अहसास हुआ बर्बादी का, जब सारे घर में धूल उड़ी …..

 

गंगेश मिश्र

” शहीदों की क़ुर्बानी, यूँ ही व्यर्थ जा रही है,
इस कदर जातीयता की, दुर्गन्ध आ रही है।”
अधिकार,
सम्मान,
पहचान,
नागरिकता,
संघीयता,
जातीयता।
ऐसे विविध शब्दों का चलन, जहाँ आम है।अधिकार अपहृत है, सम्मान पाने के लिए संघर्ष है, पहचान ग़ुम है; नागरिकता प्रमुख समस्या है, संघीयता ख़तरे में है; ये है नेपाल में मधेश की दारूण स्थिति।
पर मुझे जो दिख रहा है मधेश में, जो हृदय को विदीर्ण कर देने वाली स्थिति है; वो है जातीयता।
हमें लड़ाई लड़नी है सत्ता से, जिसने हमारे अधिकारों को छीना है; लड़ भी रहे हैं,  इसमें कोई संदेह नहीं।परन्तु जो निष्ठा, समर्पण, एकजुटता होनी चाहिए; अधिकार प्राप्ति के लिए वो दिखाई नहीं देती। आज महात्मा गाँधी नहीं हैं, पर उनके विचार झकझोरते रहते हैं;  समाज को। गाँधी जी के साथ हुई घटना को सभी जानते हैं, जब उन्हें ट्रेन से उठाकर प्लेटफार्म पर पटक दिया गया था। स्वाभिमान आहत् हुआ, तब गाँधी का जन्म हुआ और आज उनके विचार, मानवता के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए। मधेश, अपमान दर अपमान सहता रहा, पर स्वाभिमान नहीं जगा; ऐसा लगता है हमें, अन्यथा यह नौबत नहीं आती।आज मधेश सबसे अधिक, अपने ही लोगों से दुःखी है; कारण है मधेश में व्याप्त  कलंक रूपी जातीयता।
जातीय विखण्डन इस कदर है, कि लोग इसे अधिकार की इस लड़ाई से भी ऊपर मान रहें हैं, जो सर्वथा निन्दनीय है।इससे किसीका भला होने वाला नहीं है।
” अहसास हुआ बर्बादी का, जब सारे घर में धूल उड़ी।”
मधेशी समुदाय में जातीयता का ज़हर घोलने में, सरकारी-गैर सरकारी संस्थाओं का भी कम योगदान नहीं है; सरकार ने भी आग में घी डालने का काम, बड़ी सफाई से किया है। साथ ही साथ मधेश में रहने वाले कुछ संभ्रात लोग, राजनैतिक पृष्ठभूमि वाले; जातीयता की भट्टी पर अपना रोटी सेकने वालों ने मधेश को बाँटने का काम किया है। हम किसी पर एक उँगली उठाते हैं,  तो चार उँगलियाँ हमारी ओर इशारा करती हैं; ” भाई ! ख़ुद को भी देख ले।”
मधेश को एक और लड़ाई, लड़नी है; अपने ही घर, अपने ही लोगों से।
” अपना ग़म ले के कहीं,  और न जाया जाए;
घर में बिखरी हुई चीजों को, सजाया जाए।”

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz
%d bloggers like this: