अराजक कूटनीति

देवेश झा
“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय । टूटे ते फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय”।। रहीमÞ का यह दोहा स्कूल के दिनों में पढ़ा था हमने, पर देश की कूटनीतिक दुरावस्था देख बरबस एकबार फिर याद हो आयी । पिछले २५० वर्षों से नेपाल की कूटनीति मूलतः इसी बात को ध्यान में रखकर तय की गई है कि यह देश विश्व के दो विशाल देशों के बीच अवस्थित है । नेपाल को छोटे–छोटे राजाओं रजवाड़ों से मुक्त कराकर एकीकरण करवाने का श्रेय शाहवंशीय राजा पृथ्वी नारायण शाह को जाता है । अपने सत्तारोहण के पश्चात उन्होंने देश की राजनीति और कूटनीति से सम्बन्धित कुछ सन्देश दिए थे, जिन्हें “दिव्योपदेश” कहा जाता है । नेपाली भाषा में यह निचली कक्षाओं का अनिवार्य विषय बनता रहा है । यह उस समय की बात थी जब भारत पर अंग्रेजों का राज हुआ करता था । तिब्बत एक स्वतन्त्र देश था और चीन में राजतन्त्र का दौर था । अपने उस “दिव्योपदेश” में राजा पृथ्वी नारायण शाह ने दक्षिण के बादशाह को बहुत ही चालाक बताया है । वास्तव में उनका ध्येय अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति से देश को सतर्क रखना रहा होगा । पर दुर्भाग्यवश आज भी नेपाल के शासक समुदाय राजा पृथ्वी नारायण शाह के उसी नीति का बखान बरबख्त भारत के विरुद्घ भी करते रहते हैं ।
सन् १९४७ में भारत के स्वतन्त्र होने के समय नेपाल में राणाओं का एकल पारिवारिक शासन हुआ करता था । परम्परागत रूप से ही राणाओं का ताल्लुक अंग्रेज शासकों के साथ था । भारत में अंग्रेजों का शासन समाप्त होते ही राणाओं के लिये राजनीतिक सहयात्री की खोज एक जटिल समस्या बन गई थी । उधर चीन में कम्युनिष्टों के बढ़ते प्रभाव के कारण भारतीय शासक चाहते थे कि नेपाल भी प्रजातान्त्रिक पद्घति अपनाए ।

संयोगवश नेपाल के कई नेतागण भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में भी शिरकत कर चुके थे । जिस कारण उन नेताओं का भारतीय नेताओं के साथ निकटता बनी हुई थी । इसके अतिरिक्त भारत के अनेक विश्व विद्यालयों में अध्ययन करने के कारण भी बहुत से नेपालियों का भारत के साथ आत्मीयता बन गई थी । इन सभी अनुकूल परिस्थितियों के कारण राणाओं के विरुद्घ कियागया सशस्त्र संघर्ष सहज ही सफल हुआ और नेपाल में राजा सहित के प्रजातान्त्रिक पद्घति का अभिनव प्रयोग प्रारम्भ किया गया ।

भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु के प्रयास से जल्द ही नेपाल को संयुक्त राष्ट्रसंघ का सदस्य बना लिया गया और उसके कुछ समय पश्चात नेपाल असंलग्न राष्ट्रों के समूह में भी जोड़ लिया गया । राणा शासन के अन्तिम समय में भारत और नेपाल के बीच एक शान्ति और मैत्री सन्धि किया गया जिसे बहुचर्चित १९५० की सन्धि कहा जाता है । नेपाल में एक बहुत बड़ा तबका इस सन्धि का शुरु से ही विरोधी रहा है । नेपाली शासकों ने सदा ही इस सन्धि के बारे में काठमाण्डु को भ्रमित रखा है । सम्भवतया चीनी कम्युनिष्टों के बढ़ते प्रभाव के कारण यह आशंका बनने लगी थी कि तिब्बत की तरह ही चीन किसी भी समय नेपाल को भी अपने शिकंजे में ले सकता है और नेपाली सेना चीन के सैन्यबल को रोक पाने की क्षमता नहीं रखती थी ।

इसलिये १९५० की सन्धि के द्वारा भारतीय सेना को यह अधिकार दिया गया कि वह नेपाल पर होने वाले किसी भी हस्तक्षेप को निरस्त कर सके । इसका प्रमाण यह है कि नेपाली नागरिक को भारतीय सेना में भर्ती होने का अधिकार प्राप्त है पर भारतीय नागरिक नेपाली सेना में शामिल नहीं हो सकते । नेपाल के लोग भारत में सम्पत्ति आर्जन कर सकते हैं पर भारतीयों के लिये यह सुविधा नहीं है । सन् १९५० की सन्धि में बराबर का हक होने के बावजूद भारत ने अपने नागरिकों को नेपाल में वह सुविधाए लेने नहीं दी जो नेपालियों को भारत में प्राप्त है । परन्तु काठमाण्डु के सिंहदरबार में बैठे शासकों ने सदैव ही अपने नागरिकों को १९५० की सन्धि के बारे में भ्रमित किया है । जब भी सिंहदरबार में बैठे शासकों को भारत ने ऐसा सुझाव दिया है जो उन्हें अरुचिकर रहा तो वे फौरन ही इसे भारतीय हस्तक्षेप का नाम देकर जनता को भारत के विरुद्घ उकसाने लगते हैं ।
इस बार भी यही हुआ । दूसरी बार बनी हुई संविधान सभा से जब हठात संविधान जारी करने के लिये शासकों ने मंसूबा बना लिया तो भारत की ओर से अपने विदेश सचिव को भेजकर धैर्यपूर्वक एवं ऋषिमन से संविधान बनाने का आग्रह किया गया । अब चूँकि नेपाल के बड़े दलों में संविधान का जारी होना ही सत्ता परिवर्तन की पूर्वशर्त थी इसलिये भारतीय विदेश सचिव एस.जयशंकर की कोशिश को सिरे से नकार दिया गया । हालांकि भारतीय कोशिश भी सही समय पर नहीं की गई थी ।

आम नेपाली जनमानस में इसे भारतीय हस्तक्षेप के रुप में प्रचारित किया गया जो कि सफल रहा । खासतौर पर पहाड़ी समुदाय इस बात पर एकमत हो गया कि यह एक दबाव है और फलस्वरुप विशेषरुप से काठमाण्डु में जबरदस्त भारत विरोधी माहौल बन गया । इस अवसर का भरपूर लाभ भारत विरोधी शक्तियों को मिला जो आज भी जारी है ।
इसके बाद तो प्रत्येक राजनीतिक घटनाक्रम से भारत को जोड़ने की कोशिश की गई जो बदस्तूर जारी है । संविधान जारी किये जाने के बाद मधेसी मोर्चा ने सीमा पर नाकाबन्दी लगा दी जिसमें प्रत्यक्षतः भारत का हाथ माना गया । तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. सुशील कोईराला ने पहले से तय रहे दलीय सहमति को मानते हुए पद से त्यागपत्र दे दिया और नये प्रम का चुनाव हुआ जिसमें सुशील कोईराला भी उम्मीदवार के रूप में थे । ताज्जुब तो तब हुआ जब आन्दोलनरत मधेसी मोर्चा ने अचानक से इस निर्वाचन में भाग लेने की घोषणा कर दी । स्वाभाविक था आम जनता इसे भी भारतीय साजिश ही मानती । के.पी.ओली एक भारत विरोधी लहर के रूप में प्रधानमंत्री बने ।

इसके साथ ही ऑन लाइन मीडिया ने तो भारत विरोधी मुहिम ही छेड़ दी । देश के बड़े दैनिक अखबार तो सम्पादकीय में भी भारत को दोषी दिखाने लगे । यह सब प्रायोजित तो था ही, साथ ही दिल्ली में बैठे भारत सरकार विरोधी भी इसे मौन सहयोग दे रहे थे । ऐतिहासिक रूप से भारत नेपाल सम्बन्ध कड़वाहट में बदलती जा रही थी । प्रधानमंत्री ओली अपनी कटुक्तियों और व्यंग्य वाण का भरपूर इस्तेमाल कर रहे थे । लेकिन अचानक प्रधानमंत्री का भारत भ्रमण तय होते ही आनन फानन में सारे नाके खोल दिये गये । वैसे रक्सौल नाके के अलावा अन्य नाकाओं पर बन्द का कोई खास असर था भी नहीं । पर जो भी हो दिल्ली और काठमाण्डु के बीच सम्बन्ध सौहार्द हो जाने की बात दोनों पक्षों की ओर से कह दिया गया । इन सभी के बीच मधेस की चीख सुनने वाला कोई नही हुआ । एक बारगी तो लगने लगा कि अब सबकुछ ठीक हो गया है ।
नेपाली काँग्रेस का महाधिवेशन आया और शेर बहादुर देउवा इस पार्टी के सभापति निर्वाचित हुए ।

कुछ दिनों बाद अचानक माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड ने सरकार के प्रति अपनी असन्तुष्टि दिखाई और सत्ता के गलियारे में ओली सरकार के जल्द ही गिर जाने की खबर आने लगी । तभी अचानक चीन की सक्रियता दिखाई दी । प्रायः नेपाल के आन्तरिक राजनीति में खामोश रहने वाला ड्रैगन इसबार हलचल करता दिख रहा था । और फिर परिणाम भी सामने आ गया । रात भर में बाजी पलट चुकी थी । प्रचण्ड ने प्रधानमंत्री ओली को जीवन दान दे दिया था । एकबार फिर से भारतीय कुटनीतिज्ञ निशाने पर थे । सारी खुन्नस नेपाल के राष्ट्रपति की होने वाले भारत भ्रमण पर निकाली गई । पहले तो दिल्ली में रह रहे नेपाली राजदूत को वापस बुलाया गया और फिर नेपाल के महामहिम राष्ट्रपति की होने वाली भारत यात्रा स्थगित कर दी गई वो भी बिना किसी पूर्व सूचना के ।

कहा तो यहाँ तक गया कि काठमाण्डु स्थित भारतीय राजदूत को वापस भेजा जा सकता है । पर यह मुद्दा ऑन लाइन न्यूज चैनलों तक ही सीमित रहा । इस बीचखबर यह आई कि दिल्ली में एक उच्चस्तरीय बैठक का आयोजन कर यह समझने की कोशिश की गई की आखिरकार नेपाल की भारत के साथ नाराजगी की वजह क्या है । भारतीय विदेश मन्त्रालय के वर्तमान एवं पूर्व पदाधिकारियों के साथ ही नेपाल स्थित भारतीय दूतावास के पदाधिकारी समेत शामिल उस महत्वपूर्ण बैठक में नेपाल–भारत की वर्तमान अवस्था के लिये भारत ने खुद को ही जिम्मेवार समझा है । इस निर्णय पर पहुँचने की बड़ी वजह नेपाल के राष्ट्रपति का स्थगित भारत भ्रमण और नेपाली राजदूत दीप कुमार उपाध्याय को वापस बुलाया जाना ही माना जा रहा है ।

काठमाण्डु की मीडिया को एक बार फिर बड़ा मसाला मिल गया । दरअसल यह समझना जरुरी है कि जैसा दिखाया जाता है वैसा स्वतन्त्र नेपाली मीडिया नहीं है । अमूमन तो इस देश में कार्यरत लगभग सभी कलमजीवी किसी न किसी दल विशेष से जुड़े हैं । फिर आर्थिक रूप से अत्यन्त कमजोर यह क्षेत्र सदा से ही पराश्रित रहा है । इसलिये स्वान–भक्ति इनकी मजबूरी है । तो हाय–तौबा मचाना ही पत्रकारिता माना जाता रहा है यहाँ । फिर ऑनलाइन न्यूज चलाने वाले तो प्रायः बेचारे पार्टी कार्यकत्र्ता ही हुआ करते हैं । उनका जेबखर्च इसी बात पर निर्भर करता है कि वो कितनी भक्ति दिखा सकते हैं ।
लेकिन इन सभी प्रकार के तमाशे का परिणाम यह हुआ है कि नेपाल कूटनीतिक क्षेत्र में कच्चा साबित होने लगा है । अपने बचपने भरे रवैये के कारण नेपाल विदेशी कूटनीतिज्ञों की नजर में हँसी का विषय बनता जा रहा है । संसदीय प्रणाली को स्वीकार कर चुका नेपाल अपने ही नेताओं के सतही हरकतों के कारण असफल होता सा दिखने लगा है । प्रचुर प्राकृतिक क्षमता का धनी होने बावजूद यह गरीब अफ्रिकी देशों की तरह बनता जा रहा है । परिस्थिति का आकलन इसी से किया जा सकता है कि पिछले दिनों स्वयं माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष प्रचण्ड ने ही नेपाल में तानाशाह की आवश्यकता होने की बात कह डाली । कहते हैं कि नेपाल में सात लाख लोगों का जीवन स्तर अमेरिकन जैसा है और बाँकियों का गरीब अफ्रिकी देशों जैसा । नेपाल की दक्षिणी खुली सीमा भारत से जुड़ी हुई है । भाषा, पहनावा, खान–पान, दैनिक व्यापार से लेकर शादी–व्याह तक सबकुछ भारत के साथ है । पर दुर्भाग्यवश काठमाण्डु भारत का विरोध करना ही अपनी अघोषित कुटनीति बनाए हुए है । ऐसे में यही कहा जा सकता है कि…“रहिमन धागा प्रेम का……..”

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