अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव, नये विश्व— नेतृत्व का उभार : विनोदकुमार विश्वकर्मा

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विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’,23 नवम्बर । दुनिया के सबसे ताकतबर देश अमेरिका ने ९ नवंबर को अपना राष्ट्रपति चुन लिया । ७० साले डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के ४५ वें राष्ट्रपति बन गए हैं । उनकी जीत से किसी को खुशी हुई, तो ज्यादातर लोगों को अचंभा हुआ । विरोधी डेमोक्रेट के साथ रिपब्लिकन नेताओं के खुले विरोध के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप ने सारे सर्वेक्षण और अनुमानों को धराशायी कर चुनाव जीता । अमेरिका के ५७ मीडिया संगठनों में से ५५ हिलेरी का समर्थन किया था । सट्टा बाजार ने भी हिलेरी पर दांव लगाया था ।
डोनाल्ड ट्रंप की जीत ने पूरी दुनिया को कई तरह से चौंकाया है । एक तो इसलिए कि किसी को भी उनकी ऐसी जीत की उम्मीद नहीं थी । चुनाव से दो महीने पहले तक यह माना जा रहा था कि इस बार भी अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के लिए उम्मीद का कोई कारण नहीं है । फिर चुनाव से एक हप्ते तक यह लगा कि वह डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को कड़ी टक्कर दे रहे हैं । फिर कुछ सर्वेक्षणों ने कहा कि नहीं, जीत तो हिलेरी का हार रही है । लेकिन ट्रंप ही जीते । यह माना जाता है कि चुनावी सर्वेक्षण और आकलन अक्सर नेपाल में ही नहीं, अमेरिका में भी चूक जाते हैं । यह अंतर बताता है कि वह ट्रंप के समर्थन का एक हवा चल रही थी, जिसे तमाम तरह के विशेषज्ञ समझने में नाकाम रहे । इस जीत ने चौंकाया इसलिए भी है कि अमेरिका के अलावा बाकी दुनिया में उन्हें एक अगंभीर व्यक्ति माना जा रहा था, इसलिए वे चाहते नहीं थे कि टं«प जीतें । हाल– फिलहाल तक अमेरिकी मीडिया उन्हें एक ऐसे शख्स के रुप में पेस कर रहा था, जिसका स्वभाव राष्ट्रपति पद के अनुकूल नहीं हैं ।
घरेलु मुद्दों ने ट्रंप को जिताया
— श्वेतों वोटरों का वोट भारी झुकाव, अश्वेतों, एशियाई लैटिन वोट भी मिलना ।
— ग्रीन पार्टी और अन्य छोटे दलों के प्रत्याशियों ने हिलेरी का काफी वोट काटा ।
— अमेरिकियों को नौकरी, टैक्स में कमी, बजट में कटौती के वादे से लुभाया ।
— आतंकवाद, आतंक प्रायोजित करनेवाले देशों व अवैध अप्रावासियों पर सख्त रुख ।
— गैर राजनीतिक छवि और टीवी सेलिब्रिटी होना भी पक्ष रहा ।
अमेरिका इस समय दो हिस्सों में बंटा हुआ है । एक हिस्सा पढे–लिखे, उदारवादी और सेक्युलर लोगों का है, तो दूसरा हिस्सा रुढि़वादी, धार्मिक, श्रमवर्ग और शहर से दूर ग्रामीण क्षेत्रों में कम पढ़े लिखे लोगों का है । दूसरे हिस्से का तादाद वहां ज्यादा है । ट्रंप ने इन्हीं के बीच अपने चुनाव प्रचार के जरिये अमेरिका को दोबारा से एक ‘गे्रट नेशन’ बनाने का आंदोलन चलाया था और दुनिया में ‘अमेरिका फस्र्ट’ होगा । इस आंदोलन का तमाम रुढि़वादियों, धार्मिकों, श्रम वर्गों और कम पढेÞ लिखे अमेरिकियों ने समर्थन किया था । ट्रंप का यह आंदोलन कामयाव रहा और वे जीत की तरफ बढेÞ ।

सभी वर्गों में वोट पाए
श्वेत लैटिन वोट युवा पुरुष महिला
ट्रंप— ५७%
हिलेरी— २९% ट्रंप—५७%
हिलेरी— २९% ट्रंप— ३७%
हिलेरी— ५२% ट्रंप— ५३%
हिलेरी— ४१% ट्रंप— ४२%
हिलेरी– ५४%
अमेरिकी लोकतंत्र सदियों से उदारवादी लोकतंत्र की राह दिखानेवाला देश रहा है । लोकतंत्र में फैसला आम लोगों के हाथों में होता है । अमेरिकी जनता ने संस्थानों के खिलाफ अपना फैसला सुना दिया है । उसने एक ऐसे उम्मीदवार को राष्ट्रपति चुना है, जिसने कभी सार्वजनिक पद नहीं संभाला । संस्थानों को उस पर भरोसा नहीं था, लेकिन लोगों को भरोसा था कि वह संस्थानों को बढ़ा लेगा और लोकोन्मुखी बनाएगा । ट्रंप की जीत मतदाताओं की जीत है, लोकतंत्र की जीत है ।
जीतने के बाद अमेरिका लगायत विभिन्न देशों में उनके विरुद्ध प्रदर्शन भी हुआ, तो वहीं ज्यादातर विश्व के नेताओं ने स्वागत भी किया । अपने विरुद्ध हो रहे प्रदर्शनों के बाद ट्रंप ने सभी अमेरिकियों के लिए काम करने और दुनिया के अन्य देशों के साथ सहयोग का रुख अख्तियार करने की घोषणा करते हुए कहा कि “मैं सारे अमेरिकियों का राष्ट्रपति हूं, सभी से सहयोग रहेगा, किसी से संघर्ष की कोई बात नहीं है । हम अमेरिका को फिर से महान् बनाएंगे ।” लेकिन, यह समय के गर्भ में है कि डेढ़ साल से विभिन्न मुद्दों पर कड़ा रवैया अपनाने की बात कहते रहनेवाले ट्रंप राष्ट्रपति पद के लिए चुने जाने के बाद कितना बदलेंगे, उनकी पार्टी के भीतर की और डेमोक्रेटिक खेमे की प्रतिक्रियाएं भी इसमें खासा महत्वपूर्ण होंगी । फिलहाल, उम्मीद की जानी चाहिए कि बतौर राष्ट्रपति उनके हाव–भाव और विचारों का सकारात्मक पक्ष ही उनकी नीतियों की दशा और दिशा तय करेगा ।
यह आलेख विभिन्न पत्रपत्रिकाओं की जानकारी पर आधारित है ।

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