अश्वत्थामाकारिता, पत्रकारिता यह चौथा अंग अंगद के पैर की तरह स्थिर है

 बिम्मी शर्मा, काठमांडू, १२ सेप्टेम्बर |

महाभारत के युद्ध को निर्णायक बनाने के लिए गुरु द्रोणाचार्य का मरना जरुरी था । इसी लिए अश्वत्थमा नामक हाथी को मार कर शंखध्वनि कर के गुरु पुत्र के मारे जाने की अफवाह फैलाई गई । शंख घोष में अश्वत्थामा हतो हतः कहा गया पर वह अश्वत्थामा इंसान था कि घोड़ा या हाथी किसी ने इस की खोज खबर नहीं ली । इसी एक झूठ के चलते गुरु द्रोणाचार्य ने शस्त्र अस्त्र छोड़ कर पुत्र के मृत्यु के गम मे समाधि ले ली और उनकी हत्या कर दी गयी ।

ashwasthama

कहा जाता है अश्वत्थामा आज भी जीवित है । अष्ट चिरंजीवी में शुमार अश्वथामा हत्या का यह प्रसगं आज भी प्रेरक है । जब भी नेपाल की पत्रकारिता और इस को दुधालू गाय की तरह दूहे जाने की खबर पत्रिका में आती है तब तब मुझे अश्वत्थामा की यह कथा याद आ जाती है । नेपाल के पत्रकार भी घटना छानबीन नहीं करते हाथी मरा है या घोड़ा उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता । जहां दुर्घटना की शंखध्वनि बज जाती है वंही इस को सच मान कर आनन, फानन में पत्रकार समाचार लिखने लगते हैं ।

जब भी कोई घट्ना या दुर्घटना होती है उसमें घायल होने वाले या मरने वाले की सही संख्या नहीं बतायी जाती । दुर्घटना में मरे या जीवित लोगों के करीब या लगभग संख्या बताते हैं तय संख्या नहीं । कौन जाए मृतक के पास और उनकी गणना करे । जैसे लोग नहीं मरें एक दर्जन संतरा या केला खरीद कर खा लिया । लोगों को भी फल की तरह दर्जन में नापा जाता है इस अश्वत्थामाकारिता में ।

पत्रकारिता को चौथा अंग माना जाता है पर यह चौथा अंग अंगद के पैर की तरह स्थिर है । पत्रकारिता चलायमान पेशा है पर इस में बंद दिमाग वाले ही काविज हैं इसी लिए नदी की पानी की तरह बह नहीं रहा । पोखर के पानी की तरह सड़ चुका है । पत्रकारिता में कोई नयापन नहीं रह गया है । न सीखने की चाह न करने की चाह । एक अनलाइन कोई समाचार बनाता है तो सब उसी को कपी, पेष्ट करने लगते हैं । उसमे गलती भी होगी इसको जानने, समझ्ने की दरकार भी किसी को नहीं है । कंस अश्वत्थामा मरा, हां मरा तो मरने दो उसको । आप चुपचाप अश्वत्थामा करते रहो ।

अभी नेपाल के प्रधानमंत्री कमरेड प्रचण्ड राजकीय भ्रमण के लिए पड़ोसी देश भारत जा रहे हैं । अब हम सभी को अश्वत्थामाकारिता का एक से एक नया नमूना देखने को मिलेगा । किसी पत्रिका, एफएम, टिभी, रेडियो या अनलाईन से किसी का भी समाचार या विचार नहीं मिलेगा । सब अपने ही मन से भूजा भूजने लगते हैं । सबको लगता है वही इस देश का तारणहार पत्रकार है । इसी लिए धृष्टधुम्न बन कर बिना जाने बुझे अपने कलम से गुरु द्रोण का वध कर देते हैं ।

इस अश्वत्थामाकारिता के चलते ही यहां के पत्रकार बंधू खुद को राजा युधिष्ठिर से कम नहीं समझते है । उनको लगता है जहां भी बिना टिकट के घुसना इन का जन्मसिद्ध अधिकार है । हर जगह इन को छूट चाहिए । पान की दूकान में भी यह औरों से ज्यादा चूने की माँग करते हैं । क्योंकि इन का स्वभाव भी दुसरों को चूना लगाने जैसा ही है । पत्रकार बनने का मतलब सब चीज फ्री मिलना । यदि फ्री न मिले तो धौंस दिखा कर, उस आदमी या संस्था की बदनामी कर समाचार लिख कर उस से बद्ला लेना या मजा चखवाना । यही है अश्वत्थामाकारिता करने वाले पत्रकार का धरम और करम ।

हर चीज में सुविधा चाहे वह बस या प्लेन यात्रा ही क्यों न हो । पत्रकार खुद को दूसरे ही ग्रह का प्राणी समझते है इसी लिए । पत्रकार सम्मेलन में देर से पहुंचेगें और आयोजक पर एहसान कर देते है छोटा सा समाचार लिख कर । हां यदि आयोजक ने उस पत्रकार सम्मेलन में अच्छे खाने, पीने की सुविधा और साथ में दक्षिणा भी रखा हो तो कहना ही क्या ? सोने मे सुगधं जैसा पत्रकार समय से पहले ही कार्यक्रम में पहुँच जाते है । ताज्जबु की बात यह है कि यहां बिन बुलाए मेहमान कि तरह अपरिचित व्यक्ति भी पत्रकार का बिल्ला लगा कर कार्यक्रम में पहुंच जाते हैं ।

थोथा चना बाजे घना की तरह जिस पत्रकार को अच्छी तरह से समाचार लिखना नहीं आता वही पत्रकार सम्मेलन में सबसे ज्यादा सवाल पूछता है । वह लोगों में भ्रम डालने में कामयाब हो जाता है कि वह बड़ा पत्रकार है पर अगले दिन की पत्रिका में उसी कार्यक्रम के बारे में छपे समाचार से उसकी कलई खुल जाती है । सत्य और तथ्य को मरोड़ना तो कोई पत्रकार से सीखे । यदि वह किसी आर्थिक पत्रिका का पत्रकार हुआ तो उस पत्रिका का बंटाधार ही हो जाता है । अरब और खरब रुपएं की गिनती न कर सकने वाले पत्रकार भी अरब को हटा कर खरब का समाचार ऐसे लिख देता है जैसे ५ सौ की नोट की जगह पर हजार का नोट रख दिया हो ।

पौने तीन करोड़ की आवादी वाले इस देश का पत्रकार जब समाचर लिखता है तो देश की जनसंख्या को करोड़ों का बना देता है । संख्या से पत्रकारों को लगाव है या दुश्मनी पता नहीं । पर यह अर्थ का अनर्थ जरुर बना देते हैं । एक खरब १२ अरब के फास्ट ट्रयाक के प्रोजेक्ट को जब पत्रकार समाचार बना कर लिखता है तब इस को खरबों रुपएं का प्रोजेक्ट बना देता है । आखिर उसका न उसके बाप का क्या जाता है । देश गरीब है तो क्या हुआ ? संख्या बताने और लिखने में कंजुसी क्यों करें ? बैंक से इन संख्याओं को लोन थोड़े ही लिया है जो लिखने और बतानें मे आलस करें ।

जो सत्य, तथ्य और संख्याओं का तोड़ मरोड़ न कर सके वह पत्रकार किस काम का ? अश्वत्थामाकारिता यही तो सिखाती है कि अंधे और बहरे बन कर वही लिखो जो कहा गया है । वास्तविकता क्या है वह सरकार जाने पत्रकार को इस से क्या मतलब ? वह तो हर दिन युद्ध की दुंदुभी बजने जैसा सुबह उठ्ता है काम पर जाता है । और हर दिन शंख की ध्वनि में किसी न किसी को अश्वत्थामा हतो हत कर के वलि का बकरा बनाता है और अपनी अश्वत्थामाकारिता की जिम्मेवारी पूरा कर देता है बस । हो गया पत्रकारिता के धर्म का काम तमाम । “अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता ।” व्यग्ंय

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