अभी शहीदों के खून का रंग भी हल्का नहीं पड़ा, नेताओं ने अपना रंग दिखा दिया : मुरलीमनोहर तिवारी

मुरलीमनोहर तिवारी ( सिपु), बीरगंज , १७ अक्टूबर |

शिकरी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, जाल में मत फसना……..मगर फिर फस गए। प्रधानमंत्री के निर्वाचन में मधेशी मोर्चा ने इसी को चरितार्थ किया। फिर मधेश को धोखा हुआ। इनका बहाना है की भारतीय दबाव में कार्य किया। ये दबाव में आ जाते है, झुक जाते है, टूट जाते है, बिक जाते है। फिर नेतृत्व कैसा ? फिर किस बात के नेता ? शहीद दिलीप चौरसिया तो नहीं झुके। दो साल के शहीद चंदन पटेल तो नहीं टूटे। मोर्चा संवेदनहीन है। ये तो दशहरा, छठ के बहाने आंदोलन वापस लेना चाहते है। बिरगंज को छोड़कर सभी नाका खुल गया। आंदोलन को दमन से फर्क नहीं पड़ा, मोर्चा के धोखा से फर्क पड़ा। जिस संबिधान को इन्होंने जलाया, उसी संविधान के मुखिया के निर्वाचन में किस नैतिकता से गए ? अभी शहीदों के खून का रंग भी हल्का नहीं पड़ा और इन्होंने अपना रंग दिखाना शूरू कर दिया।

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मधेश पहाड़ी दल के गद्दार मधेशियों के धोखा के सदमें से निकल ही रहा था, की दूसरा सदमा झेलना पड़ा। इन्होंने इसी कारण बाक़ी रहे मधेशी दलों से एकता नहीं किया। अगर एकता होता तो सभी छोटे बड़े नाके बंद होते। ये तो ग़नीमत रहा की बाक़ी मधेशी दल इस कलंक से अछूते रहे, जिस कारण आंदोलन का दम नहीं निकला। उपेन्द्र यादव शुरू से आंदोलन नहीं करना चाहते थे। अशोक राई से एकीकरण का उद्देश्य भी सत्ता में अपनी बढ़त लेना था। उपेन्द्र यादव का नक्कली आंदोलन उनके कार्यकर्त्ता समझ गए उनमे से जो सही थे वे फर्क तरीके से आंदोलन में सरीक हुए और बाक़ी झूठ-मुठ में शामिल होकर तेल और चावल काठमांडू भेजते रहे। महंथ ठाकुर भी पार्टी के अंतरकलह के कारण आंदोलन करने में असमर्थ दिखे। राजेंद्र महतो की सारी उपलब्धि नक्कली राजीनामा के उजागर होने से चकनाचूर हो गया। बाबुराम भी राम-राम कहकर चलते बने। बिजय गच्छदार ने अपने गद्दार नाम को सिद्ध किया। सत्ता में बिजय और मधेश के गद्दार। “पहले इनसे बचें, फिर मधेश बचेगा”।

sipu-2जहाँ मधेश सदमे में था, बिरगंज के अलावे सभी नका खुल चुके थे, आंदोलन अंतिम सांस ले रहा था। तमरा अभियान और जे पी गुप्ता बिना प्रचारबाजी किए आंदोलन को पुनःजीवित करने के लिए एड़ी चोटी का दम लगा दिए। रुपन्देही, नवलपरासी, बारा और पर्सा में कई बैठक कर आंदोलन में आक्सीजन दिया। बिरगंज को केंद्र मानकर आंदोलन को संगठित करने से अन्य जगह भी आंदोलन जागृत करने का प्रयाश किया गया। जिसके फलस्वरूप जनकपुर और लहान में भी तेजी आई। जागो मधेशी  मांगो मधेशू का नारा जीवंत किया।

इस समय आंदोलन बिना निष्कर्ष समाप्त होने वाला है। ६३ साल के मधेश बिद्रोह से टुटा हुआ मधेश को फिर से जागने में नौं साल लगे। इस बार टूटने पर कोई भी मधेश का नाम नहीं लेना चाहेगा। मधेश मजाक बनकर रह जाएगा। मधेश को फिर संगठित होने में कुछ समय लग सकता है । हमारी एक पीढ़ी और गुलाम ही रहेगी। एक बात और सिद्ध हुआ की मधेश इन लोगो को भली-भाँति समझ चूका है। वाकई मधेश आंदोलन स्वस्फूर्त ही है। बिरगंज में बंद और नाकाबंदी के दौरान लोग खुद-ब-खुद आते रहे। पहले गांव-गांव से फिर टोल-टोल से लोग आए। फिर विभिन्न संघ संस्था द्वारा एकबद्धता और अब तो हरेक जातीय संगठन द्वारा उपस्तिथिती हो रही है। पहाड़ी समाज,नेवारी समाज भी शामिल हुआ। अब इसमें मधेशी मोर्चा को कही भी खोजा नहीं जा रहा है।

कई-कई किलोंमीटर तक ट्रैक्टरों की लाइन लगी रहती है। लाठी, फरसा, गड़ासा, तलवार लिए मधेशी योद्धा आते है। साथ में चावल रासन लिए आते है। इनके नाच गान में गीत गूँजते है लाथी- फथा ले हो तैयार, नेपाल अभिन बंदे बाू। दिन भर इनके जुलुस को देखता हु, इनके उत्साह और संघर्ष को देखता हु, लेकिन जब अंजाम का कल्पना करता हु तो सिहर जाता हु, रोंगटे काप जाते है। आसु रुकने का नाम नहीं लेते। दिल करता है दिन भर यही रहकर जुलुस देखता रहू। क्या हम हमेशा गुलाम ही रह जाएंगे ? क्या इतनी शहादत व्यर्थ ही जाएगी ? क्या कोई चमत्कार होगा ? अगर कोई ईश्वरी शक्ति है तो कुछ होता क्यों नहीं ? क्या हम गलत है ? हमारी मांग गलत है ? हमने तो सिर्फ बराबरी का अधिकार माँगा है। किसी का बुरा नहीं चाहा है। फिर ये काली रात हटती क्यों नहीं है ? क्या हम प्रकाश का आस छोड़ दे ? नही, कदापि नहीं। संघर्ष ही जीवन है। हम संघर्ष करेंगे। अंतिम सांस तक लड़ेंगे। हम २५० साल से गुलाम रहे है, अगर एक साल को के एक दिन भी मानते है तो हमें २५०दिन आंदोलन करना होगा। हमारा संकल्प होगा जितना दिन बितेगा, मधेश आंदोलन जीतेगा। जय

 

मधेश।।sipu-3sipu-1

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