असमंजस में मधेश की जनता

कैलास दास:राजनीतिक समस्या राजनीतिक सूझ-बूझ से ही समाधान हो सकता है, हिंसक रूप धारण करना इसका समाधान नहीं है। अगर राजनीतिक गतिविधि को हिंसक बना लें तो इसे लर्डाई नहीं द्वन्द्व कहा जाएगा।
आज मधेश के नाम पर दो प्रकार की राजनीति हो रही है। एक जो सरकार में सहभागी थे और हैं वे लोग कर रहे हैं। खुलकर राजनीति करने वालो में मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल, फोरम लोकतान्त्रिक, लोकतान्त्रिक नेपाल, मधेश समाजवादी पार्टर्ीीैं। इन सभी पार्टियो का जन्म मधेश आन्दोलन से और उसके वाद ही हुआ है। और ये सभी पार्टियां स्वायत्त मधेश एक प्रदेश माँग को लेकर राजनीति की रोटी सेक रही थी। एक(एक करके सभी दल के नेता राज्य मन्त्री से लेकर मन्त्री तक रह चुके हैं। उस समय सरकार की जो नीति बनती थी, उसी नीति में बसहा बैल की तरह ये सभी नेतागण चलते रहे। और जब ये लोग सरकार से बाहर हुए, तो मधेशी जनता के बीच फिर ‘मधेश-मधेश’ कहकर फुफकारने लगे। फिलहाल कहा जाए तो मधेश के मुद्दों पर कितनी पार्टिया बनी हैं, इसका अन्दाजा लगाना आम जनता के लिए कठिन है।

madheshi-janta_hindi-magazine

असमंजस में मधेश की जनता

राजनीति करने वालों में दूसरे नम्बर पर वे लोग हैं जो कि भूमिगत होकर हिंसक राजनीति कर रहे हंै। उनका भी नाम गिन्ती करना बहुत मुश्किल है। सबों ने अपने(अपने नाम पर ही पार्टर्ीीोल रखी है। ज्वाला सिंह, गोइत, राजनमुक्ति, बिष्फोट, नागराज, छोटे राजन, मुकेश चौधरी, तूफान सिंह आदि(इत्यादि हैं। इनमें से कुछेक का रिकर्ड तो सरकार की फाइल में भी नहीं है और चुनाव घोषणा के बाद कई और नाम भी दैनिक रूप में मधेश के जिलो में सुनने में आ रहे हैं।
अगर आप राष्ट्रीय राजनीति करते हैं तो केवल मधेश का मुद्दा ही आपका लक्ष्य नहीं हो सकता। आपको नेपाल की समस्या कैसे हल हो यह बहस भी करना ही होगा। राष्ट्रीय राजनीति के लिए मधेश के मुद्दे को एक बिन्दु बनाकर केन्द्रित होना मधेशी जनता को धोखे में रखना ही कहा जायेगा। अगर सिर्फमधेश में राजनीति करना चाहते हैं तो आपका लक्ष्य मधेश की माँगे कैसे पूरी की जा सकती हैं केवल उसको ही केन्द्रविन्दु बनाना होगा।
अभी देश भर के राजनीतिक दलों की निगाहें मधेश के मुद्दों पर ज्यादा दिख रही हैं। मजिंल एक होते हुए भी मधेश के राजनीतिक दल इतने सारे टुकडÞो में विभाजित हो चुके हैं कि मधेश की जनता ही असमंजस में दिखाइ देती है। वे किस दल का चयन करें – चुनाव नजदीक है। परन्तु मधेशी दलों के कार्यकर्ताओ के बीच खिंचातानी जारी है। अगर मधेश के नेता और दल मधेश के मुद्दे को स्वीकार करके संगठित नहीं हुए तो इसका फायदा स्पष्ट रूपसे एकीकृत नेकपा माओवादी को मिल सकता है।
मधेश में दूसरी शक्ति के रूप में भूमिगत होकर हिंसक कार्य करने वाले लोग भी हैं। इनका दावा है कि ये मधेश के हित में सशस्त्र आन्दोलन ही एक मात्र उपाय है। सही मायने में कहा जाए तो जिन पर मधेशी जनता ने विश्वास किया था, आज वही सबसे बडÞा अविश्वास का पात्र बन गया है।  इसके बारे में ज्यादा कुछ लिखना आवश्यक नहीं है। परन्तु गौर करने की बात यह है कि अगर सबका लक्ष्य एक है तो जो लडर्Þाई सरकार से लडÞनी चाहिए वह किसी व्यक्ति, व्यापारी तथा मधेशी नेताओं के खिलाफ क्यों लडÞी जा रही है – भूमिगत संगठन के नेतृत्वकर्ताओं के सामने एक बडÞा सवाल पैदा हो रहा है कि अगर वे मधेश हित की लडर्Þाई भूमिगत होकर लडÞ रहे हैं तो आज मधेशी जनता ही उनसे कोसों दूर क्यों भाग खडÞी है। क्या आपकी लडर्Þाई राजनीतिक नहीं होकर व्यक्तिगत स्वार्थ की लडर्Þाई तो नहीं है – जब मधेश आन्दोलन हुआ था तो बहुत सारे घायल हुए थे। उन सभी को उपचार के लिए मधेशी जनता ने स्वयं चन्दा वसूल कर उपचार में सहयोग किया था। अगर आप भी मधेश हित के लिए लडÞ रहे हैं तो मधेशी से ही बम, बारूद और गोलियों की धम्की देकर फिरौती क्यों माँगते है – अपने ही भाई बन्धुओं के बीच हिंसक राजनीति करने की क्या जरूरत है –
मधेश आन्दोलन से उब्जे राजनीतिक दल और भूमिगत समूह से जनता परेशान हो चुकी है। आज मधेश हत्या-हिंसा, फिरौती, धाक(धम्की जैसी समस्याओं से ग्रस्त है। व्यापार, कलकारखाना, पर्यटन यहाँ से समाप्त हो चुका है।  मधेश की भूमि को रक्त की नहीं, प्यार और विकास की जरूरत है। वैसे तो हिंसक वातावरण केवल इन दलों से ही बनी है, ऐसी बात नहीं है। इसके लिए राज्य और सरकार भी दोषी है। लेकिन मधेशी जनता के बीच बदनामी सिर्फइन लोगों की हो रही है। मधेश में रहने वाले सभी अपने भाई-बन्धु है, चाहे वे पहाडी मूल के हो वा मधेशी मुल के। मुस्लिम, दलित, पिछडा वर्ग हम सभी एक हैं। अधिकार की लर्डाई किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, राज्य से लडÞी जा सकती है। इसके लिए मधेश में रहने वाले सभी का सहयोग आवश्यक है। आज दोनो पक्ष मधेश के लिए कमजोर सावित हो रहा है। यह जगजाहिर है कि इसका फायदा कुछ बडÞे दलो को ही मिल सकता है।
फिलहाल संविधान सभा का निर्वाचन अगहन ४ गते को तय है। यही वजह है कि अभी बडेÞÞ-बडे राजनेताओं की निगाहे मधेश पर अटकी हर्ुइ है। मधेश के जिलों में पार्टर्ीी्रवेश तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम धडÞल्ले से चल रहा है। केन्द्रीय नेताओं का मधेश मोह इतना बढÞ गया है कि अभी वे मधेश को एक पल भी नहीं छोडÞना चाहते हैं। वे मधेश में धूल खाकर भी किसी भी रास्ते पर चलने को तैयार हैं। जिस गाँव में सडÞक नहीं है वहाँ बैलगाडी से, जहाँ नदी है, वहाँ नाव से, जहाँ कीचडÞ है वहा पैदल चलने के लिए भी तैयार हैं। कुछ दिन पहले नेपाली काँग्रेस के सभापति सुशील कोइराला बैलगाडी पर चढÞकर धनुषा जिला के एक गाव के कार्यक्रम में सहभागी हुए थे। उसी तरह एकीकृत नेकपा माओवादी का अध्यक्ष पुष्पकमल दहाल -प्रचण्ड) पैदल चलकर गंतव्य स्थल तक पहुँचे थे। इन्होंने कर्ुता पैजामा पहन रखा था। नेकपा एमाले के वरिष्ठ नेता माधव कुमार नेपाल भी एक उद्घाटन समारोह में आधा घण्टा पैदल चलकर पहुँचे थे। भाषण की बात करें तो सब कहते हैं धनुषा भूमि हमारी राजनीतिक भूमि हैं। हतियार चलाना ही नहीं राजनीतिक गुरू भी यहीं के हैं। यह तो बडÞी पार्टियों की बात हर्ुइ।
अब मधेशवादी दलों की बात करें तो स्पष्ट शब्दों में ये कहते हैं कि मधेश तो हमारा घर(आँगन है। हम-आपके भाई-भतीजे हैं। हम आपस में जितने भी लडÞ लें लेकिन चुनाव आने पर भोट हमें ही दें। उनका कहना है कि वषर्ांे से किसी दल ने मधेश के लिए कुछ नहीं किया है। अभी तक जो कुछ भी किया गया है वह सब मधेशी दलों ने ही किया है। अर्थात् राजनीतिक दल इस तरह अस्थिर हो चुके हैं कि जनता भी बहुत ही असमंजस में है।
मधेश में राजनीतिक लहर किस दल वा नेता की है, यह कहना अभी मुश्किल है। जो पहले नेकपा एमाले में था, वह अभी एमाओवादी बन गया है, जो काँग्रेस में था, वह एमाले बन गया है। उसी तरह मधेशवादी दलो में भी एक-आपस में भगदडÞ मची हर्ुइ है। सभी दल, व्यक्ति को अपने दल में खींचने में लगे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि सभी अपना अपना दल वा व्यक्तिगत विकास के लिए ही मधेश में भागदौडÞ मचायें हुयें हैं। यही समस्या है कि आज जनता किस दल को भोट दे असमन्जस में है। िि

ि

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz