अब ऊंट आया पहाड के नीचे

कुमार सचितानन्द :देश में संविधान सभा का चुनाव आसन्न है। यद्यपि इसकी निश्चितता पर मुहर अभी नहीं लगी है, तथापि चुनाव का माहौल तो बनने लगा है। विभिन्न दलों की राजनैतिक गतिविधियाँ बढÞने लगी हैं। मतदाताओं को रिझाने के अभ्यास प्रारम्भ हो चुके हैं और मधेश आधारित दल भी इस अभ्यास में शामिल हो चुके हैं। ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि यहाँ के अनिश्चित राजनैतिक वातावरण में ऊँट कब और किस करवट बैठेगा कहना मुश्किल है। इसलिए अपनी ओर से तैयार रहना तो आवश्यक है ही। लेकिन मधेश आधारित दलों की सबसे बडÞी हताशा यह है कि मुद्दों के प्रति प्रतिबद्धता के मद्देनजर उनकी विश्वसनीयता आमलोगों की दृष्टि में कम है। इन दलों में बिखराव इतना अधिक है कि पहचान मुश्किल है और स्वार्थपरक तथा अवसरवादी होने का आरोप महज कुछ नेताओं को छोडÞकर प्रायः सभी नेताओं पर है। इसका असर तो आगामी चुनाव के गणित पर निश्चित ही पडÞने की सम्भावना है। इनके साथ एक महत्त्वपर्ूण्ा समस्या यह है कि प्रायः सभी राष्ट्रीय राजनैतिक दलों की गिद्ध दृष्टि तर्राई मधेश के चुनाव क्षेत्रों पर है, मधेशमार्गी राजनैतिक दलों की कमजोरियों को वे जानते हैं और किर्ंकर्तव्यविमूढÞ जनता को अपने पक्ष में करने की उनकी रणनीति है। यही कारण है कि विभिन्न राष्ट्रीय दलों के नेता आज मधेश के चुनाव क्षेत्रों से भाग्य अजमाने की मनःस्थिति में हैं।madheshi leaders
यद्यपि नेपाल की राजनैतिक अवस्था अभी तरल है और यह बात मधेशी राजनीति के साथ भी लागू होती है, यह कब और कौन आकार ग्रहण करेगी कहना मुश्किल है। इसके बावजूद अब तक जो सूचनाएँ हैं उनके अनुसार मधेश की राजनीति करने वाले खण्ड-विखण्ड दलों की तीन मोर्चाएँ उभर कर सामने आयी हंै। विजय गच्छदार नेतृत्व के फोरम लोकतांत्रिक और महन्थ ठाकुर नेतृत्व के तमलोपा के चुनावी तालमेल करने के बाद छोटे चार मधेशी दलों में अलग मोर्चा बनाने की सहमति हर्ुइ है। चुनावी तालमेल के लिए दोनों पक्षों द्वारा अपनी उपेक्षा का एहसास होने के बाद राजकिशोर यादव के नेतृत्व का फोरम गणतांत्रिक, महेन्द्र प्रसाद नेतृत्व की तर्राई मधेश सद्भावना पार्टर्ीीशरत सिंह भण्डारी नेतृत्व की राष्ट्रीय मधेश समाजवादी पार्टर्ीीौर अनिल कुमार झा के नेतृत्व की संघीय सद्भावना पार्टर्ीीे मिलकर आगे बढÞने का निर्ण्र्ाालिया है। इन छोटे मधेश आधारित दलों के निर्ण्र्ााके साथ ही सरकार में रहने के समय ‘संयुक्त लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा’ औपचारिक रूप में तीन टुकडÞों में विभाजित हो चुका है। इससे पर्ूव गच्छेदार और महन्थ ठाकुर की मोर्चाबन्दी से असन्तुष्ट होकर राजेन्द्र महतो की सद्भावना और उपेन्द्र यादव नेतृत्व का फोरम नेपाल ने चुनाव में तालमेल करने का निर्ण्र्ाा२२ गते भाद्र को ही किया था।
मधेशी राजनीति के एक और घटक के रूप में ‘तर्राई मधेश राष्ट्रीय अभियान’ को लिया जा सकता है जो र्सवथा एक नवीन दृष्टिकोण के साथ मधेशी राजनीति में सक्रिय है। इसकी अवधारणा है कि आगामी संविधानसभा का चुनाव लक्ष्यहीन दिशा में बढÞता हुआ कदम है। अगर संविधानसभा का चुनाव हो भी गया तो भी इससे संविधान बनाने का लक्ष्य कम से कम पूरा नहीं हो सकता क्योंकि इसके बाद फिर सत्ता का वही खेल प्रारम्भ होगा जो विगत में हुआ है। सत्ता की साधना में संलग्न दलों में मतवैभिन्य स्वाभाविक है और मतभिन्नता की जमीन पर संविधान तो कम से कम नहीं बन सकता। क्योंकि कोई भी दल दो तिहाई का जादर्ुइ आँकडÞा प्राप्त करने में सक्षम नहीं और सहमति तो इनमें हो ही नहीं सकती, जिसका उदाहरण विगत का इनका कार्यकाल और इनकी सहमति का अभ्यास है। इनका मानना है कि इस चुनाव में सहभागी हो रहे दल अगर संविधान निर्माण की दिशा में गम्भीर हैं तो प्रस्तावित संविधान के न्यूनतम और आधारभूत सिद्धान्तों पर चुनावपर्ूव सहमति क्यों नहीं हर्ुइ – अपनी इन्हीं मान्याओं के कारण यह राजनैतिक समूह फिलहाल चुनाव बहिष्कार की मुद्रा में है। लेकिन आगामी संविधानसभा में हो क्या रहा है इस बात की विश्वसनीय जानकारी प्राप्त करने के निमित्त यह अभियान अपने एक-दो प्रतिबद्ध कार्यकर्त्तर्ााें को संविधान सभा के अन्दर चुनाव के द्वारा भेजने की रणनीति बना सकती है।
एक कहावत है कि ‘अब आया ऊँट पहाडÞ के नीचे।’ कहने का मतलब ये ऊँट बिखरे हुए राजनैतिक दल हैं और पहाडÞ आगामी चुनाव है। ‘हम किसी से कम नहीं’ के मनोविज्ञान से गुजरते हुए मधेशी दल छः वषों में जो छत्तीस टुकडÞों में बँटे हैं उसकी लाभ हानि के सही अन्दाज का समय अभी उनके पास है और देर ही सही उनमें लोक संग्रह की चेतना आई है उसकी प्रशंसा तो की ही जानी चाहिए लेकिन मौजूदा समय में इसे भी पर्याप्त नहीं माना जा सकता। सच यह है कि विगत के छह वर्षों में तो मधेश के मुद्दे इन नेताओं के लिए माध्यम मात्र रहे हैं, साधना तो इनकी सत्ता या सरकार रही है। एक राजनैतिक अनुशासनहीनता का शिकार प्रायः सभी राजनैतिक दल रहे हैं। पद और अवसर के प्रति इनका आकर्षा बढÞता रहा और टुकडÞों – टुकडÞों में ये विभाजित होते रहे। अब सवाल उठता है कि क्या इसी रणनीति पर आगामी चुनाव लडÞा जाएगा – आज हर दल की समस्या है कि इस मुद्दे पर वह स्वयं को न्यायोचित स्थिति में खडÞा नहीं कर सकता। उनकी हर आडÞी तीरछी चालों को आमलोग अच्छी तरह समझते हैं।
पिछली संविधानसभा के चुनाव में मधेश का जो चुनावी वातावरण था और आमलोगों का जो मनोविज्ञान था उसकी कल्पना इस चुनाव में नहीं की जा सकती क्योंकि विगत चुनाव मधेश आन्दोलन की पृष्ठभूमि में हुआ था और जनता में एक उबाल की मनःस्थिति थी। इस बार का चुनाव एक तटस्थ मनोविज्ञान के आधार पर होने की संभावना है। कोई जनलहर मधेशी राजनीति के पक्ष में नहीं देखा जा रहा। महत्त्वपर्ूण्ा है कि मुद्दे से अधिक इस चुनाव में विशेष कर मधेश में व्यक्ति महत्त्वपर्ूण्ा होंगे, जातीय समीकरण महत्त्वपर्ूण्ा होगा, चुनावी हथकण्डे महत्त्वपर्ूण्ा होंगे और इन आधारों पर हुए चुनाव में मधेशमार्गी दलों को बहुत लाभ होने की संभावना नहीं है। आज मधेशी राजनीति की सबसे बडÞी समस्या यह है कि मधेश के मुद्दे को मधेश में स्थ्ाापित किए बिना मधेशमार्गी दल सत्ता के खेल में शामिल हो गए। यद्यपि इसे पर्ूण्ातः नकारात्मक तो नहीं कहा जाना चाहिए क्योंकि सत्ता में रहते हुए उन्होंने बहुत सारे निर्ण्र्ाामधेश के पक्ष में करवाए हैं, लेकिन जनाकांक्षा इतनी बढÞी हर्ुइ हैं कि ये उपलब्धियाँ नगण्य सी लगती हैं। इस लिए दल चाहे कोई भी हो उसे आम लोगों में यह संदेश देना ही चाहिए कि सरकार में रहने से मधेश को ये-ये लाभ हुए हैं। इस आधार पर वे जन संवेदना कुछ हद तक समेट सकते हैं।
यह सच है कि मधेश में आज नकारात्मकता का मनोविज्ञान है, लेकिन यह किसी सकारात्मक दिशा का प्रस्थान विन्दु नहीं हो सकता। वैसे तो विकल्पहीनता की स्थिति समस्त नेपाली राजनीति में है किन्तु मधेश की पीडÞा इस दृष्टि से और भी गहरी है। मधेश के अस्तित्व और अस्मिता से जुडÞे अनेक मुद्दे समाधान की दिशा ढÞूँढ रहे हैं, संघीयता के सवाल पर अभी भी राष्ट्रीय दलों की सकारात्मक मनःस्थिति नहीं है। तर्राई-मधेश को टुकडÞे-टुकडÞे में ये इसे न केवल कमजोर बल्कि अस्तित्वहीन करने की मनःस्थिति में हैं। अगर आज मधेश की शक्तियाँ कमजोर हर्ुइं तो पता नहीं आगामी संविधान सभा द्वारा उसके भाग्य में क्या लिखा जाएगा। इसलिए मधेश आधारित राजनैतिक दलों की सशक्त उपस्थिति संविधान सभा में आवश्यक है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर मधेश के नागरिकों को सचेत होना चाहिए और इस बात को सुनिश्चित करना चाहिए कि आगामी संविधानसभा में मधेशी दलों के सदस्यों की इतनी उपस्थिति तो होनी ही चाहिए कि उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज नहीं बने। गलतियाँ उन्होंने की हैं तो लोकस्तर पर उन्हें उनकी भूलों का ज्ञान कराया जाना चाहिए, अवसर आने पर विपरीत प्रतिक्रिया देकर इसकी सजा मधेश के स्वाभिमान को नहीं दिया जाना चाहिए। मधेश के स्वाभिमान की रक्षा की शिक्षा यहाँ के राजनैतिक दलों और उसके नेतओं को भी दी जानी चाहिए।
एक बात तो निश्चित है कि सत्ता की साधना करते-करते मधेशी स्वाभिमान की रक्षा के लिए जिस धार की आवश्यकता है वह कुन्द हो गई है। ऐसा नहीं कि इसमें धार नहीं थी क्योंकि इसी धार की बदौलत विगत संविधानसभा में उनकी उल्लेखनीय उपस्थिति थी, लेकिन धीरे-धीरे यह कुन्द होती रही और सत्ता के गलियारे की चढÞाव-उतार और आपसी वैमनष्यता के कारण आम मधेशियों के मन की आग को पहचानने में यह अक्षम रही। उपराष्ट्रपति के शपथ-प्रकरण में समस्त मधेशी दलों की भूमिका इस स्वाभिमान के अनुकूल नहीं थी, शरत सिंह भण्डारी के मंत्री पद की बर्खास्तगी प्रकरण में जिस आवाज की अपेक्षा की जा रही थी, वह मुखर होकर सामने नहीं आयी। जयप्रकाश गुप्ता को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सजा मिली लेकिन मधेशी राजनीति से जिस तरह की प्रतिक्रिया की अपेक्षा की जा रही थी, वह प्रकाश में नहीं आई। इन घटनाओं पर खुशियाँ मनाने और मिठाइयाँ बाँटने वाले मधेशी दल ही थे। स्थिति यहाँ तक पहुँची कि विगत साफ खेलों के दौरान नेपाल द्वारा भारत की पराजय पर मधेशी स्वाभिमान और सांस्कृतिक पहचान को जिस ढंग से गाली दी गयी और इस पर जिस तरह की ठंडी प्रतिक्रिया हर्ुइ जो लगभग नगण्य सी थी, उससे यह बात तो साफ है कि अपनी पहचान भी वे धीरे-धीरे खोने लगे हैं। अब सवाल उठता है कि इस राजनैतिक मनोविज्ञान से मधेश की भावनाओं का वहन किया जा सकता है –
आज मधेशमार्गी दलों की सबसे बडÞी चुनौती है मधेश संवेदना को एकत्रित करना जो बिखरी हर्ुइ है और जिन्हें बिना समेटे समग्र रूप में मधेश के स्वाभिमान की रक्षा नहीं की जा सकती। इसे दो दिशाओं से कमजोर करने का प्रयास हो रहा है। र्सवप्रथम तो ये मधेशी दल विखरे हुए हैं और इनमें भी गलाकाट प्रतिस्पर्द्धर्ााै। ऐसा होना भी स्वाभाविक है कि इसमें प्रे+mडली मैच की स्थिति नहीं होती। इन राजनैतिक दलों द्वारा भी चुनावी मैदान में आलोचना और गाली-गलौज के हथकण्डे अपनाए जाएँगे। मधेश समर्थित आम लोगों को विभाजित किया जाएगा और एक तरह से अपने ही पैर पर कुल्हाडÞी मारी जाएगी। दूसरी ओर राष्ट्रीय पार्टियाँ भी आगामी चुनाव में मधेश के प्रति गम्भीर हैं और अपना आधार विकसित करने का प्रयास कर रही हैं। विभिन्न पार्टियों के हाई प्रोफाइल नेताओं का मधेश के विभिन्न चुनाव क्षेत्रों से चुनाव लडÞने की रणनीति का कारण भी यही है। फिर ऐसे मधेशी नेता भी हैं जो विभिन्न राष्ट्रीय पार्टियों से भी जुडÞे हैं और मधेशी होने का लाभ वे भी उठाने का प्रयास करेंगे ही। लेकिन इनकी विजय से मधेश के मुद्दे और उसकी संवेदना को बहुत लाभ होने की संभावना नहीं है। क्योंकि विगत के दिनों में भी मधेश के मुद्दे पर इनका स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं देखा गया और पार्टर्ीीी नीति को प्रभावित करने के प्रति इनमें कम गम्भीरता देखी गयी। इसलिए इनसे किसी लक्ष्य के संधान की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।
कहा जा सकता है कि आज हालात बेहतर नहीं हैं, लेकिन अवसर है। इसलिए जो राजनैतिक शक्तियाँ चुनाव लडÞने की मनःस्थिति में हैं, उनके द्वारा अवसर को अनुकूल बनाने का प्रयास होना ही चाहिए। इसके लिए दलों का गठबंधन ही पर्याप्त नहीं, विभिन्न गठबन्धनों का आपसी चुनावी तालमेल भी आवश्यक है जिससे कि मधेश समर्थित मतों का विभाजन रोका जा सके। प्रतिस्पर्द्धर्ाान दलों से हो जिनके साथ नीतिगत वैभिन्य है। अगर सम्यक रणनीति के अभाव में वे मैदान में उतरते हैं तो उसका परिणाम तो जगजाहिर है ही कि अनेक नेता अपनी पहचान भी गंवा बैठेंगे। खामियाजा तो मधेश को ही भुगतना होगा। िि

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