असल की तरह चले कृत्रिम पैर

अमेरिका की वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी ने एडवांस कंप्यूटर, सेंसर्स, इलेक्ट्रिक मोटर्स और अत्याधुनिक बैटरी से एक ऐसा बायोनिक पैर तैयार किया है, जो परंपरागत कृत्रिम पैर की तुलना में कहीं वास्तविक तरीके से विभिन्न क्रियाओं को अंजाम देता है।

कई मामलों में अनूठा

यह पहला प्रॉस्थेटिक पैर है जिसकी मोटर संचालित ऐड़ी और घुटने एक साथ क्रियाओं को अंजाम देते हैं। इसमें ऐसे सेंसर्स लगे हैं, जो यूजर के एक्शन को मॉनीटर करते हैं। इसे इस तरह बनाया गया है कि कंप्यूटर मॉनीटर के जरिए दर्ज डाटा से जान जाता है कि यूजर अब क्या कदम उठाने वाला है। इसकी मदद से वह पैर की गतिविधि को अंजाम देता है। इस लिहाज से यह कृत्रिम पैर से बेहद अलग है।

घसीटना नहीं पड़ता

फिलहाल इस्तेमाल में लाए जा रहे कृत्रिम पैर दूसरे की तुलना में एक कदम पीछे रहते हैं। यानी उन्हें लगभग घसीट कर आगे बढ़ाना पड़ता है, लेकिन यह बायोनिक पैर दूसरे पैर के सापेक्ष ही उठता और जमीन पर आता है। इसमें दूसरे सामान्य पैर की तुलना में महज नैनोसेकंड का अंतर आता है। इसे तैयार करने में माइकल गोल्डफार्ब की सात वर्षो की रिसर्च लगी है। माइकल के मुताबिक यह बायोनिक पैर मानव और मशीन के संयोजन में उठा पहला सफल कदम है।

ढेरों काम देता है अंजाम

इस बायोनिक पैर को रोजमर्रा की जिंदगी के लिहाज से डिजाइन किया गया है। इसकी मदद से कृत्रिम पैर लगाने वाला शख्स कहीं आसानी से चल सकता है, सीढ़ियां चढ़-उतर सकता है और आसानी से पैर मोड़ कर भी बैठ सकता है। यह सामान्य सतह पर 25 फीसदी अधिक रफ्तार से सफर तय कर सकता है। कृत्रिम पैर लगाकर चलने-फिरने वालों को सबसे ज्यादा दिक्कत चढ़ाई या ढलान पर आती है, लेकिन इसकी मदद से यह समस्या भी दूर हो गई है।

असल पैर से हल्का

तकनीकी क्षेत्र में हुए हालिया विकास की मदद से इंजीनियरों को बायोनिक पैर के रूप में एक ऐसा डिवाइस बनाने में मदद की, जो वजन में असल पैर से हल्का है। लगभग 9 पौंड भार के इस कृत्रिम पैर की बैटरी एक बार पूरी तरह चार्ज हो जाने के बाद 13 से 14 किलोमीटर का सफर तय करने में सक्षम है। यही नहीं, पदचालन के दौरान इनसे आवाज भी कम निकलती है।

पावर्ड घुटने और ऐड़ी से उबड़-खाबड़ सतह पर यह संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। सतह के आधार पर इसमें लगे सेंसर यूजर के लड़खड़ा जाने की आशंका पहले ही भांप लेते हैं और पैर सतह पर इस तरह टिकता है कि व्यक्ति गिरे नहीं और उसका संतुलन बरकरार रहे।

गजब का कंट्रोल सिस्टम

इस पैर को बनाने में सबसे बड़ी चुनौती कंट्रोल सिस्टम रहा। इसमें कंट्रोलर न सिर्फ एक साथ कई गतिविधियों को अंजाम देता है, बल्कि वह प्राप्त डाटा से निकलने वाले निष्कर्षो को लेकर भ्रमित भी नहीं होता।

आगे क्या

इसकी सफलता से उत्साहित वैज्ञानिक अब प्रॉस्थेटिक हाथ और लकवा ग्रस्त या रीढ़ की हड्डी की चोट से हिलने-डुलने में अक्षम लोगों के लिए कंप्यूटरीकृत ढांचा बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

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