाली होता जाएगा । जिससे प्रतिक्रियाओं का सिलसिला बन्द होने लगेगा और नकारत्मक भूमिका सिमटती चली जाएगी । व्यक्ति का यह प्रेम धीरे–धीरे उसकी आत्मा का विस्तार करने लगेगा । ‘वसुधेव कुटुम्बकम’ का भाव ही उसे नरेश नारायाण बना देता और उसका जीवन जो अपेक्षाओं की बेडि़यों में बँधा था, मुक्त हो जाएगा, उध्र्वगामी हो जाएगा ।
अपेक्षा से सदा पैदा होता है विषाद ।
करे तौवा तो मिले सुख का प्रसाद ।

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