अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता अपमान करने का लाइसेंस नहीं

charlieकञ्चना झा , काठमाण्डू । १५ जानवरी । पूरा विश्व अभी शान्त सा हो गया है । इतनी शान्ति कि जैसे कुछ ही देर पहले भीषण तुफान आया हो । चारों तरफ निराशा ही निराशा । अनुभव तो नहीं है लेकिन बहुत सारे साहित्यकारों ने द्वितिय विश्व युद्ध के बाद की अवस्था को चित्रित करते समय  ऐसी ही शान्ति की चर्चा की है अपनी कृतियों में ।
निराशा का यह पल आया है पेरिस में हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद  । विश्व के सुन्दर शहर फ्रान्स के राजधानी पेरिस स्थित व्यंग्य पत्रिका शार्ली हेब्डो के दफ्तर में आतंकवादी के समूह ने बुधवार को मौत का खेल खेला । और इस नरसंहार के बाद लगभग मानो विश्व थम सा गया है । हरेक बुधबार को प्रकाशित होनेवाली यह पत्रिका अपने कार्टूनों के कारण हमेशा चर्चा में रही है । बुधबार को शार्ली हेब्डो ने इस्लामिक उग्रवादी समूह इस्लामिक स्टेट के नेता का कार्टून ट्वीट किया था । और इस ट्वीट के थोडी ही देर बाद जो हुआ उससे सारी दुनिया स्तब्ध रह गयी । बन्दूक के दम पर कलम को तोड दिया गया । कार में आये दो आतंकवादी एके फोर्टी सेभेन राइफल से गोली दागते हुए शार्ली हेब्डो के दफ्तर में प्रवेश किया और अन्दर में जो जो मिला उसे ढेर करते गये । बन्दुकधारियों ने पत्रिका के सम्पादक चार्बो चारबोनियर सहित बारह लोगों को मौत के घाट उतार दिया । मरने वालों में ८ पत्रकार थे ।
गौरतलब बात यह है कि सुरक्षा के दृष्टीकोण से बहुत ही संवेदनशील माने जाने वाले पेरिस में आतंक का यह मंजर करीब १५ मिनट तक चला । लगातार पाँच मिनट तो आतंकवादियों ने गोली ही चलायी । और शार्ली हेब्डो की दफ्तर में नरसंहार मचाकर बाहर खडे काले रंग के रिनाल्ट कार से आसानी से फरार हो गये । और जाते जाते कुछ और लुटपाट और एक सुरक्षाकर्मी को भी मार गिराया । उधर दूसरी ओर दो आतंकवादियों ने मिलकर एक सुपर मार्केट में कुछ लोगों को बन्धक बना लिया । दो दिन के कसरत के बाद फ्रेन्च पुलिस ने तीन आतंकवादियों को ढेर कर दिया लेकिन इस बीच में और जानें चली गयी । इस आतंकी हमले में कुल १७ लोग मारे गये । एक महिला आतंकवादी अभी फरार है, जिसकी खोज हो रही है ।
एक पत्रिका पर हुई आतंकवादी हमले का विश्व के हरेक कोने से एक स्वर में भत्र्सना हुआ है । विश्व के कई शहरों  में हुए घटना में मारे गये लोगों का स्मरण करते हुए आतंकवादी आक्रमण के प्रति विरोध जाहिर किया है । लोगो ने अपने हाथों में जे स्वी शार्ली ( मै शार्ली हूँ) लिखे हुए प्लेकार्ड लेकर  अपना विरोध जताया ।
लेकिन अब सब कुछ शान्त हो गया है और शान्ति की इस दौर में लोग अपने अपने हिसाब से घटना का मन्थन करने में जुट गये है । आखिर क्या है पत्रकारिता ? पत्रकार तो समाज को सूचना देती है, समाज को जागृत बनाती है । एक नई बहस शुरु हो गई है , अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता को लेकर । अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता क्या  है ? क्या अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता की सीमा निर्धारण होनी चाहिए ? विश्व के हर प्रजातान्त्रिक राष्ट्र अपने नागरिकों को संविधान मार्फत अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता का अधिकार दे रखा है । हर नागरिक को अपने विचारों को निर्भिकतापूर्वक रखने का अधिकार देती है संविधान । किसी भी राष्ट्र में अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है और उल्लंघन करने वालों को सजा की व्यवस्था की गयी है ।
चाहे विकसित राष्ट्र अमेरिका की बात करें या कुछ वर्ष पहले लोकतन्त्र स्थापना हुए नेपाल की , नागरिक को अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता दिया गया है । नेपाल के संविधान की बात कि जाय तो संविधान का धारा १२(३) नागरिक को  अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता प्रदान करती है । लेकिन इसी धारा में कुछ चीजे वर्जित भी किया गया है । संविधान में स्पष्ट रुप से कहा गया है देश की एकता, अखण्डता और सार्वभौसत्ता में खलल पहँुचाने की छुट नागरिक को नहीं । इसी तरह देश में रह रहे विभिन्न धर्म, जातजाति, समुदाय और भाषाभाषी के बीच की सहिष्णुता में खलल पहुँचाने की छुट किसी को नहीं दी गई है ।
फ्रान्स की बात करें तो वहाँ का लोकतन्त्र लगभग साढे दो सौ वर्ष पुराना है । लेकिन वहाँ की कुछ पत्रपत्रिका की बात करें तो बारम्बार दूसरे धर्मावलंबी के विश्वास को ठेस लगाने की कोशिस की है ।  सन २०११ में भी शार्ली हेब्डो का दफ्तर में आक्रमण हुआ था  । उस समय इस पत्रिका नें डेनमार्क में प्रकाशित इस्लाम धर्म को संस्थापक पैगम्बर मोहम्मद के कार्टून को पुनः प्रकाशित किया था । डेनमार्क में छपे उस कार्टून का विश्व के समस्त मुसलमान  ने एक स्वर में विरोध जताया था । विरोध प्रदर्शन के क्रम में कई लोगों की जानें भी चली गई थी । और इतने संवेदनशील विषय को पुनः प्रकाशित करने से पहले किसी भी पत्रिका को एक बार गंभीरता से सोचना चाहिए । पत्रिका की विक्री बढाने के लिए या सनसनी मचाने के लिए कुछ भी छाप देना पत्रकारिता नहीं हो सकती । शार्ली हेब्डो के दफ्तर में नर संहार मचानेवाले आतंकवादी यह कहते हुए बाहर निकले थे कि पैगम्बर को अपमान करनेवालों से बदला लिया ।
वैसे शक्तिशाली राष्ट्र इस मामले में हर हद पार कर जातें हैं । कुछ ही दिन पहले अमेरिका के एक बियर कम्पनी ने अपने बियर का नाम ही गाँधी बियर रख दिया । महिला मोडेल सर्वाङ नंगा होकर अपना संवेदनशील अंग को ओम नमः शिवाय लिखा गम्छी से छुपाते हए ¥याम्प पर उतर जाती है । गौतम बुद्ध की तसवीर अंकित तास छापते है तो कई बार हिन्दू देवी देवता का चित्र अंकित अंडर गार्मेन्टस बना देतें है । हो सकता है उन लोगों के संस्कार में देवीदेवता या मान्यजन का फोटो जुता , मोजा या अंडरवियर में छपवाना स्वीकार्य हों लेकिन हिन्दू, इस्लाम लगायत कई धर्मावलंबी ंके लिए यह अपमानजनक बात होती है । अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता दूसरों को अपमान करने का लाइसेन्स नहीं देती । एक पत्रिका को इस बात की परख होनी चाहिए । पत्रकार को तो समाज के प्रति जिम्मेवार होना चाहिए । शार्ली हेब्डो आक्रमण प्रकरण के बाद  अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता के लेकर एक बार फिर बहस शुरु हो गयी है और बहस परिणाममूलक होनी भी चाहिए ।
और खास कर नेपाल के परिपेक्ष्य में यह बहस तो और ज्यादा आवश्यक हो गया है । विक्रम संवत २०६३ में हुए जन आन्दोलन के बाद देश संघिय लोकताँत्रिक गणतन्त्र हो गया है । देश संविधान निर्माण के प्रत्रिया में आगे बढ रही है । हर लोग चाहते है कि उनकी अधिकार संविधान में सुनिश्चित हो । इसी तरह संघियता को लेकर काफी बहस चल रही है और बहस के कारण कई जगहों पर विवाद ने भी जन्म ले लिया है । खास कर मधेशी, जनजाति को लेकर विवाद बढ गया है । यहाँ के मीडिया में भी कुछ ऐसे लोगों का बर्चस्व है जो अल्पमत या राजनीतिक , आर्थिक और समाजिक रुप से पिछडे है उनकी बात नहीं बाहर आने देते । उनकी बात अगर रखी जाती है तो भी अपमानजनक तरीके से । दूसरी और सूचना और प्रविधि ने नेपाल समाज को बहुत तीव्र रुप में परिवर्तन कर रहा है । अधिकांश लोगों की पहुँच इन्टरनेट तक है और फेसबुक, ट्वीटर जैसे समाजिक सञ्जाल के कारण हर नागरिक पत्रकार बन चुकें है यहाँ । ऐसी अवस्था में अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता और शार्ली हेब्डो पर आक्रमण और भी ज्यादा सोचनिय हो गया है ।।

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