अब, वही, आर–पार की बात है

डी.जे. मैथिल:‘मरने का वक्त जब आता है तो चींटी के भी पर निकल आते हैं’ यह पुरानी कहावत है समाज में । लगता है नेपाल के शासक वर्ग का यही हाल होने वाला है । न्याय, कानून, सत्य–असत्य कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है । डायन–जोगन भी अपने समाज में किसी एक घर को छोड़ देती है, ताकि वक्त पर उसे सहयोग कर सके । सरकार में बैठे चार तानाशाही को यह भी समझ नहीं आया कि कम से कम ‘सर्वोच्च अदालत’ को मान कर चलें । क्या किसी राष्ट्र में सर्वोच्च अर्थात ‘सुप्रीमकोर्ट’ से भी बड़ा कोई होता है ? किसी अन्तिम घड़ी में न्याय कौन देगा ?

सरकार में बैठे चार तानाशाही को यह भी समझ नहीं आया कि कम से कम ‘सर्वोच्च अदालत’ को मान कर चलें । क्या किसी राष्ट्र में सर्वोच्च अर्थात ‘सुप्रीमकोर्ट’ से भी बड़ा कोई होता है ? किसी अन्तिम घड़ी में न्याय कौन देगा ? कानून के सबसे अन्तिम केन्द्र विन्दु ‘सुप्रीम कोर्ट’ ने जिस बात पर रोक लगाते हुए कार्यशैली को सुधार कर आगे बढ़ने का आदेश दिया है, अन्तरिम संविधान में जो स्पष्ट लिखा है, वही वात सर्वोच्च के आदेश में है, नामांकन–सीमांकन स्पष्ट रूप से तय कर संघीयता देश में जारी करने की बात है, पर चार दलीय जो चार तानाशाही हैं वह सत्ता–कुर्सी के दंभ के बल पर, नेपाली जन–चाहना को लात मार कर, कानून अपने हाथ में लेकर भष्मासुर की तरह ताण्डव मचाना चाहते हैं । सर्वोच्च अदालत की बात अगर सचमुच इन्होंने नहीं माना तो देश में अराजकता ही दिखाई देगी कोई किसी को नहीं मानेगा । पुलिस–प्रशासन की बात कौन मानेगा ? दिन–दहाड़े, चौराहे पर मार पीट, हत्या, चोरी, बलात्कार की घटनाएँ हाेंगी । जहां कानून ही नहीं है, वहां पुलिस का क्या काम ।
कानून के सबसे अन्तिम केन्द्र विन्दु ‘सुप्रीम कोर्ट’ ने जिस बात पर रोक लगाते हुए कार्यशैली को सुधार कर आगे बढ़ने का आदेश दिया है, अन्तरिम संविधान में जो स्पष्ट लिखा है, वही वात सर्वोच्च के आदेश में है, नामांकन–सीमांकन स्पष्ट रूप से तय कर संघीयता देश में जारी करने की बात है, पर चार दलीय जो चार तानाशाही हैं वह सत्ता–कुर्सी के दंभ के बल पर, नेपाली जन–चाहना को लात मार कर, कानून अपने हाथ में लेकर भष्मासुर की तरह ताण्डव मचाना चाहते हैं । सर्वोच्च अदालत की बात अगर सचमुच इन्होंने नहीं माना तो देश में अराजकता ही दिखाई देगी कोई किसी को नहीं मानेगा । पुलिस–प्रशासन की बात कौन मानेगा ? दिन–दहाड़े, चौराहे पर मार पीट, हत्या, चोरी, बलात्कार की घटनाएँ हाेंगी । जहां कानून ही नहीं है, वहां पुलिस का क्या काम । शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, यातायात, भन्सार, मालपोत आदि सभी जगह अराजक तत्व जन्म लेंगे । न्यायालय की हार हो गई । न्यायाधीश के कलम की नींव तोड़ दी गई है । सत्य पर असत्य की जीत है ।
आज भी हमारे समाज में, पहाड़ हो या मधेश, ब्राह्मण के बगल में कोई दलित कुर्सी पर बैठ जाता है तो ब्राह्मण को क्रोध होता है । अपनी बराबरी में उन्हें देखना स्वीकार्य नहीं है । पहले से आज का समय बहुत बदल गया है । खास कर मधेश में अब ऐसी अवस्था नहीं के बराबर है । पहाड़ में क्या है पता नहीं । उसी तरह पहाड़ी समुदाय के खास वर्ग (ब्राहमण–क्षेत्री) के मन में घमण्ड है । राजसत्ता पर आज भी वर्चश्व है । नेपाल के राज सत्ता पर  पहाड़ी ब्राह्मण का ही दब–दबा है । वह लोग मधेशी, दलित, मुस्लिम, जनजाति, थारु, मगर, शेर्पा पर शासन करते आए हैं । शोषित वर्ग  अंगुली उठाता है तो उसे बर्दास्त नहीं होता है । चार दल के ब्राह्मण  नेता मधेशी के आदेश को कैसे मानेगा ? जिस मधेशी से उसे घृणा है, जिस मधेशी को उसने वर्षो से पीछे रखा है । उस मधेशी समुदाय के चाहे न्यायाधीश हो, चाहे प्रशासक, चाहे मन्त्री, किसी का आदेश मानना उसे, उसकी आत्मा को स्वीकार नहीं  है । इस मानसिकता से  चार नेता मजबूर हैं ।
मधेशी वर्ग अव जाग चुका है । अपने अधिकार के लिए कुछ भी करने को तैयार हो गया है । मधेशी का दुश्मन समग्र पहाड़ी वर्ग नहीं है । खस ब्राह्मणवादी ही मधेशी का दुश्मन है । आगे की लड़ाइ पहाड़ी ब्राह्मण से है । देश के घातक तत्व ही  खस ब्राह्मण हंै । आज सिर्फ मधेशी वर्ग ही पीडि़त नहीं है । पहाड के दलित, जनजाति, शेर्पा नेवार लगायत सभी ब्राह्मण वर्ग से पीडि़त है । रोशन जी ने एक लेख लिखा है – ‘द्वन्दक नवका वीज’ । आज की जो अवस्था है उससे मिलती जुलती है । सर्वोच्च के आदेश को जिस तरह चार दल ने अवहेलना की है । मधेशी के सवाल पर तमाचा मारा है । वही ‘द्वन्द का नया बीज’ ।
इससे स्पष्ट  है कि मधेशी को ये लोग कोई अधिकार नहीं देना चाहते हैं । और मधेश की मिट्टी पर अपना कब्जा बनाए रखना चाहते हैं । संघीयता के सवाल पर सारे पहाड़ी वर्ग के नेता एक हंै । किसी भी कीमत पर संघीयता नहीं देना चाहते हैं । तरह तरह के जाल बुनते हंै । फूट डालो राज करो । यह नीति नेताओं की रही है । समग्र मधेश के नाम पर एक जुट हो जाता है तो उसे मिथिला, कोचिला, भोजपुरा, थरुहट कहकर बाँट देते हैं । तरह–तरह के प्रलोभन दिखाकर मधेशीदल को फोड़ देते हैं । मधेशी को ही हथियार थमाकर मधेशी पर ही आक्रमण करवा देते हंै ।
मधेशी पर कुदृष्टि सभी दिन से रही है । आज भी तीन सौ वर्ष का इतिहास साक्षी है । देश में ७५ जिला है । जहाँ सिडियो, एसपी, जिशिअ और अन्य में मधेशी कितने हैं ? इतनी बड़ी संख्या में मधेशी सिर्फ २–४ के संख्या में सभी दिन रहे हैं । वह आज भी है । ७५ न्यायाधीश में मधेशी कितने हैं ? वस वही २–४ मात्र । आर्मी–पुलिस के उच्च पद पर मधेशी कितने हंै ? न्यून हंै । सवसे ताज्जुब की बात तो यह है कि देश के सैनिक सेवा अर्थात आर्मी में मधेशी को लिया ही नहीं जाता है । एक से एक योग्य, तगड़ा जवान मधेश में हजारों की संख्या में हैं । पर उन्हें सेना में अवसर नहीं दिया जाता है ।
आगे के दिन में हम भी देश पर शासन कर सकते हैं । हमें आत्मबल बढ़ाना होगा । देश के लोकसेवा आयोग, शिक्षक आयोग, राष्ट्रसेवक आयोग आदि जो भी हो उस आयोग के निर्णायक समूह में पहाड़ी समुदाय ही जब होगा तो निर्णय सही हो ही नहीं सकता । पुरा के पुरा होगी तो सही निर्णय हो ही नही सकता है । इस विषय पर भी हमे सोच बनानी होगी । पहली वात, संविधानसभा में ंजो मधेशी सभासद हैं, चाहे मधेशीदल हो या पहाड़ी दल, सभी को एक साथ इस्तीफा दे कर मधेश की मिट्टी पर खड़े रहना होगा । सरकारी निकाय में जो इन्जीनियर, डाक्टर, प्रोफेसर, शिक्षा, न्यायाधीश सचिव काम कर रहे हंै, उन्हें भी इस्तिफा देने के लिए तैयार रहना होगा । ऐसी अराजक स्थिति में आप पहाड़ में रह कर क्या करेंगे ? स्थिति इस तरह बिगड़ रही है कि दिन–दहाड़े आप को बेइज्जत कर सकता है । मधेशी कहीं भी सुरक्षित नहीं रहेंगे अगर हालात ऐसे ही रहे तो ।  आप ने सुन ही लिया कि ओली  मधेशी को अपना अधिकार बिहार–उत्तर प्रदेश से माँगने कह रहे हैं । सीधी अंगुली से घी निकलने वाला नहीं है । संघीयता सीधे मन से नहीं मिलने वाला है । इसके लिए प्री प्लान बनाकर, एक जुट होकर अब आर–पार की लड़ाई के लिए तैयार रहना होगा । इस लड़ाई में सभी को एक साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा ।
मधेशी जनता से अव गुजारिश यह है कि अव मधेशी कोई भी नेता हो, सभी को पिछली वात भूल जाना होगा । आपस में कोई कहने सुनने सुनाने वाली वात न करें । सभी को साथ–साथ यह लड़ाई लड़नी होगी । मधेश मां के लिए एकवद्ध हो कर चलना होगा । आगे दिन आप गान्धी के नीति पर चलेंगें कि सुभासचन्द्र की नीति पर, विवेकानन्द के सिद्धान्त पर चलेंगे कि जैसा है उसी पर यथावत रहेंगे । एक मंच पर वैठकर चिन्तन करें । कैसे चलना है, यह निर्णय करना जरुरी है ।
अपने अधिकार के लिए लड़ना ही होगा । हाथ  पर हाथ रख वैठने से नहीं होगा । मैथिली में एक कहावत है – ‘बरत सलाइ की बिना रगड़ने, भेटत अधिकार, कि बिना झगड़ने’ यह बात संसार के लिए सत्य साबित है । ‘समग्र मधेश एक स्वायत प्रदेश’ के बात पर एक जुट सभी को होना होगा । अपने में भाषा, जाति, ऊँच नीच के विवाद में ना फसें । अव समय नहीं है । वहुत जल्द आप को आर–पार की लड़ाई के लिए तत्पर रहना होगा । लड़ाई का अर्थ मार–काट ही नहीं है, और भी वहुत विकल्प है । महाभारत, रामायण का अध्ययन–मनन करते हुए, एकाग्र चित्त वनाकर अस्तित्व की अन्तिम लड़ाई एक मात्र विकल्प है ।

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz