असहमति की राजनीति के अर्थ/अनर्थ:कुमार सच्चिदानन्द

‘कही न जाई क्या कहिए’ की शर्मनाक अवस्था से गुजरती हर्ुइ नेपाली राजनीति सहमति और असहमति के द्वन्द्व में फँसी है और उसके सामने देश का राजनैतिक भविष्य प्रश्न-चिहृन बनकर खड है। यह सच है कि आज हम जिस युग में साँस ले रहे हैं, उसमें दीवार पर फडÞफडÞाते कैलेण्डरों का महत्त्व घटा है जिस पर कभी देवी-देवताओं का,

असहमति की राजनीति के अर्थ/अनर्थ

राष्ट्रीय नेताओं का राज हुआ करता था। आज जो थोड-बहुत कैलेण्डर दीवार पर परिंदों की तरह पंख मारते दिखलाई देते हैं, उन में मानवीय चरित्रों में अभिनेत्रियों और खेलाडिÞयों का बोलबाला अधिक है और यह स्वाभाविक भी है क्यिोंकि इन में कुछ बातें ऐसी होती हैं, जो लोगों को आकषिर्त करती हैं। इन कैलेण्डरों से सबसे अधिक गुमशुदा हुए हैं तो नेतागण क्योंकि नैतिक मूल्यों का र्सवाधिक अवमूल्यन इसी क्षेत्र में देखा जा रहा है। कारण, राजनीति का अर्थ उनके लिए सत्ता है और सत्ता की चाभी पार्टर्ीीै। इसलिए आज जितने भी नेता हैं,  व्ो पार्टर्ीीे नेता हैं, कार्यकर्ता के नेता हैं (जनता के नहीं, इसलिए राष्ट्र के भी नहीं। यही कारण है कि सहमति की बात करते-करते देश ने संविधान बनाने का अवसर भी गुमाया, संविधानसभा भी गुमाया और विकास की दृष्टि से देश वर्तमान भी लहूलुहान हुआ। मगर संतोष अभी भी नहीं क्योंकि सहमति का राग आलाप कर चरम असहमति की ओर देश का नेतृत्व अग्रसर है। इन परिस्थितियों में विचार का एक विन्दु यह भी हो सकता है कि क्या असहमति से ही देश की राजनैतिक अनिश्चितता दूर हो सकती है –
आज नेपाली राजनीति में जो अन्तर्विरोध, अर्न्तर्द्वन्द्व और अन्तर्घर्ाादेखा जा रहा है उसका मूल कारण है कि हमारी राजनीति एक तरह से स्वयं को बन्धनहीन समझती है इसलिए अपनी सर्वोपरिता का दंभ भरती है और समस्याओं का संवैधानिक नहीं, राजनैतिक समाधान ढूँढने में विश्वास करती है। उसकी यही प्रवृत्ति आज चरम असहमति के केन्द्र में है। यह माना जा सकता है कि किसी देश के नेताओं में राजनैतिक संस्कार विकसित करने में उस देश का राजनैतिक इतिहास भी महत्त्वपर्ूण्ा होता है। विगत ६०-७० वर्षो में नेपाल में जितनी बार राजनैतिक संर्घष्ा हुआ है और इसके परिणामस्वरूप व्यवस्था परिवर्तन हुआ है, प्रायः हर बार राजनैतिक निर्ण्र्ाासे देश को दिशा मिली है। हमारी राजनीति और राजनेता आज भी इन्हीं राजनैतिक संस्कारों के वाहक या पोषक हैं, इसलिए समस्याओं का वैधानिक, संवैधानिक समाधान नहीं, राजनैतिक समाधान चाहते हैं और इसी धुँधलके में अपनी व्यक्तिगत और दलगत हितों की साधना करना चाहते हैं। उनकी इन्हीं प्रवृत्तियों के कारण विघटित संविधानसभा ने अपने छोटे से जीवनकाल में चार-चार सरकारें देखी है, अपने ही दल द्वारा अपने ही दल की सरकार को गिराते देखा है। आज स्थिति बदल चुकी है। संविधान सभा विघटित है, देश संविधानहीन है। लेकिन समस्या का लोकतांत्रिक समाधान की राह छोडÞ राजनैतिक समाधान की दिशा तलाशी जा रही है।
संविधानसभा के विघटन के बाद राजनैतिक वृत्त में र्सवाधिक चर्चा में रहा राष्ट्रपतिभवन, जहाँ से नित्य नवीन फरमान निरन्तर जारी होते रहे। इनकी विज्ञप्तियों से जहाँ सत्ता पक्ष हतोत्साहित होता रहा, वहाँ विपक्ष को उत्साह की तावीज मिली और मौजूदा सरकार से त्राण दिलाने या दूसरे शब्दों में अपनी महत्वाकांक्षा को साधने के दृष्टिकोण से विपक्षियों की निगाहें राष्ट्रपति भवन की ओर उठने लगी और एक तरह से यह उन्हें अपने हितों का संरक्षक दिखलाई देने लगा। परिणाम स्पष्ट था(इस संवैधानिक और आलंकारिक संस्था का राजनीतिकरण होता गया और हालात उलझते गए। यद्यपि सहमति के सूत्र में सत्ता और विपक्ष को बाँध कर देश को नवीन दिशा देने की उनकी रणनीति थी, जो विपक्ष की चरम वर्जना के कारण वह कामयाब नहीं हो सकी और कहीं न कहीं इस संस्था पर भी दल विशेष के हितों के संरक्षक होने का आरोप लगा। दलों के बीच सहमति का वातावरण न बनता देख इसकी आडÞ में सत्ता हस्तगत करने का आरोप भी इस संस्था पर लगा, जिसने इन्हें विवादों में खींचा। एक बात तो सच है कि जब तक संविधानसभा थी तब तक दलों को अपना-अपना राग आलापने की स्वतंत्रता थी लेकिन इसके विघटन के बाद  अराजनैतिक या संवैधानिक संस्था का कोई भी कदम किसी दल विशेष के हित या अहित में जाता है तो वहाँ विवाद की स्थिति तो पैदा हो ही सकती है। इस तथ्य से भी वाकिफ होना चाहिए कि कभी-कभी जब प्रयास सफल नहीं होते तो यथास्थितिवाद भी समाधान को खींच लाता है। जिस दिन यहाँ सक्रिय राजनैतिक व्यक्तित्वों को यह एहसास हो जाएगा कि जो हालात है वह वर्तमान की नीयति है और यहीं से उन्हें समाधान ढूँढना होगा, वहीं से समस्या के निदान की दिशा में हमारे कदम बढÞ चलेंगे।
नेपाली राजनीति में पिछले दिनों चर्चा के केन्द्र में रहे काँग्रेस सभापति श्री सुशील कोईराला। वैसे भी प्रमुख प्रतिपक्ष के नेता होने कारण चर्चा में उनका रहना लाजिमी था मगर नेपाली राजनीति में असहमति का जो चरमोत्कर्षदेखा जा रहा है उसका प्रमुख आलम्बन श्री कोईराला ही हैं। मौजूदा सरकार के विरोध में आज लगभग सम्पर्ूण्ा विपक्ष और उनके विरोध की आवाज उनके माध्यम से मुखर हो रही है। यह सच है कि लोकतंत्र में विपक्ष महत्त्वपर्ूण्ा होता है लेकिन उससे रचनात्मक सहयोग की अपेक्षा की जाती है। संविधानसभा के विघटन के बाद देश में आए संवैधानिक समस्या के समाधान की दिशा में रचनात्मक विपक्ष की भूमिका छोडÞ सत्ताकेन्द्रित राजनीति के प्रमृख पात्र के रूप में श्री कोईराला उभरे और एक तरह से एमाले के द्वारा भी वे प्रयोग हुए। उनका विरोध कुछ हद तक तब तक औचित्यपर्ूण्ा भी माना जाता जब तक वे विपक्ष के नेता के रूप में उनकी आवाज उठाते लेकिन प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पार्टर्ीीारा उनके नाम के निर्ण्र्ााके बाद उनका राजनैतिक कद थोडÞा घटा जरूर है। आज उनके पीछे एमाले जैसी पार्टर्ीीडÞी है, लेकिन उनका र्समर्थन उनके लिए जितना विधायी है, उससे अधिक मौजूदा सरकार के प्रति उनकी वर्जना के भाव को प्रदर्शित करती है। यह सच है कि मौजूदा सरकार के प्रति विपक्ष के तेवर तल्ख हैं लेकिन इसके सहारे इस सरकार को सत्ताच्युत करने की उनकी रणनीति फिलहाल फलित होती नहीं दिखलाई नहीं देती। अगर सहमति का सूत्र पकडÞकर श्री कोईराला प्रधानमंत्री बन जाते हैं और निर्वाचन करा पाते हैं तब तो ठीक हैं अन्यथा वे एक हास्यास्पद स्थिति में फँस ही गए हैं।
आज जब देश संवैधानिक और राजनैतिक भँवर में फँसा हुआ है तो सबकी निगाहें एनेकपा अध्यक्ष प्रचण्ड की ओर उठ रही हैं और एक तरह से वे समस्या के समाधान की दिशा में प्रयासरत भी हैं। यह कहा जा सकता है कि उनकी छवि नेपाली राजनीति में एक अभिभावक के रूप में विकसित होती जा रही है। लेकिन उनकी समस्या यह है कि जब वे दलगत हितों की उपेक्षा कर देश की राजनैतिक समस्या के समाधान की दिशा में अग्रसर होते हैं तो उन्हें पार्टर्ीी विरोध का सामना करना पडÞता है और जब पार्टर्ीीे हित और स्व्ााभिमान की रक्षा की बात करते हैं तो विपक्ष उन्हें शंका की दृष्टि से देखता है। यही कारण है कि उन्हें समय-समय पर पलटनें मारनी होती है और एक तरह से उनकी अभिभावकीय भूमिका पर प्रश्नचिहृन उठता है। पिछले दिनों उन्होंने कुछ शर्ताें पर श्री कोईराला को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार करने की बात कही थी लेकिन जब मौजूदा प्रधानमंत्री ने यह शर्त रखी कि पहले इसी सरकार को सहमति की सरकार का रूप देकर आगामी निर्वाचन के सम्बन्ध में आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाए, तब निर्वाचन के लिए सत्ता हस्तांन्तरित किया जा सकता है। उन्हें विपक्षियों से यह आहृवान करना पडÞा कि ‘एक दिन के लिए ही सही वर्तमान सरकार में शामिल हो जाएँ।’ प्रतिक्रियास्वरूप तथाकथित सहमति की सरकार के प्रस्तावित प्रधानमंत्री श्री कोईराला ने स्पष्ट कहा कि ‘मैं झुककर प्रधानमंत्री का पद स्वीकार नहीं कर सकता।’ ऐसी स्थिति में प्रचण्ड के लिए अपनी अभिभावकीय छवि की रक्षा करना एक कष्टसाध्य अध्याय है।
मधेशवादी पार्टियाँ अधिकांश सत्ता में सहभागिता दे रही है और कुछ विपक्ष में रहकर विपक्षियों की आवाज बुलंद कर रही हैं। मूल्यों की दृष्टि से दोनों की अपनी अपनी प्राथमिकताएँ और प्रतिबद्धताएँ हैं। जो बाहर हैं वे फल टूटकर गिरने का इन्तजार कर रहे हैं और जो संयुक्त गणतांत्रिक मोर्चा के रूप में सत्ता में हैं वे अपनी जडÞ को मजबूत करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। तथाकथित राजनैतिक सहमति के नाम पर जो नए राजनैतिक समीकरण बनेंगे, उन में उनकी स्थिति या भूमिका क्या होगी कहना कठिन है। इसलिए वे कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहते। एक बात यह भी सच है कि सरकार से अलग होने के बाद इनकी दिशा क्या होगी, इस पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती क्योंकि विगत में सत्ता को केन्द्र में रखकर इन्होंने इतनी करवटें ली हैं कि इनकी रणनीति की सही पहचान मुश्किल का सबब है। लेकिन एक आशंका तो उनके मन में है कि संघीयता जैसे मुद्दे उनके लिए आवश्यक ही नहीं, उनके अस्तित्व से भी जुडÞा है। उनके दृष्टिकोण में नेपाली काँग्रेस और नेकपा एमाले जैसी पार्टियाँ इसके प्रति पर्ूण्ा प्रतिबद्ध नहीं। इसलिए मौजूदा सरकार को र्समर्थन देकर वे अपने एजेण्डे को सुरक्षित समझ रही है। अतः सहमति के प्रति उनकी असहमति जगजाहिर है।
अब सवाल उठता है कि पहले मर्ुर्गी कि पहले अण्डा – वैसे भी विगत वर्षों में त्याग और दायित्व की राजनीति का अभाव नेपाल की राजनीति में समग्र रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में कोई भी पक्ष न तो उर्त्र्सग करना चाहता है और न कोई अवसर को खोना चाहता है। इसी भँवर में देश फँसा हुआ है। निश्चय ही हालात ऐसे हैं कि कोई भी अतिवादी शक्ति कभी भी सिर उठा सकती है। लेकिन इस देश का सौभाग्य कहें या दर्ुभाग्य कि किसी अदृश्य और अस्पष्ट शक्ति के सहयोग और र्समर्थन के बिना कोई भी ऐसी अतिवादी शक्ति यहाँ कारगर कदम नहीं उठा पाती। यही स्थिति यहाँ सक्रिय राजनैतिक दलों को निरंकुश और दायित्वहीन बना रही है। आज स्थिति यह है कि मौजूदा सरकार को पदच्युत करने के लिए कोई संवैधानिक नुस्खा संवैधानिक प्रमुखों के पास नहीं। सहमति के लिए सम्यक् लचीलेपन का दलों में अभाव दिखलाई देता है। यथास्थिति को नियति मानकर समस्या का समाधान तलाशने का दृष्टिकोण उनका नहीं। इसलिए परिस्थितियाँ उलझी की उलझी है। अब चाहे जंगबहादुर बनने का आरोप लगे या भ्रष्ट या कर्त्तव्यहीन सरकार का मुखियार्(वर्त्तमान समय में यही देश की नियति है। एक तरह से सारा विपक्ष और सत्तापक्ष इस आशंका से ग्रस्त है कि जो सरकार चुनाव कराएगी, वह चुनावी लाभ बटोरने में सक्षम होगी। इसलिए माओवादी नहीं, काँग्रेस नहीं, एमाले नहीं, मधेशी नहीं(किसी स्वतंत्र व्यक्तित्व की तलाश की बात हो रही है। लेकिन यह भी सच है कि हमारी राजनीति इतना उदार नहीं कि अपना स्वत्व वह दूसरों के दामन में डाल दे। इसलिए असहमति का यह दौर फिलहाल जारी रह सकता है और इसी असहमति से देश को दिशा देने की नीति हमारे नीतिकारों को बनानी चाहिए अन्यथा एक और जंगबहादुर को पल्लवित-पुष्पित होने का अवसर देना चाहिए और इसकी जिम्मेवारी स्वयं पर लेनी चाहिए।
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