अलग देश की आवश्यकता अभी बिल्कुल नहीं है

‘राजनीति की रपटीली राह में कमाना तो दूर रहा, गाँठ की पूँजी भी गवाँ बैठा । मन की शांति मर गई, संतोष समाप्त हो गया । एक विचित्र–सा खोखलापन जीवन में समा गया । ममता और करुणा के मानवीय मूल्य मुँह चुराने लगे ।’
(माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी)
–नेपाल सद्भावना पार्टी के स्थापना काल से ही, मधेश और मधेशियों के अधिकार, सम्मान, पहचान के लिए अनवरत संघर्षरत नेपाल सद्भावना पार्टी के केन्द्रीय सदस्य श्री रवीन्द्र नाथ मिश्र जी से गंगेश मिश्र द्वारा लिए गए साक्षात्कार का संपादित अंश–

Rabindra Nath Misra

श्री रवीन्द्र नाथ मिश्र

० मधेश के प्रति नेपाल के शासकों का दृष्टिकोण और नेपाल सद्भावना पार्टी की भूमिका, इस संदर्भ में बताएँ ।
– शुरू से ही नेपाल में, जो शासक वर्ग के लोग हैं, वे मधेश को एक उपनिवेश के रूप में देखते रहे हैं । उनके विचार से यहाँ के लोग यहाँ के नागरिक नहीं हैं, बल्कि ये भारतीय नागरिक हैं, जो नेपाल की नागरिकता ले कर यहाँ बस गए हैं । इसके संदर्भ में, हर्ष बहादुर गुरुङ ने एक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया कि नेपाल की आबादी इसलिए बड़ी है कि यहाँ भारत से आ कर लोग बस गए हैं, जिनकी नागरिकता फर्जी है । उस समय पंचायती व्यवस्था थी, पार्टियाँ प्रतिबंधित थीं । ऐसे में, श्री गजेन्द्र नारायण सिंह ने एक संस्था की स्थापना की,‘नेपाल सद्भावना परिषद्’ । इसी संस्था के माध्यम से हर्ष बहादुर गुरुङ के प्रतिवेदन का विरोध किया गया, उसे जलाया गया । वही संस्था २०४७ साल में, देश में प्रजातन्त्र आने के बाद, ‘नेपाल सद्भावना पार्टी ‘के रूप में स्थापित हुई । मधेशियों को सम्मान और पहचान दिलाने के लिए गजेन्द्र नारायण सिंह ने पूर्व मेची से लेकर पश्चिम महाकाली तक यात्रा की । इस संदेश को देने के लिए कि ‘हम इस देश के नागरिक हैं, हर्ष बहादुर गुरुङ का प्रतिवेदन सरासर गलत था, झूठा था । ‘इसी एजेण्डे को लेकर उन्होंने पार्टी के घोषणा पत्र में कहा कि, ‘दस हजार मधेशी युवाओं की एक फौज बनाई जाय । ‘क्योंकि मधेशी ही मधेशियों की पीड़ा को समझ सकता है । इसलिए मधेशियों के हक, हित के लिए बनाई गई पार्टी है, ‘नेपाल सद्भावना पार्टी’ जो अनवरत नेपाली सत्ता से संघर्ष करती रही है ।
० नेपाल में आन्दोलनों का, एक लम्बा इतिहास रहा है, जारी मधेश आन्दोलन और अन्य आन्दोलनों में क्या अन्तर हैं ?
– अब तक इस देश में जितने भी आन्दोलन हुए हैं, सत्ता परिवर्तन के लिए, सत्ता प्राप्ति के लिए हुए हैं । मधेश आन्दोलन ही, एक ऐसा आन्दोलन है, जो सत्ता के लिए नहीं बल्कि मधेशियों के स्वाभिमान, सम्मान और पहचान के लिए हुआ है । नेपाल दुनियाँ का एक मात्र ऐसा देश है, जो कभी गुलाम नहीं रहा । यहाँ के प्रजातन्त्रवादी नेता, प्रजातन्त्र के लिए जितना जेल गए हैं, उतना एसिया महाद्वीप में नहीं गए । लेकिन कभी गुलामी के दर्द को महसूस नहीं किया, उसे सहा नहीं, इसलिए जितने भी पहाड़ी समुदाय के लोग सत्ता में आए, नेपाल को समझ ही नहीं पाए । इन्होंने काठमांड और पहाड़ की खूबसूरत वादियों को ही नेपाल समझा और नैतिकता विहीन राजनीति, दिशाहीन शासन संचालन करते रहे । इन्होंने मधेश के भूमि को तो नेपाल समझा लेकिन मधेशियों को नेपाली नहीं समझा । आज मधेश आन्दोलन ने जो रूप धारण किया है, उसका मूल कारण सत्ता द्वारा मधेशियों की अनदेखी और उपेक्षा है ।
० क्या नेपाल में, सत्ता संचालन करने वाले लोगों में क्रमिक विकास हुआ है ?
– नहीं । वर्तमान समय में नेताओं की जो बोली रही है, चाहे प्रधानमन्त्री खड्ग प्रसाद ओली जी हों, चाहे माधव कुमार नेपाल जी, झलनाथ खनाल जी चाहे शेर बहादुर देउवा जी सबने मधेश के संदर्भ में विषवमन ही किया, जहर ही उगला । इस पर इकबाल का एक शेर याद आता है,
‘हजारों साल नरगिस, अपने बे–नूरी पे रोती है । बड़ी मुश्किल से होता है, चमन में दीदावर पैदा ।’
हजारों साल में, कोई ऐसा नेता पैदा होता है, जो देश की जनता के दुखों को समझ सके, पूरे देश को एक रख सके । इसलिए मैं कहता हूँ, सत्ता संचालन करने वाले लोगों में क्रमिक विकास नहीं हुआ है बल्कि इन्होंने चारो ओर घृणा फैलाई है । पहाड़ और मधेश के बीच की खाई को गहरा ही किया है ।
० संविधान जारी करते समय सभी पहाड़ी पार्टियाँ, एकजुट हो गईं । इस परिप्रेक्ष में, क्या नेपाल में बहुदलीय के जगह द्विदलीय प्रणाली स्थापित होगी ?
– नेपाल में जहाँ तक बहुदलीय और दो पार्टी की बात है, तो यहाँ दो पार्टियाँ इस रूप में स्थापित होंगी, एक पहाड़ी समुदाय के लिए लड़ने वाली पार्टी और दूसरी मधेशी समुदाय के स्वाभिमान, सम्मान के लिए लड़ने वाली पार्टी । ये दो पार्टियाँ हो सकती हैं, देश में । यदि दो पार्टियाँ हों तो । क्यूँकि वर्तमान आन्दोलन ने यह साबित कर दिया है । यहाँ मधेशियों के दमन के लिए, संविधान को जारी करने के लिए सारी पहाड़ीवादी पार्टियाँ एकजुट हो गईं । लेकिन मधेश के नेता एकजुट नहीं हो पाए, अभी भी मधेशी समुदाय के नेतागण कांग्रेस, नेकपा (एमाले), माओवादी, राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टी आदि दलों में लगे हुए हैं । मेरे कहने का मतलब है, मधेशी समुदाय के हक, हित के लिए, एक साझा मंच पर सबको काम करना चाहिए । किसी एक के नेतृत्व को स्वीकार कर, मधेशियों के स्वाभिमान और सम्मान के लिए लड़ना चाहिए । जहाँ तक बात दो पार्टी बनने की है, तो इस देश में दो पार्टी प्रणाली संभव नहीं है । क्योंकि सबकी अलग–अलग विचारधारा है, अपने–अपने दर्शन हैं ।
० क्या आप मानते हैं, मधेश को एक अलग देश होना चाहिए ? क्या ऐसा संभव है ?
– वर्तमान समय में, मधेशी समुदाय के लोग, अखण्ड नेपाल में रह कर ही अपने सम्मान व स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहे हैं । अलग देश की आवश्यकता अभी बिल्कुल नहीं है, क्योंकि हम अपने अधिकार के संरक्षण के लिए, संवर्धन के लिए संघर्ष कर रहे हैं । लेकिन सरकार ने, शासक वर्ग के लोगाें ने मधेशियों के सम्मान, स्वाभिमान और पहचान को ही खत्म करना चाहा । तो निःसंदेह आने वाले समय में मधेशी समुदाय, मधेश को एक अलग देश बनाने के लिए संघर्ष करेगा । लेकिन वर्तमान समय में, ऐसी कोई बात नहीं, ऐसा होना भी नहीं चाहिए ।
० वर्तमान संविधान किस रूप में पक्षपातपूर्ण है ? क्या नेपाली शासक संघीयता को भी, मधेश के खिलाफ हथियार के रूप में प्रयोग करना चाहते हैं ?
– वर्तमान आन्दोलन, लोकतान्त्रिक गणतन्त्र को मजबूती प्रदान करने के लिए ही किया जा रहा है । समस्या ये है, हर्ष बहादुर गुरुङ ने अपने प्रतिवेदन में जो बातें, पंचायत काल में कही थी । उसी के निरन्तरता के रूप में, यह नयाँ परिमार्जित संविधान बनाया गया है । इसमें भी मधेशियों की नागरिकता के विषय में, संदेह जताया गया है । संघीयता तो ठीक है, परन्तु पहाड़ी शासक वर्ग के लोग अपने प्रकार की संघीयता लाना चाहते हैं । जो सर्वथा अनुचित है, ये लोग ऐसी संघीयता चाहते हैं, जिसमें मधेशी समुदाय के लोग कभी स्वतन्त्रता की अनुभूति ना कर पायें, कभी अपनी सरकार न बना पायें । मधेश में, जहाँ दो मधेश–प्रदेश की बात स्व. गजेन्द्र नारायण सिंह ने की थी, नारायणी से पूर्व, पूर्वी मधेश और नारायणी से पश्चिम, पश्चिमी मधेश । आज इस मधेश को तीन–चार भागों में, विभाजित कर नेपाली शासकों ने इसमें पहाड़ के जिलों को भी मिला दिया । यह साजिश इसलिए की गई, ताकि मधेशियों का वर्चस्व मधेश से समाप्त हो जाय । वास्तव में, नेपाली समुदाय के लोग संघीयता को ला कर पछता रहे हैं, पश्चाताप कर रहे हैं । इनके लिए संघीयता ही अभिशाप बन गयी है ।
० आन्दोलन को दबाने के लिए बर्बरतापूर्ण आचरण करना, मधेश के आन्दोलन को, भारतीय आन्दोलन बता कर दुष्प्रचार करना इससे भारत–नेपाल सम्बन्धों पर कैसा असर पड़ा है ?
– दुनिया का कोई भी देश अपने ही नागरिकों पर, ऐसा अमानवीय व्यवहार नहीं करता, जैसा कि नेपाल के वर्तमान सरकार ने मधेश और मधेशी आन्दोलन को दबाने के लिए किया है । इससे स्पष्ट हो जाता है, नेपाल के शासक वर्ग के लोग मधेशियों को अपना मानते ही नहीं । बात मानने या जानने की नहीं है, बात अधिकार की है, जो मधेश और मधेशियों को मिलनी ही चाहिए । लाठी, गोली के दम पर मधेश के अधिकार को और अधिक दिनों तक सरकार नहीं दबा सकती । रही बात भारत–नेपाल संबन्धों की, तो भारत सदैव नेपाल की सहायता करता रहा परन्तु नेपाल सदैव एक कृतघ्न मित्र की भूमिका में रहा । २००७ साल में राणा शासन के खिलाफ हो, चाहे नेपाल के प्रजातान्त्रिक आन्दोलन के पक्ष में हो, भारत हमेशा नेपाल के साथ रहा है । नेपाल के शासक वर्ग के लोग, जब मधेश के झरोखे से भारत को देखते हैं तो भारत इन्हें अपना सबसे बड़ा शत्रु नजर आता है । मधेश के प्रति इनका मानसिक पाप, इन्हें डराने लगता है, कहीं मधेश भारत में न चला जाय । मधेश का भूत, इन्हें सदियों से ऐसे ही डरा रहा है । यही कारण है, नेपाल के शासक गाहे–बगाहे भारत के प्रति शंका व्यक्त करते रहते हैं जहर उगलते रहते हैं, जिससे दोनो देशों के बीच के सम्बन्धों में कटुता आती है । वर्तमान मधेश आन्दोलन के विषय में भ्रम फैलाने के उद्देश्य से, पहाड़ी शासकों ने इसे भारत द्वारा संचालित कहा । भारत सार्वभौम सम्पन्न, विशाल लोकतान्त्रिक राष्ट्र है, जो नेपाल को अपना मित्र छोटा भाई समझता है । नेपाल, भारत का चाहे जितना विरोध करे, कितनी भी कटुता आ जाय । भारत सदैव बड़े भाई की भूमिका में रहेगा, रहना भी चाहिए ।

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