अल्लाह ही जानें

प्रकाशप्रसाद उपाध्याय:रसों की प्रतीक्षा के बाद खुदा मेहरवान हो ही गए । देश में गणतंत्र संस्थागत हो गई संघीयता और धर्म निरपेक्षता जैसे कई विशेषताओं के साथ । संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र के रूप में देश का नाम अंकित हो गया विश्व के मानचित्र पर । संविधान के बन जाने पर, इससे पहले इसके न बन पाने की संभावना पर उठ रहे सवाल तो अब सदा के लिए बंद हो गए, लेकिन अब आगे क्या होगा ? अनेक लोगों के मुँह से यह प्रश्न निकल रहा है । देश में जो हालात बन रहे हंै उसे देखते हुए यह भी कहा जा रहा है –अल्लाह ही जाने क्या होगा आगे ।
अब तो इबादत नीली छतरी वाले से ही की जा सकती है –हे खुदा, सद्बुद्धि दो उन ताकतों को जो कल तक अंकमाल करते हुए, हँसते–हँसाते सत्ता का उपभोग कर रहे थे पर आज यह कहते हुए ताल ठोक रहे हैं कि हमारी बात नहीं मानेगे तो ……………..
ऐसे में हम जैसे निरीह जनता तो यही इबादत कर सकते हैं कि हे खुदा सद्बुद्धि दो इन भाईयों को जिससे की हमलोग सुकुन की साँस ले सकें ।
देश धर्म निरपेक्ष हो गया अतः मै अल्लाह को ही याद कर रहा हूँ कभी हँसते कभी रोते । रोना इसलिए पड़ रहा है कि मेरी जन्मभूमि जल रही है । घायल पड़ोसियों को जब दर्द से कराहते हुए पाता हूँ तो दिल दहल जाता है । भाई–भतीजे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं । भूख, अभाव और मंहगाई की मार से बिलख रहे हैं वह । ताली में सब्जीरहित सूखे चावल (भात) को देखकर वे मचल उठते हैं खाएँ तो कैसे खाएँ सूखे चावल । मेरी चाची, भौजी, जो मुझ प्यार से कभी थपथपाया करती थी, मुस्कुराते हुए बातें करती थीं, अब देखी अनदेखी कर देती हैं यह सोचकर की अभाव के इन दिनों मैं कहीं खाने को कुछ मांग न लूँ । साथ अंकमाल करते हुए स्कूल कॉलेज जाने वाले मित्रजन बतियाने से कतराते ही हैं , निकट से गुजरने पर इस प्रकार देखते हैं कि शरीर भी थरथरा जाता है । अतः मन में बार–बार प्रश्न उठता है –अल्लाह जाने क्या होगा आगे ।
लेकिन बुजुर्ग लोग कहते हैं –डरो मत । यह कुछ ही दिनों की बात है । यह इगो (अहम) की लड़ाई है । जल्दी ही सब ठीक हो जायगा । भाइ लोग स्थिति सामान्य बनाने में लगे हुए हैं । विश्व युद्ध उपरांत शांति के नाम से संसार के देशों के बीच बड़े–बड़े समझौते हुए, लेकिन सभी का अक्षरशः पालन हुआ क्या ? पर समाधान निकलेगा , जरुर निकलेगा । फिर भी मेरा भयभीत मन बारबार अल्लाह की इबादत करते हुए कहता है –ओ मेरे अल्लाहताला, तोड़ दो उन तालियों को जो खुलने नहीं दे रही है सुलह और समझौते के दरवाजे को ।
मेरे हालात और मेरी इबादत पर पता नहीं अल्लाहताला कब गौर करेंगे । अल्लाह ही जानें ।

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