अभी नहीं तो कभी नहीं की राह पर बढ़ता मधेश

मनोज बनैता:राजतन्त्र के अन्त के बाद आठ वर्ष से निरन्तर अधिकार के लिए मधेशी जनता ने बन्द, हड़ताल, नारा जुलूस और कुर्वानी दी है । अधिकार पाने के लिए लगभग ५४ मधेशी शहीद हुए, सैकड़ों घायल और अपंग, हुए इन सबको अधिकार इस संविधान में मधेश के नेतृत्वकर्ता ने दिलाने कि कसम खायी थी । मधेश के नेताओं में स्वार्थ और सत्ता के लालच के कारण  बार–बार मधेशी जनता को आन्दोलन का रास्ता अपनाना पड़ रहा है । २०६३÷०६४ के मधेश आन्दोलन में कितनी माँओं की गोद सूनी हो गयी तो कितनों के सुहाग उजाड़ दी  गई । मधेश

अगर पिछले दिनों की घटनाओं पर एक दृष्टि डाली जाय तो स्पष्ट पता चलता है कि आन्दोलन की चिनगारी उसी दिन सुलग गई थी जब सभी सिद्धान्तों को ताक पर रख कर मसौदा लाया गया । नेपाल के संविधान २०७२ के प्रारम्भिक मसौदा के उपर तराई (मधेश)और कुछ पहाड़ी जिला में व्यापक विरोध हुआ । मधेसी, थारु, आदिवासी÷जनजाति, मुस्लिम, महिला और दलित इस मसौदा पर अपनी असन्तुष्टि जता रहे हैं । मुस्लिम स्वायत परिषद के केन्द्रीय अध्यक्ष मो. आलम का कहना हैै कि अपने अधिकार के लिए सर कटा सकते हैं पर खस शासकों के आगे सर झुका नहीं सकते हंै ।
आन्दोलन की बीज भूमि लहान आज भी लहुलुहान है पर रमेश महतो जैसे शहीदों की चिता पर कसम खाने वाले नेताओं ने सत्ता और भत्ता के चलते अपना ईमान बेच दिया जिसका परिणाम आज मधेश भुगत रहा है । एक भयावह स्थिति हर ओर बनी हुई है । अश्रुगैस के धुएँ ने मधेश के आसमान को ढंक दिया है और ढंक दिया है मधेशियों की जिन्दगी को भी । आज मधेश के हर दिल में अगर कोई आवाज जग रही है तो यह कि अभी नहीं तो कभी नहीं । आखिर कब तक आन्दोलन की धरती बनती रहेगी मधेश ? कब तक सपूत शहीद होते रहेंगे ? आज अगर अधिकार की लड़ाई यहीं रुक गई तो शहीदों के बलिदान का क्या होगा ?
अगर पिछले दिनों की घटनाओं पर एक दृष्टि डाली जाय तो स्पष्ट पता चलता है कि आन्दोलन की चिनगारी उसी दिन सुलग गई थी जब सभी सिद्धान्तों को ताक पर रख कर मसौदा लाया गया ।  नेपाल के संविधान २०७२ के प्रारम्भिक मसौदा के उपर तराई (मधेश)और कुछ पहाड़ी जिला में व्यापक विरोध हुआ । मधेसी, थारु, आदिवासी÷जनजाति, मुस्लिम, महिला और दलित इस मसौदा पर अपनी असन्तुष्टि जता रहे हैं । मुस्लिम स्वायत परिषद के  केन्द्रीय अध्यक्ष मो. आलम का कहना हैै कि अपने अधिकार के लिए सर कटा सकते हैं पर खस शासकों के आगे सर झुका नहीं सकते हंै । अभी के मसौदे  का कोई तुक नहीं है, ये बेतुका नाटक है । इस मसौदा में  लैङ्गिक असमानता, नश्लवादी चिन्तन, विभेदकारी भाषिक नीति, सर्वोच्च अदालत के आदेश की अवहेलना, एकल जातीय प्रणाली, प्रेस स्वतन्त्रता उपर अंकुश, मुस्लिम पहचान, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध सम्बन्धी नीति समावेश है ।  केन्द्रीय नेता प्रचण्ड और माधव के ऊपर कुर्सी÷पत्थर प्रहार होने से भी मसौदा का अर्थ मालूम पड़ता है । मसौदा में मधेसी, आदिवासी÷जनजाति, दलित और मुस्लिम की भावना को नहीं समेटा गया है । इससे बहुंसंख्यक लोग आहत हैं । काठमाडौं में ही विभिन्न जातियों द्वारा विरोध होना एक ज्वलन्त उदाहरण है । मसौदा के भीतर के अंश से यह जाहिर होता है कि मधेस को हमेशा के लिए उपनिवेश बनाना है । मिशन मधेश के संयोजक दिनेश्वर गुप्ता के अनुसार मधेसी को करदाता और मतदाता के रूप में रखने के लिए एक राजनीतिक दस्तावेज तैयार किया गया है । शासकों की शासकीय सोच का शाब्दिक रूपान्तरण है यह मसौदा । इस मसौदा से नेपाल में मधेस उपनिवेश है और रहेगा ऐसा ही  सन्देश मिलता है । मधेसी जनता को राज्य से कोई सम्बन्ध नहीं है, अपनत्व नहीं है यह संदेश दिया है । समानता और अपनत्व की भावना प्रत्याभूति नहीं हो सकती । मधेसी जनता को संघीयता और अधिकार न मिले, शासकों की यही मानसिकता रही  है । इस से मधेसी और पहाड़ी के बीच का सामाजिक अन्तरद्वन्द्ध बढ़ेगा, मधेसी नेताओं के प्रति विश्वास घटेगा और अलगाववाद की भावना को बढ़ावा मिलेगा । मानवअधिकारकर्मी राजकुमार राउत कहते हंै कि ये मसौदा नागरिकता के विषय को विशुद्ध रूप से विवादित बना दिया है । सत्तापक्ष की मानसिकता यह है कि मधेश के लोग ज्यादा से ज्यादा भारत पर आश्रित हंै । और बेटी रोटी के सम्बन्ध से भारत के लोग नेपाल में आते है । इसलिए नागरिकता के विषय को विवादास्पद बनाया गया है और यह बहुत बडीÞ गम्भीर समस्या है ।
सत्तापक्ष की एकाग्र मानसिकता के कारण मधेसी लोग अपने अधिकार से वञ्चित हो रहे हंै । संघीयता समावेशी और सहभागितामुलक होना चाहिये । भाषिक पहचान होनी चाहिए । इस मसौदा से मधेस में कोई सकारात्मक सन्देश नहीं गया है । मधेस में इससे कोई उपलब्धि भी दिखाई नहीं दे रही है । मधेस की सबसे बड़ी माँग है स्वायत्त मधेस । लेकिन सत्ता पक्ष ने इसको ही सम्बोधन नहीं किया है । मधेस के सवाल में यह मसौदा राष्ट्र को बिखण्डन की ओर ले जा सकता है ।
मधेश के नेतृत्वकर्ताओं का मुद्दा एक होते हुए भी विचार एक जैसा नहीं है। ऐसी स्थिति में मधेश का अधिकार संविधान में सुनिश्चित सम्भव है या नहीं मधेशी जनता के सामने एक सवाल खडा हो गया है । मधेश नेतृत्व दलों का रवैया अभी भी स्पष्ट नही है । ज्यादातर कार्यक्रम का विषय होता है बहस मधेश के विभेद के उपर, किन्तु मधेश के विभेद को हटाने से पहले मधेशी नेताओं में ही विभेद दिखाई देती है । मसौदे को मधेशी जनता ने हर विषय पर नकार दिया था जो सुझाव संकलन के समय ही दिख गया था किन्तु सरकार इस बात को गम्भीरता से नहीं ले सकी और संघीयता तथा सीमांकन के नाम पर जनता के समक्ष जो परोसा उसने आज मधेश की स्थिति को भयावह बना दिया है । किन्तु विडम्बना तो यह है कि सरकार इसे भी हल्के रूप में ले रही है । रोज मौत हो रही है, जनता घायल हो रही है । जनजीवन अस्तव्यस्त है फिर भी सरकार का सम्बोधन जनता के लिए नहीं हो रहा है । यह दुखद है । सरकार की यह नीति कहीं ना कहीं उस भावना को भड़का रही है जो विखण्डन की ओर इस देश को ले जा सकता है । देश की अखण्डता को बचाना है तो देश के हर क्षेत्र की जनता का समान रूप से सम्मान करना होगा और उनके अधिकारों को भी सुनिश्चित करने की जिममेदारी भी सत्ता पक्ष की ही है ।

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