अब ये भी तय है मोर्चा सत्ता पक्ष में रहेगा, लेकिन मधेश की सहादत का कोई मोल नहीं मिलेगा

मुरलीमनोहर तिबारी (सिपु), बीरगंज , २९ जुलाई |

“बोका के गिर गइल सरकार, अब का करबु बकरियों”…. ऐसे गाने खेतों में रोपनी करते हुए सुना जा रहा है। मधेश में धान रोपनी में लोकगीत गाने का चलन है। इस बार लोकगीतों में भी राजनितिक रंग दिख रहा है। ऐसा नहीं है कि किसी दल बिशेष ने लोगों को उकसा कर गाने तैयार कराए हो, बल्कि मधेश के जनमानस ने ओली को अपना कट्टर विरोधी मान लिया है, इसलिए दशहरा में महिषासुर हो या रावण हो, या जन्माष्टमी में कंस सब के चेहरे पर ओली का मुखौटा रहता है। हालांकि ओली सरकार को पहाड़ी दलों ने ही गिराया, फिर भी मधेश में हर्ष है।

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ये बात अलग है, की अपने निजी काम या मजबूरी के चलते मधेश के लोग पहाड़ी नेता से काम करवाते है, परंतु इनके अंतरात्मा में इनके लिए कोई जगह शेष नहीँ बचा। जब सुशिल कोइराला की सरकार गिरी, ओली की सरकार बनी, अब प्रचंड और देउबा की बनेगी, लेकिन मधेश में कोई अंतर नहीँ आएगा। सिर्फ मुखौटे बदल रह है। जिस संबिधान को इनलोगों ने एकजुट होकर एक स्वर में स्वीकृत किया, उसमें कोई सुधार होने नहीँ जा रहा है।

मधेशी मोर्चा ने लिखित प्रतिबद्धता की शर्त रखी है। लिखित सहमति हो भी जाएगी, लेकिन उनका संबिधान में लिपिबद्ध होना नामुमकिन है। ऐसे कई आठ बुँदे, चार बुँदे सहमति के कागज, रद्दी के टोकरी में फेंक दिए गए। संबिधान में मधेश के मांग को संशोधन करने के लिए दो तिहाई चाहिए, जो की पूरा होने वाला नही है।

राजेंद्र महतो ने घोषणा किया कि मोर्चा सरकार में नही जायेगी, वे ऐसा सिर्फ इसलिए कह रहे है, क्योकि वे मंत्री बनने योग्य नहीँ है, हालांकि उनके इस घोषणा का मोर्चा तो दूर खुद उनके सांसद तक इनके कथन से इत्तफाक नहीँ रखते। इनके कथन के दूसरे दिन ही लक्ष्मण लाल कर्ण ने इनकी बात को नकारते हुए सरकार में जाने को कहा। पूर्व में भी ऐसा ही हुआ, कहा संसद से इस्तीफा दे दिया है। पर झूठ पर झूठ, छल पर छल, क्या इनसे मधेश की मुक्ति संभव है ?

सुनने में आया है, उपेंद्र यादव को ओली सरकार के समर्थन के लिए ५२ करोड़ का ऑफर आया था, ये बात सही हो या गलत पर उपेंद्र यादव का लकी नंबर जरूर ५२ ही होगा, क्योकि मधेश बिद्रोह में ५२ सहादत फिर इनके ५२ सांसद हुए थे, और अब ५२ करोड़ यानि एक सहादत की कीमत एक करोड़, क्या मधेशी जीवन की सिर्फ यही कीमत है ? अब ये भी तय है मोर्चा सत्ता पक्ष में रहेगा, लेकिन मधेश की सहादत का कोई मोल नहीं मिलेगा।

अगली बारी आती है, महंथ ठाकुर की, सत्ता में जाना है या नही, वे कुछ नही बोलेंगे। ज्यादा सवाल होगा तो एम्बेसी का दबाव था, कहकर निकल जाएंगे। वैसे भी वे खुद मंत्री नही बनकर अपने अपनी छवि साफ़ कर लेंगें। इसे कहते है, कम्बल ओढ़कर घी पीना। मोर्चा के बाकी घटक भी दुम दबाएं इनलोगे के पीछे बहती गंगा में हाथ दो लेंगें। जिनके एक सांसद है, अगर उन्हें मनमाफ़िक मंत्रालय ना मिले तो वही मधेश के लिए ज्यादा हल्ला करेंगे, और घड़ियाली आंसू बहाएंगे। एक तरह से इनसे अच्छे तो बिजय गच्छेदार है, कोई आश्वासन नहीं, कोई एजेंडा नही, सिर्फ और सिर्फ सत्ता, वे भी खुश उनके कार्यकर्त्ता भी खुश।

ओली सरकार का गिरना और नई सरकार बनना लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है, लोकतंत्र संख्या का खेल है। उस पर भी एक व्यक्ति एक भोट का सिद्धांत, यानि एक डॉक्टर, एक इंजीनियर और एक गवार सब एक समान। जिसकी लाठी उसकी भैस। और संख्या बल जिसके पास हो, सत्ता की कुंजी उसके पास होती है, साथ ही सिद्धांतिन और बैचारिक मत और मतान्तर के आधार पर गठजोड़ होता है, लेकिन दुर्भाग्य है, नेपाल में सिद्धांत का कोई मोल नहीँ है। सत्ता के लिए किसी के मिल जाना, फिर बिना किसी कारण उसका साथ छोड़कर दूसरे के साथ हो लेना। यह चरित्रहीन राजनीती ही नेपाल के पतन का कारण है।

अजीब बिडम्बना है कि नेपाल की कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीँ कर पाती। औसतन एक सरकार नौ महीने से एक साल तक रहती है। छौ महीने तो उसे समझने में लगते है, फिर कुछ काम रफ़्तार पकडे तब तक सरकार बदल जाती है। एक सरकार बजट लाती है, तो दूसरी उसे अपने हिसाब से परिमार्जित करके लागु करती है। फिर उन योजनाओं का समीक्षा अधर में लटक जाता है, नतीजतन सभी योजनाएँ महज खानापूर्ति करके चलाई जाती है। ऐसे देश में खोखले राष्ट्रवाद के नाम पर युवाओं की बलि चढ़ाई जाती है। जहाँ युवा शक्ति देश का भविष्य निर्माण कर सकते है, वे विदेशों में मजदूरी करते है या बी. ए. करके बकरी चराते है।

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