असमंजस में मधेशी मोर्चा

मधेशी मोर्चा की स्थिति इस समय सांप-छुछुंदर वाली हो गई है। ना तो उसे माओवादी को छोडÞते बन रहा है और ना ही उसके साथ अधिक दिनों तक वो सटे ही रहना चाहती है। मधेशी मोर्चा के नेता चाहे लाख दलीलें दें कि माओवादी परिवर्तनकारी शक्ति है और संघीयता तथा मधेश के मुद्दे पर अधिक कारगर है लेकिन मधेशी जनता को उनका यह तर्क गले नहीं उतर रहा है। मधेश आन्दोलन केन्द्रीकृत सत्ता के खिलाफ था तो उसमें माओवादी के खिलाफ भी था। मधेश आन्दोलन की मांग को दरकिनार करते हुए सिर्फसत्ता में

madheshi morcha

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टिके रहने की मधेशी नेताओं की चाहत मधेशी जनता अच्छी तरह से जान गई है। अधिकांश मधेशी जनता इस समय के सभी मधेशी दलों को सत्ता के लालच में माओवादी के साथ टिके रहने की बात कहते हैं। खुद मोर्चा के दूसरे तबके के नेता इस बात के खिलाफ हैं कि मोर्चा को बिना किसी मधेशी मुद्दे के फायदे के सरकार में टिके रहना चाहिए। लेकिन मधेशी मोर्चा की व्यक्तिगत लाभ कमाने की चाहत, सत्ता के दम पर पार्टर्ीीो मजबूत बनाए रखने की गलत सोच और सत्ता तथा पैसे के लोभ में अपने संगठन का विस्तार कर पाने की गलत प्रवृत्ति पाल बैठे मधेशी मोर्चा माओवादी की चाटुकारिता में पीछे नहीं हटना चाहती है।
सत्ता में बने रहना मधेशी मोर्चा की जरूरी और मजबूरी दोनों ही है। कांग्रेस-एमाले कभी भी उन्हें इतने महत्वपर्ूण्ा मंत्रालय और इतनी बडी संख्या में मंत्री पद नहीं देने वाले हैं। लेकिन क्या सिर्फइसलिए माओवादी के साथ सत्ता में बने रहना ठीक है जबकि सत्ता में जाने के लिए मधेशी मुद्दों को साकार करने हेतु किए गए एक भी वायदे को अब तक पूरा नहीं किया गया। ना तो नागरिकता का समस्या ही समाधान हो पाया और ना ही नेपाली सेना में मधेशी समुदाय का सामूहिक प्रवेश ही हो पाया। समावेशी विधेयक का अध्यादेश राष्ट्रपति के पास लटक गया है लेकिन जिस तरीके से र्सवाेच्च का रवैया है, उसे इसके भी अटकने की पूरी संभावना है। इन बातों से मधेशी मोर्चा के नेता हमेशा ही बचते रहे हैं। लेकिन चुनाव जब भी हो, उन्हें इस बात का जबाब मधेशी जनता को देना ही होगा।
इसी बीच में सत्ता के लिए मधेशी दलों में आए दर्जनों विभाजन से भी मधेशी जनता आहत है। यह समय मोर्चा के लिए भी एक सुनहरा अवसर है। संविधान सभा से संविधान निर्माण ना तो कांग्रेस और ना एमाले की प्राथमिकता है। माओवादी का अपना खुद का संविधान है और सत्ता पर कब्जा करने के बाद उसे लागू कर सकती है लेकिन आम मधेशी जनता की इच्छा और आकांक्षा है कि संविधान सभा से संविधान का निर्माण हो। देश में संघीयता आए और मधेशी जनता को भी वह सम्मान और अधिकार मिले, जिसके लिए मधेशी जनता ने इतनी बडÞी कुरबानियां दी है। संविधान सभा चुनाव के लिए मधेशी मोर्चा को कठोर निर्ण्र्ाालेने की आवश्यकता है। माओवादी पर दबाब बढÞाकर संविधान सभा चुनाव को सुनिश्चित बनाने की सबसे अधिक जिम्मेवारी मधेशी मोर्चा की ही है। इसलिए चाहे सत्ता से अलग होकर भी हो मधेशी मोर्चा को यह कदम उठाना चाहिए। नहीं तो जिस तरीके से माओवादी आगे बढÞ रही है और उनकी सत्ता कब्जा की जो रणनीति है, उसमें उन का पद अधिक दिनों तक सुरक्षित नहीं हो सकता है। आज नहीं तो कल कुछ मधेशी मंत्रियों का पद खतरे में दिखाई देने लगा है। इसलिए मधेशी मोर्चा सत्ता का स्वार्थ त्यागकर चुनाव को प्राथमिकता बनाए। अन्यथा देश को आन्तरिक द्वंद्व की आग में झोंकने से कोई नहीं बचा सकता है।

द्वन्द्व की आग में तपता देश

द्वंद्व के कारक राष्ट्रपति

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