असमंजस में पुनर्निर्माण का दौर: बाबूराम पौड्याल

Baburam Paudel

बाबूराम पौड्याल

विनाशकारी भूकम्प के बाद एक बहुत गंभीर पीड़ा और अनिश्चित भविष्य की भारी दुविधा में माहभर से ज्यादा समय बीत चुका है । तकरीबन आठ हजार से अधिक लोग अब हमारे बीच नहीं रहे । जो भी हो समय बड़ा बलवान है और उसके तर्ज पर ही हमें चलना पड़ता है । बाकी समय बचे लोगों का है । जीने के लिए रोटी और रहने का बसेरा आवश्यक है । उसके लिए सरकार और हम सभी को अपने सहयोगी हाथों को आगे बढ़ाना है ।
बीतते समय के साथ अब बेघर लोगों की पुनरस्र्थापना और क्षतिग्रस्त भौतिक संरचनाओं का पुनर्निर्माण करने का जटिलताओं से भरा दौर शुरु हो गया है । तत्कालिक, मध्यकालिक और दीर्घकालिक स्तर में बडेÞ पैमाने पर पुनर्निर्माण और पुनरस्थापन का काम बाहरी सहयोग के बिना संभव नहीं है । अकेले पूरातत्व विभाग का कहना है कि सांस्कृतिक और धार्मिक मन्दिरों और भवनों का पुनरनिमार्ण अगर युद्धस्तर पर  किया गया तो भी दस साल लगेंगे । आंकडेÞ बताते हैं कि देश भर में भूकम्प ने ८ हजार ६ सौ ७६ लोगों की जाने ली है  और इक्कीस हजार से अधिक लोग जख्मी हो गये हैं । गृहमंत्रालय की प्रारम्भिक जानकारी में १ लाख ९० हजार ९ सौ चार घर पुरी तरह ढह गये  और १ लाख ७३ हजार ९ सौ तिरहत्तर घरों को आंशिक क्षति हुई है । लेकिन यह आंकड़ा और आगे जा सकता है चुकि दुरदराज इलाकों से क्षति की गणना बहुत देर से हो रही है । एक माह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अब तक बेघर हुये लोगों की पुरी संख्या यकीन नहीं हो सकी है ।For BabuRam Paudel (2) For BabuRam Paudel (3) For BabuRam Paudel (4) For BabuRam Paudel (1)
मौसम के जानकार कह रहे है कि अब मॉनसून शुरु होने ही वाला है और भूगर्भविद बारिश के बाद भारी भूस्खलन की चेतावनी दे रहे हैं । मई २४ तारीख को म्याग्दी जिले में कालीगण्डकी नदी पर पहाड़ के गिरने से नदी का बहाव १६ घंटे तक अवरुद्ध हो गया था और निचले तटीय क्षेत्र में बाढ़ का खतरा बढ़ गया था । परन्तु नदी जब अवरोध को पार कर अपने आप बहने लगी तो खतरा टल गया । भूगर्भविद् इस को भूकम्प के बाद की स्वभाविक घटना मानते हुये  इसे खतरे का दस्तक तक कह रहे है । उनके मुताबिक ऐसी ही और भी कई प्राकृतिक वारदातों की संभावना बरकरार है । पहाड़ों में भूकम्प से कई जगह जमीन पर दरारें पड़ गयी है । इससे असुरक्षित कई गांव को दुसरी जगह बसाने की आवश्यकता है । विगत पचास साल में जैसे भी हो बड़ी धनराशि और मेहनत खर्च कर सड़क, बिजली, पानी की आपुर्ति, बृज और सार्वजनिक संरचनाओं का जो विकास किया गया है उसे बचाने की गंभीर चूनौती है । अगर इन पूर्वाधारों का विनाश हो गया तो हमे और भी बड़ी कठिनाईयों का सामना करना पडेÞगा ।
अब निर्माण कार्य में भूकम्प प्रतिरोध के लिए भी काफी कुछ सर्तकता बरतने की आवश्यकता भी है । कुल मिलाकर जल्दीबाजी भी है काम भी करने की  बाध्यता भी हैं । जिसके लिए बड़ी धनराशि और तकनीकि की आवश्यकता है । नेपाल के पास इस आवश्यकता को पुरा करने के लिए दाताओं पर निर्भर होने के अलावा दूसरा चारा नहीं है । सरकार ने १३ जून तक भूकम्प से क्षतिग्रस्त स्कुलों, स्वास्थ्य संस्थाएं तथा अन्य सरकारी भौतिक संरचनाओ का अस्थाई निर्माण करने का संकल्प किया है । परन्तु इस प्रतिबद्धता को दीमक ना लगे अभी तो यही कहा जा सकता है ।
वैसे नेपाल को इस आपदा के घड़ी में हरतरह से सहयोग करने की प्रतिबद्धता जिस अन्दाज में दाताओं ने व्यक्त किया था उस हिसाब से प्रधानमंत्री राहत कोष में सहायता राशि जमा नहीं हो पा रही है । संयुक्त राष्ट्रसंघ के अपील पर भी दाताओं का अबतक कोई खास रेस्पोन्स न दिखाई देने को लेकर कुछ अट्कलें भी लगाई जा रही है । नेपाल सरकार क्षति और निर्माण के लिए आवश्यक धनराशि तथा कार्ययोजना अब तक तैयार नहीं कर पा रही है, यह इसलिए कि देश के सभी प्रभावित इलाकों से क्षति का विवरण प्राप्त नहीं हो सका है । पुनरवास और पुनर्निर्माण कार्य की प्रभावकारिता के लिए  सरकार द्वारा उच्चस्तरीय प्राधिकरण गठन करने पर विचार हो रहा है । इसके गठन से दाताओं को सहयोग करने में रास्ता साफ हो सकता है ।  सन् २००६ जनवरी २६ तारीख को भारत के गुजरात राज्य में आये शक्तिशाली भूकम्प से हूए विनाश के व्यवस्थित पुनर्निर्माण के लिए राज्य सरकार ने आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण (न्क्म्ःब्ण् का गठन किया गया था । गुजरात के अनुभव के आधार पर भी शायद नेपाल के सन्दर्भ में भी प्राधिकरण गठन पर चर्चे चल रहे है । परन्तु यह प्रयास भी सफल नहीं हो पाया । जल्दी ही शुरु होने जा रही मानसुन को देखते हुये बेघर लोगो को तात्कँलिक राहत के लिए भी संयुक्त राष्ट्रसंघ ने बार–बार दाताओं से गूहार लगाई है । उसके मुताबिक इन लोगों के लिए ४ सौ २३ मीलियन अमरीकी डालर की आवश्यकता है, जिसमें अबतक केवल १५ फीसद धनराशि ही दाताओं की ओर से मिली है । जो आवश्यकता से बहुत ही कम है । विनाशकारी भूकम्प से पीडि़त देश हैटी के राहत और पुनस्र्थापन के संदर्भ में भी दाताओं ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की अपील को दाताओं ने अहमियत नहीं दी थी और अब नेपाल के संदर्भ में भी यही सब हो रहा है ।
नेपाल में वैदेशिक सहायता के जानिफकारों का कहना है कि ऐसी सहायता खुद तो बहुत सकारात्मक आवरण में आती ही है साथ में मकसद और उसे अंजाम देने के लिए एक नेटवर्क भी साथ ले आती है । इतना ही नहीं सहायता के साथ–साथ वे अपनी ओर से सलाहकारों और निरीक्षकों की टीम और उसके लिए डालर में तनख्वाह और एलाउन्स की व्यवस्था उसी सहायता राशि से ही खर्चा किया जाता है । नेपाल में संभवतः सन् १९५१ में संस्थागत रूप से मलेरिया के मच्छरों के पीठ पर बैठकर वैदेशिक सहायता का पदार्पण हूआ । मलेरिया उन्मुलन से शुरु यह सफर स्वास्थ्य, सड़क, उद्योग, कृषि जैसे तमाम अन्य क्षेत्रों तक जा पहुंची है । वैसे यह कहना विल्कुल सही नहीं होगा कि वैदेशिक सहायता ने नेपाल के विकास में योगदान ही नहीं दिया परन्तु यह बात भी उतनी ही सत्य है कि इस क्षेत्र में बातें ज्यादा और काम बहुत कम हुईं है । वैदेशिक सहायता ने नेपाल में एनजीओ—जिवी एक प्रभावकारी वर्ग और संस्कृति को जन्म दिया है । यह वर्ग भी वैदेशिक सहायता को सरकारी तजबिज के बाहर ही रहकर लक्षितवर्ग के बीच काम करने का सख्त तरफदार है । यह इसलिए कि सरकारी प्रबन्धन के नीचे काम करने की अपेक्षा दाताओं के तहत काम करना आर्थिक रूप से  कई गुना ज्यादा फायदेमन्द होता है । दाताओं ने भी सरकारी व संयुक्त राष्ट्रसंघ जैसे अन्य संस्थाओं के झण्डे के तले सहयोग करने की वजाय लोकप्रियता के हिसाब से खुद को संलग्न करना ही उचित समझा है । दाताओं और स्थानीय एनजीओ वर्गीय लोगों के स्वार्थ का मिलन इसी विन्दु पर होता है । हमारे जैसे गरीब देशों में भ्रष्टाचार और खराब(शासन का दोष दिखाकर दाता अक्सर हावी हो जाते हैं । संयुक्त राष्ट्रसंघ नेपाल की विपदा पर दाताओं का संम्मेलन आयोजन करना चाहता था परन्तु उसे सफलता हाथ नहीं लगी । अब आकर नेपाल सरकार के द्वारा जून २५ तारीख को काठमाण्डो में सम्मेलन का आयोजन करने की तैयारी शुरु की गयी है । सरकार की भी भीतरी मंशा यह है कि वह विपद में आन्तरिक और वाह्य सभी वित्तीय श्रोतों  का परिचालन खुद करें और इसका यश उसे भी मिले । सबसे मजे की बात है, उदार अर्थनीति के हिमायती रहे वर्तमान अर्थमन्त्री डा. रामशरण महत नेपाल के सन्दर्भ में खुला बाजार और निजीकरण जैसे नीतियों के व्यवहारिक प्रणेता भी कहे जा सकते है । इसबार वे वैदेशिक सहायता को भी सरकारी दरवाजे से खर्च करने के लिए दाताओं के बीच लबिङ करने का प्रयास कर रहे है । वैसे उनको भ्रष्टाचार, कुशासन, और दण्डहीनता और स्थानीय निर्वाचित जनप्रतिनिधिमूलक संस्थाओ के ना होने की स्थिति में दाताओं को लक्षितवर्ग तक सहयोग पहूंचने का विश्वास दिलाने में काफी मसक्कत करनी होगी । देखना यह है कि नेपाल किस कदर पुनरवास और पुननिर्माण के किन किन योजनाओं के लिए ऋण, सहूलियत ऋण और अनुदान सहयोग प्राप्त कर पायेगा ।
हैटी में १२ जनवरी २०१० को ७ मेग्नेच्युट का विनाशकारी भूकम्प आया । भूकम्प के वाद राहत, नष्ट संरचनाओं का निर्माण और लोगों को शिविरों से अपने सामान्य जीवन में लौटाने के लिए विदेशों से आई सहायता राशि का प्रभाव हैटी के संदर्भ में खास   संतोषजनक नहीं रहा । वहां पांच साल तक इन महत्वपूर्ण कामों को अभी तक अंजाम नहीं दिया जा सका है । अधिकांश लोग अब विदेशी सहायता से चल रहे शिविरों में ही रह रहे है । यह उनकी बाध्यता से कहीं अधिक पसन्दीदा और सहज काम हो चला है । अधिकांश कृषियोग्य जमीन पर अब भी खेती नहीं की जा रही है । यही स्थिति अन्य क्षेत्र में भी कमोबेश दिखाई दे रही है । हैटी को भूकम्प ने जो तबाही दी है उसके अनुपात में, बाद में वैदेशिक सहायता के छांव में पनप रही संस्कृति ने कम नूकसान नहीं किया है । आशा की जा सकती थी कि अगर वहां की सरकार वैदेशिक सहयोग को खुद ही संयोजन करने में सक्षम हो पाती तो स्थानीय बूनियाद से ही निर्माण और पुनरवास का काम आगे बढ़ पाता । इसके लिए सरकार के उपर विश्वास करने की स्थिति का होना आवश्यक था जो वहां नहीं था । नेपाल के सन्दर्भ में भी कई विश्लेशकों ने हैटी का उल्लेख किया है ।
पुनर्निर्माण और पुनर्वास के क्षेत्र में नेपाल के दो पड़ोसी  देश चीन और भारत दोनों का काफी अच्छा अनूभव है । मई १२ तारीख २००८ को चीन के वेजुवान में ८ मेग्नेच्युट के शक्तिशाली भूकम्प ने बडेÞ पैमाने में विनाश किया । सरकार ने तत्काल ही उद्धार राहत और निर्माण का काम एक साथ आगे बढ़ाया  और इस कार्य में निजी क्षेत्र को भी कुशलता से परिचालन किया गया । प्रान्तीय सरकार और सिभिल सोसाईटीज को भी महत्वपूर्ण भुमिका दी गयी । कुल मिलाकर पुनरवास और पुनर्निर्माण के क्षेत्र में ४१ हजार ज्ञ सौ घण् परियोजनाओं को शुरु किया गया । और काम के प्रति प्रतिबद्धता  इतनी थी कि उन परियोजनाओं में ९९ फीसद को दो साल के अन्दर ही पुरा किया गया । भूकम्प प्रभावित क्षेत्र में सार्वजनिक सेवा के साथ अस्पताल, स्कुल, सेनिटेशन, वृद्धाश्रम और ग्रामीण केन्द्र के साथ सूविधा सम्पन्न और भूकम्प प्रतिरोधी पुनरवास को सम्पन्न किया गया । सच पुछा जाये तो विनाश ने नंई विकास और सभ्यता का द्वार खोल दिया ।
जनवरी २६ तारीख, २००१ को भारत के गुजरात राज्य में ७.७ मेग्नेच्युट के शक्तिशाली भूकम्प ने बड़ी तबाही मचा दी ।      इस प्राकृतिक विपदा में १९ हजार से अधिक लोगाें  ने जानें गवायी, १६ हजार ६ सौ लोग घायल हो गए और ६ लाख लोग प्रभावित हुये । राज्य सरकार ने प्राधिकरण के जरिये राहत और पुनर्निर्माण को आगे बढ़ाया । तीन लाख प्रभावित लोगों को बसाने के लिए १ विलियन डलर के चार पैकेज कार्यक्रमों की घोषणा की गयी । गुजरात सरकार ने एडीबी का सहयोग लेकर गुजरात ईमर्जेन्सी अर्थक्वीक रिकन्सट्रक्शन प्रोजेक्ट ( न्भ्भ्च्ए)  शुरु किया और सभी प्रभावित घरों को दो साल के अन्दर ही मरम्मत कराया गया । विश्व बैंक, एशियाई बैक, युरोपियन युनियन, म्ँक्ष्म्, ग्क्ब्क्ष्म्, ऋत्म्ब् जैसे विदेशी संस्थाओं से वित्तिय सहयोग लिया गया । देश के बडेÞ उद्योगियों ने भी पुनरनिर्माण कार्य में सरकार को सहयोग दिया । संयुक्त राष्ट्रसंघ ने स्थानीय लोगों के बीच संजाल बनाकर पुनरनिमार्ण को आगे बढ़ाया । वहां  वैदेशिक सहायता से हैटी में आई विकृतियों को लेकरं नेपाल मे जिस तरह का संदेह किया जा रहा है वैसी कोई खास समस्या गुजरात में नहीं दिखाई दिया । क्योंकि सरकार की प्रभावकारिता और विश्वसनीयता पर कहीं से भी संदेह नहीं था । निर्माण को भूकम्प प्रतिरोधी बनाने के लिएं कड़ी निरीक्षण व्यवस्था शुरु की गयी । इस तरह भूकम्प के बाद का निर्माण और लोगों का जीवन पहले से बिल्कुल भिन्न और उन्नत बन गया ।
चीन और भारत नेपाल की इस दुःखद घड़ी में हर संभव सहयोग करने का वचन दे रहे हैं । नेपाल के लोगों में विपदा के समय एक आपस में सहयोग करने की प्रवृति है वह इसबार भी देखने को मिला है । बस उनके पास प्रविधि और धनराशि का अभाव है । यहीं पर सरकार की सक्रियता अपेक्षित हो जाती है ।
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