अहिंसा की भूमि लुम्बिनी पर हावी प्रचण्ड:
कनकमणि दीक्षित

प्रधानमंत्री डाँ बाबूराम भट्टर्राई की सरकार ने लुम्बिनी विकास के लिए गठित राष्ट्रीय निर्देशक समिति के अध्यक्ष पद पर प्रचण्ड की नियुक्ति की है। इसी सिलसिले में प्रचण्ड न्यूयोर्क भ्रमण पर जाएंगे जहां उनकी भेंट संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान कि मून से होने वाली है। वैसे इस समिति का गठन अपने आप में त्रुटिपर्ण् है। प्रचण्ड को इस पद पर नियुक्त कर उन्हें मनाने की यह भट्टर्राई की एक योजना मात्र दिखती है।   
व्यक्तिगत रूप से प्रचण्ड की राजनीतिक तथा नैतिक अस्पष्टता से लुम्बिनी के गरिमा पर धब्बा लगने की पूरी संभावना है। ऐसी अवस्था में मूल्य मान्यता संबंधी उनके कमजोरी को नेपाली जनता की ही कमजोरी माना जाएगा। प्रचण्ड की उपयोगवादी तथा दोष स्वीकार करने के व्यक्तित्वों की कर्ीर्तिमान से शाक्यमुनि सिर्द्धार्थ गौतम के पूरे संसार को ही शान्ति तथा अहिंसा सिखाने की मान्यता से काफी अलग है।
लुम्बिनी के आध्यात्मिक महत्व को संरक्षण करते हुए नेपाली जनता की आर्थिक उन्नति में सहयोग करने की विधिवत जिम्मेवारी पाने वाली संस्था का नाम है लुम्बिनी विकास कोष। इस घोषित विश्व संपदा स्थल के संरक्षण की जिम्मेवारी यूनेस्को की है। संयुक्त राष्ट्र संघ के दूसरे महासचिव यू थांट द्वारा लुम्बिनी के विकास के लिए अन्तर्रर्ाा्रीय समिति का गठन किया गया था। इस समय लुम्बिनी के ऊपर धावा बोलने का क्रम बढने के कारण एक बार फिर से उस अन्तर्रर्ाा्रीय समिति को सक्रिय करने की अवस्था आ गई है।
इन सभी संस्थाओं तथा योजनाओं के अस्तित्व में ना रहने का आभास देते हुए माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड को लुम्बिनी के नए योजनाकार और सरदार के रूप में आगे करने का दुष्प्रयास किया जा रहा है। एक कटु सत्य यह है कि लुम्बिनी के नाम का दुरूपयोग कर प्रचण्ड नेपल के एकल शक्ति केन्द्र के रूप में अपने आप को स्थापित करना चाह रहे हैं। इसमें उनके एकाधिकार रहे अपने दल की अथाह संपत्ति तथा प्रभाव का भी उपयोग होगा। लुबिनी के जरिये वो अपनी छवि में एक भावनात्मक धार्मिक तत्व को जोडना चाहते हैं। लेकिन इन सबमें उनके बुद्ध के प्रति आस्थावान होने का कोई भी संकेत नहीं दिखता है। यह दुखद लेकिन सत्य है कि दश वषर्ाें तक हिंसात्मक गतिविधि का नेतृत्व चलाने के लिए बिना माफी मांगे और जनयुद्ध के लिए बिना किसी जवाबदेहिता के ही दुनियां को शान्ति का संदेश देने वाले बुद्ध के नाम की संस्था का नेतृत्व कितना सही और असरदार होगा यह भी एक बडा सवाल है।
माओवादी द्वारा चलाए गए तथाकथित जनयुद्ध में १३ हजार निर्दाेष लोगों को अपनी जान गंवानी पडी। सिर्फइतना ही नहीं १५ सालों के लिए देश की अर्थतंत्र को खोखला बना दिया और इन सबसे अधिक लाखों नेपाली गरीब जनता को भारत और समुद्र पार खाडी देशों में पलायन होने के लिए बाध्य कर दिया। इन सबके लिए माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड को अपनी जिम्मेवारी स्वीकार करनी ही चाहिए। लेकिन अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं किया। त्रसित और विनीत नागरिकों के प्रतिनिधियों द्वारा आज तक कभी भी प्रचण्ड को मानवीयता का प्रमाण पेश करने के लिए नहीं कहा। लुम्बिनी को हाईजैक करने का यह प्रयास एक चतुर नेता की आंख में अपनी जनता के उपर र्सवसत्तावादी पकड लादने की चेष्टा मात्र है।
प्रचण्ड का व्यक्तिगत इतिहास और अधिक भयावह है। वो स्वयं अन्तर्रर्ाा्रीय फौजदारी अदालत द्वारा पीछा किए जाने की डर से चिन्तित है। कई देशों के राजदूतों ने उन्हें यह आश्वासन दिया है कि जब तक सरकार द्वारा हस्ताक्षर करने से पहले अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय के द्वारा कोई भी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। इसके बावजूद प्रचण्ड को यह चिन्ता सता रही है।
प्रचण्ड ने लोकतांत्रिक संसदीय राज्य व संविधान विरूद्ध २०५२ साल में जनयुद्ध की शुरूआत की थी। स्थानीय जनता को आतंकित करते हुए अपने काबू में रखने हेतु उन्होंने स्थानीय सामुदायिक और राजनीतिक अगुवाओं को चुन चुन कर अपमान करने यातना देने और सफाया करने की सिफारिश की थी।
२०६२/६३ साल में भूमिगत जीवन छोडने के बाद बीबीसी नेपाली सेवा के एक प्रत्यक्ष प्रसारण के दौरान प्रचण्ड ने स्वीकार किया कि पार्टर्ीीेताओं और कार्यकर्ताओं को यह निर्देश दिया गया था कि जरूरत पडने पर सफाया करो लेकिन -इलिमिनेट) यातना मत दो। इसके कुछ ही घण्टों बाद काठमाण्डू के शंकर होटल में संपादकों के एक जमघट में प्रचण्ड ने खुलासा किया कि  दल को निर्देशन था सीधे कनपट्टी में गोली मारना। इससे साबित होता है कि राज्यविहीनता की अवस्था में रहे पहाड  मैदान में जनता को बलात मौन किया गया।
प्रचण्ड के शान्ति विरोधी होने का प्रमाण जहांतहां मिल जाता है। उनकी हिंसा और दण्डहीनता प्रयोग क ििनरन्तरता अर्जुन बहादुर लामा की हत्या में आरोपित अग्नि प्रसाद सापकोटा को पिछली सरकार में प्रभावशाली मंत्रालय देकर साबित कर दी। खुद ही वकील, खुद ही न्यायाधीश बनते हुए वीरगंज पहुंचे और कहा कि नेपाल प्रहरी चाहे जो दलीलें दे प्रभु साह हत्या के दोषी नहीं हैं और उन्हें जबरन फंसाया गया है। अभी भी प्रचण्ड अदालत से उम्र कैद की सजा पाने वाले अपनी पार्टर्ीीे सभासद बालकृष्ण ढुंगेल को राष्ट्रपति के जरिये माफी दिलाने की कसरत कर रहे हैं।
लुम्बिनी के नाम पर तीन सौ करोड अमेरिकी डाँलर उठाने की घोषणा कर जनता को झूठा ख्वाब दिखाने के लिए फर्जी पता और टेलीफोन नम्बर बताकर फर्जी संस्था एपेक का मुखौटा बन कर पूरे ही देश को बरगलाने की कोशिश की। लेकिन सबल अन्तर्रर्ाा्रीय समाचार संप्रेषण मार्फ नेपाली संचारजगत ने अपनी क्षमता का पर््रदर्शन किया था।
एपेक की योजना एक ही बार प्रचण्ड  को नेपाली राजनीति में अजेय बनाना, अवसरवादी के लिए लुम्बिनी का दरवाजा खोलना और नेपाल के अहित होने पर भू राजनीति को चमकाना था। प्रचण्ड ने सहर्षही पर्ूव युवराज पारस शाह के समकक्ष उपाध्यक्ष बनने को तैयार हुए। नेपाल सरकर की जानकारी और सहभागिता के बगैर हमारे र्सार्वभौमिकता को चुनौती देते हुए बीजिंग के युनिडो -कार्यालय जिसका काम औद्योगिक विकास हैं) ने एपेक के साथ सहमति पत्र पर हुए हस्ताक्षर में प्रचण्ड की स्वीकृति दिखाई देती है। नेपाल में लुम्बिनी पर एक सरकारी संस्था और युनेस्को की एक अन्तरराष्ट्रीय संस्था होते हुए भी प्रचण्ड के नेतृत्व वाली इस नयी संस्था को मान्यता देकर प्रचण्ड के महत्वाकांक्षा को हावी होने से रोकने का प्रयास किया जाना चाहिए।
२३ सौ वर्षपहले एक सम्राट अशोक हुआ करते थे जो अपने सहभागिता में किए गए आमहत्या का प्रायश्चित करने के लिए पवित्र भूमि लुम्बिनी का भ्रमण किया था। यहां एक उपयोगवाद के महारथी अध्यक्ष प्रचण्ड हैं जो अपने हिंसात्मक कृत्य के बारे में बिना एक शब्द कहे बुद्ध की इस पवित्र जन्मस्थल को जनसर्ंपर्क स्थल के रूप में विकास करना चाहते हैं। नेपाली जनता की मानवतावादी मूल्य/मान्यता, तानाशाही के विरोध तथा अहिंसात्मक राजनीति प्रति के लगाव के कारण २०६२ और ६३ के महान आन्दोलन में प्रदर्शित हुआ था। लेकिन चतुर राजनीतिज्ञ प्रचण्ड की आंखों में इस मान्यता के प्रतिबिम्ब तक नहीं दिखता है।
संभव है कि किसी दिन प्रचण्ड अपने पुराने नाम पुष्प कमल के समान कोमल मन से सोचकर बुद्धम शरणम गच्छामि, संघम शरणम गच्छामि के सूत्र पर ध्यान दें तो नेपाली जनता के सामने झुकना ही पडेगा।
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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