अवस्था मिथिला मधेश की-काशीकान्त झा

थिरकती लेखनी मिथिला–मधेश की गरिमा युवक वर्ग के समक्ष प्रस्तुत गरने के लिए प्रेरित करती है । प्रकृति प्रदत्त मिथिला–मधेश की भूमि प्रशस्त प्राकृतिक सौन्दर्य उपहार स्वरुप सम्पूर्ण चर–अचर प्रणियों के लिए सदा–सर्वदा प्रदान करने में कभी पीछे नहीं रही है ।
चतुर्दिक आम्र वाटिका की पल्लवित, पुष्पित डालियाँ नव किसलय साथ निशा–दिवा स्वतन्त्र रूप से विचरणरत समस्त जीव–जन्तुओं को शीतलता, मधुरफल, प्रश्रय स्थल तथा प्राण वायु प्रदान करती आ रही है ।
जनक–जानकी की पावन मिथिला मधेश–भूमि अपनी आध्यात्मिकता का परिचय अभी भी प्रदान कर रही है । ऋषि–मुनि की इस तपोभूमि में वैवाहिक संस्कार के माध्यम से सामाजिक जीवन अवलम्बन द्वारा भी मानव समाज को शान्ति प्रदान कर सवल–सक्षम एवम् समृद्ध बनाते हुए देवत्व प्राप्ति के विलक्षण मार्ग प्रशस्त करने की दिशा में मिथिला मधेश की प्रकृति ने सतत् उदारता दर्शायी है । जिससे वेदज्ञ व्यासजी पूर्ण भिज्ञ होते हुए भी शास्त्रीय सम्वाद में सुकदेव जी को सरस वैवाहिक जीवन पथपर अग्रसर कराने में अपने को असमर्थ पाते हैं । फिर भी वे जनक जी की अलौकिक चमत्कारी दिनचर्या अपनी आँखें से अवलोकन हेतु सुकदेव जी को उनके दरबार जनकपुर में उनसे साक्षात्कार हेतु जाने के लिए प्रेरित करने में सफल होते हैं ।
वहाँ पहुँचने पर अग्नि समक्ष अपनी महारानी एवम् सेविका साथ विराजमान जनक जी की अवस्था देखते ही सुकदेव जी अचम्भित हो उठते हैं । उन्हें आभास होता है कि तेजस्वी एवम् तपस्वी जनकजी सदृश्य ऋषितत्व प्राप्त करने के मार्ग से उनका चरण तथा मन–मस्तिष्क अभी भी कोशों दूर हैं । उनकी इस अपूर्णता का बोध विद्युतीय गति से उनके शरीर के सम्पूर्ण तन्तुओं को झकझोर देता है । जिसके कारण अपनी आध्यात्मिकता प्रदर्शन हेतु मिथिला–मधेश में चरण रखे वाले सुकदेव मानव–जीवन के विभिन्न पक्ष के सम्बन्ध में जनकजी का विचार श्रमण हेतु जिज्ञासु हो उठते हैं ।
पश्चात् उन दोनों के बीच के सम्वाद से सुकदेव जी वैवाहिक–बन्धन में स्वयम् वेष्ठित होने के लिए आतुर भी होते हैं । जिससे व्यास जी की अभीष्ठ पूर्ति करने वाले अलौकिक गुण सम्पन्न व्यक्ति जनकजी के जन्म देने का सौभाग्य मिथिला–मधेश की भूमि जनकपुर को ही होने का गौरव स्पष्ट होता है ।
इस भूमि की विशिष्टता विश्व के मानव को सचेष्ट कराने के लिए तब और झकझोरती है, जब उन्हें स्मरण होता है कि राक्षस तथा राक्षसी प्रवृत्ति से कम्पीत नारी, गौ, पृथ्वी तथा ऋषिगण ही रक्षा के लिए जगदम्बा सीता का जन्म देने का श्रेय भी इसी भूमि को ही है । धनुष–यक्ष द्वारा धनुष–भंग करने वाले से सीता के विवाह होने का प्रण करने वाले मिथिला–नरेश राजर्षि जनक ही है । धनुष–यक्ष अवलोकनार्थ विश्वमित्र के साथ राम–लक्ष्मण का जनकपुर आने के क्रम में फुलहर के वाग में नित्यदिन गिरिजा–पूजन हेतु अपनी सहेलियो के साथ पुष्प–संकलन के क्रम में राम को सीता से प्रथम बार आँखें चार कराने का शुभ अवसर प्रदान करने वाली मिथिला की ही पवित्र भूमि है । धनुष–यज्ञ स्थल में धनुष तोड़ने वाले राम से परसुराम जी का परिचय कराने वाली जनक जी की ही भूमि है । जहाँ परसुराम द्वारा राम की परीक्षा लेने के पश्चात् उन्हें विष्णु अवतार के रूप में वे नमन करते हैं ।
नेपाल के प्रमुख अंग के रूप में स्थापित अन्न का भण्डार तथा गांवों का समूह मधेश की भूमि रही है । जहाँ के लोग देश भक्त होने के साथ ही मिट्टी, जल एवम् पेड़–पौधों को पूजा करने वाले कर्मठ तथा शान्ति–पथ गामी कृषक के रूप में रहते आये हैं । शुद्ध अन्न उपभोग करने वाले, शुद्ध विचार रखने वाले तथा किसी प्रकार के अखाद्य पदार्थ ग्रहण नहीं करने वाले मधेशी गण भगवान के परम भक्त रहते आए हैं ।
नेपाल के पहाड़ी भू–भाग से कुछ लोग मधेश की सम्पदा, लोगों की सम्पन्नता तथा उच्च विचार से डाह करते हुए निष्कृष्ट विचार वाले लोगों के ईशारे पर संगठित होकर मधेश की भूमि पर क्रमिक रूप से पूँजी विहीन अवस्था में प्रवेश करते हैं । पूर्व–पश्चिम राजमार्ग का निर्माण भी इसी योजना के तहत होने का तथ्य स्पष्ट दिखता है । फिर भी सीधा–सादा तथा उच्च विचार सम्पन्न मधेशियों द्वारा अतिथि गण के रूप में उन लोगों का सम्मान भी होता है । परन्तु धीरे–धीरे वे लोग वेष–भुषा, भाषा तथा प्रशासनिक दम्भ के माध्यम से छल–प्रपञ्च विधि द्वारा झापा, कैलाली, कञ्चनपुर एवम् अन्य मधेश के जिलों में अवस्थित विशेष रूप से राजवंशी, थारु, गनगाई, सतार, ताजपुरिया, बाँतर आदि जाति के बहुसंख्यक लोगों का चरम शोषण करते हैं । इन लोगों की पैतृक सम्पति का नव–प्रवेशी ‘खस’ मालिक बनते है । आदिवासी या पूर्व के निरीह मालिक गण उनके घर का नौकर–चाकर के रुप में कार्यरत देखे जाते हैं । कुछ मालिक गण द्ररिद्र–भंजन होकर भारत के विभिन्न भाग में रिक्सा तथा ठेला चलाकर जीवन यापन करते हुए देखे जाते हैं ।
‘खस’ तथा खस प्रवृत्ति के ऐसे लोगों का प्रवाह मधेश में बढ़ने के कारण मूलवासियों का आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक एवम् राजनीतिक शोषण के साथ ही प्रकृति का भी उन लोगों के द्वारा शोषण प्रारम्भ होता है । जिसके कारण आज जंगल प्राकृतिक सम्पाद विहीन होने के साथ ही नदी तथा कुएँ का पानी का मूल अधिकांश जगहों पर सूख चुका है । मधेशी गण भी भारती कृषि उत्पादन तथा बाजार पर निर्भर हो रहे है । चुरे क्षेत्र में अनियन्त्रित बसोबास के कारण मधेश को भी चरम मरुभूमि में एक ना एक दिन परिणत होना ही है । मधेशवासियों के लिए नैतिक शिक्षा तथा नौकरी का अभाव होना, मादक पदार्थ की सहज उपलब्धता, स्कुल–कॉलेज में भी कुछ ऐसे लोगों का मधेशी विद्यार्थियों के साथ प्रत्यक्ष सम्पर्क होना, मधेश के भी कुछ गांवों के घर–घर में दारु–रक्सी उत्पादन करने की व्यवस्था, प्रहरी द्वारा नियन्त्रण का न्यून प्रयास, कुछ गार्जियन द्वारा छात्र–छात्राओं के ऊपर निगरानी रखने में असमर्थता, सामाजिक मर्यादा का कमजोर होना, युवक वर्ग की आकांक्षा उच्च होना, घर–घर में प्रायः विदेश से प्राप्त रकम का दुरुपयोग होना, कुछ शिक्षक गण को भी विद्यार्थी से भय होना, उपभोक्ता मार्फत विकास के कार्य कराने की प्रवृति में वृद्धि होना, बोर्डर पर नशालु पदार्थ सस्ते दर में उपलब्ध होने का प्रावधान होना, अधिकांश युवक द्वारा मोटरसाइकिल का प्रयोग होना, नसालु पदार्थ सेवन की ऐसी परिपाटी को न्यून करने की सरकारी तथा गैर सरकारी संस्था का न्यून होना, युवक गण में नकल करने की प्रवृत्ति में वृद्धि होना, मत्स्य–मांस के प्रयोग में वृद्धि होना, सरकारी निकाय द्वारा ऐसे कुलत में संलग्न लोगों को खास जगह पर रखकर उन लोगों को खाने–पीने की व्यवस्था सरकार द्वारा होने के प्रवधान का अभाव होना इत्यादि कारण से नसालु पदार्थ सेवन करने वाले लोग चोरी, डकैती तथा अनेकों अनैतिक काम करने के साथ ही बच्चों को अपरहण कर उनकी हत्या करने में भी पीछे नहीं हटते हैं ।
शैक्षिक वातावरण को विनास के गर्त में वे लोग पहुँचा चुके हैं । जिसका ज्वलन्त उदाहरण जनकपुर का आर.आर क्याम्पस है, जहाँ पढ़ाई नहीं होती है, परन्तु परीक्षा अवधि में सैकड़ो मोटरसाइकिल क्याम्पस के बाहर देखे जाते हैं । क्याम्पस के भवन में उसे वृक्ष से स्पष्ट होता है कि इसकी रक्षा की जिम्मेदारी लेने वालों का अभाव है । क्याम्पस कम्पाउण्ड भीतर जहाँ पहले छात्र–छात्राओं की भीड़ होती थी, वहाँ आजकल कुत्ते दिनभर दौड़ते रहते हैं । कर्मचारी तथा प्रशासक गण समय पर हाजिरी करने अवश्य आते होंगे, परन्तु आदरणीय प्रायः प्राध्यापकगण को ना तो पढ़ना पड़ता है, और नहीं विद्यार्थियों से भेंटघाट क्याम्पस में करने की आवश्यकता होती है । जहाँ सरस्वती–भवन की ऐसी अवस्था है, वहाँ पर विश्वविद्यालय स्थापना का विषय चर्चा में लाकर इस समाज को और लज्जित करने के सिवा क्या कहा जा सकता है ? त्रिभुवन विश्वविद्यालय का कार्यालय काठमांडू में अवस्थित है । प्रायः उसका काम सिर्फ बजट भेजना है । शैक्षिक गति–विधि का अध्ययन–अवलोकन करने की जिम्मेदारी किसकी है ? चतुर्दिक चर्चा का विषय बना हुआ है ।
प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष रूप में भी अधिकांश मधेशियों को डिग्री प्राप्त ‘लेवर’ के रूप में तैयार करने की योजना बनाने तथा कार्यान्वयन करने में ‘खस’ प्रवृत्ति के लोगों को कुछ मधेशियों द्वारा भी वर्णनीय सहयोग प्राप्त हो रहा है । ऐसे मधेशी गण का स्टेशन काठमांडू में हैं, परन्तु वे लोग अपना सम्पूर्ण स्थल का निर्माण गांव–गांव में कर चुके हैं । जिसके माध्यम से ‘खस’ का प्रवेश मधेश के हर गाँव में सहज हो रहा है । ऐसे ‘नव प्रवेशी’ खस लोगों के इस भूमि में पदार्पण से आज मधेशी गण (दलित, जनजाति, आदिवासी, थारु, मुस्लिम, अल्पसंख्यक आदि) पहचान, समानता नया समता प्राप्ति हेतु शान्तिपूर्ण अहिंसात्मक आन्दोलन में अपनी ही भूमि में गोली के शिकार बन रहे हैं । अधिकार प्राप्ति की लड़ाई तब यहाँ लड़ी जाती है, जब लोग देखते हैं कि नेपाल में दो तरह की शासन–पद्धति व्यवहार में सञ्चालित हैं
एक है– काठमांडू नेपाल शासन पद्धति तो दूसरी है– मधेश नेपाल शासन पद्धति । विश्व के किसी भी प्रजातान्त्रिक मुल्क में ऐसी शासन–पद्धति सञ्चालन में नहीं है । इसलिए मधेशी गण भी इस शासन पद्धति को निर्मुल करने के अभिप्राय से आगे बढ़ रहे हैं । यदि यहाँ की राजनीतिक परिस्थिति में संवैधानिक सर्वमान्य सकारात्मक परिवर्तन सत्ता पक्ष द्वारा नहीं लाया गया तो कल मधेशियों का यहाँ से पलायन अवश्यसम्भावी दिख रहा है । मधेशियों का पलायन होना या कमजोर होना नेपाल के लिए स्वतः दुर्भाग्य का विषय है । इस लिए मधेश में सुलगती आग को धधकने से पूर्व बुझने के लिए दूरदर्शी राजनीतिज्ञ, युवक वर्ग, विद्वत् गण एवम् सर्वमान्य महात्मा लोगों की अगुवाई आवश्यक दिख रही है ।
युवक वर्ग में राष्ट्र प्रति सकारात्मक विचार के प्रवाह द्वारा मातृभूमि नेपाल की अखण्डता की रक्षा के लिए अरब के उष्ण देशों में जीविकोपार्जन हेतु पठाने के बजाय नेपाल की मिट्टी में ही अथक परिश्रम द्वारा स्वर्ण उपजाने की प्रविधि हस्तान्तरण प्रक्रिया में सबों का सरकारी तथा अर्धसरकारी निकायों में समानुपातिक समावेशी पद्धति द्वारा संलग्न करना नेपाल सरकार की जिम्मेदारी होती है । सरकार से प्राप्त आश्वासन के आधार पर सीमांकन द्वारा मधेश के युवक गण को भी नव संविधान २०७२ प्रति आकर्षित करने की अहम् भूमिका को यदि सरकार कार्यान्वयन करने में अस्वीकार करती है तो विश्व प्रजातान्त्रिक देशों के विद्वत् गण, नेतृत्व वर्ग तथा मानवतावादी गण नेपाल सरकार के प्रति अपनी मौन अवश्य भंग करेंगे ।
प्राथमिकता के तीसरे क्रम में नागरिकता की बात आती है । इस सम्बन्ध में नेपाल के मधेशी युवक गण की अवधारणा भी स्पष्ट है । उन लोगों की मांग है कि नेपाल पुरुष से विदेशी औरत भी वैवाहिक सुत्र में आवद्ध हुए दिन से ही नेपाल की मोनाफायड नागरिक होने का प्रावधान नेपाल सरकार शीघ्रातिशीघ्र संशोधन द्वारा संविधान में उल्लेख करें । यदि सरकार आनाकानी करती है तो पुनः मधेशी युवक गण आन्दोलन करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हैं ।
नागरिक की भावना प्रति सम्वेदनशील होना, उनका सम्मान करना तथा परिपुर्ति के लिए संविधान संशोधन यथाशीघ्र करना सरकार का प्रमुख दायित्व होता है । जिससे राष्ट्रीय अखण्डता संरक्षण का प्रथम चरण माना जाता है ।
मधेश के सम्पूर्ण युवक गण धैर्य के साथ संविधान संशोधन प्रति सरकार की गतिविधि को नजदीक से अध्ययन–मनन करते हुए प्रतीक्षारत हैं ।

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