अाखिर काैन हैं राेहिंग्या मुसलमान क्याें अपने ही देश में बेगाने हाे गए राेहिंग्या

७ सितम्बर
म्यामांर में रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर मानवीय त्रासदी की रोज नई नई तस्वीरें सामने आ रही हैं। कुछ दिन पहले ही म्यांमार से भागकर बांग्लादेश में शरण लेने पहुंचे रोहिंग्या मुसलमानों की नाव बंगाल की खाड़ी में डूब गई, जिसमें 120 से ज्यादा लोगों के मारे जाने की खबर आई।
समुंद्र के पानी में तैरते शवों ने एक बार फिर उस मानवीय त्रासदी की यादों को ताजा कर दिया जो बीते कुछ सालों से हम सीरिया और इराक में देखते आ रहे हैं। हाल के दिनों में ये धारणा बनी है कि दुनिया में सबसे ज्यादा सताई जा रही कौम रोहिंग्या मुसलमानों की ही है। शायद दुनिया की ये अकेली कौम है जिसका अपना कोई स्‍थायी ठिकाना नहीं है यहां तक की कोई उसे अपनाने को भी तैयार नहीं है।रोहिंग्या मुलसमान अब तक जिस म्यांमार को अपना मुल्क मानते आए थे अब वहां से उन्हें दुत्कारा जा रहा है। पिछले दस सालों में दो लाख से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमानों ने म्यामांर से भागकर पडोसी बांग्लादेश, भारत, नेपाल और खाड़ी के मुल्कों में पनाह ली है।इनमें से एक लाख 40 हजार के करीब रोहिंग्या अकेले बांग्लादेश में रह रहे हैं और उसके बाद 40 हजार के करीब रोहिंग्या भारत में अवैध तरीके से पनाह लिए हुए हैं। आइए, आपको बताते हैं कौन हैं रोहिंग्या और क्यों छिड़ा है इनको लेकर विवाद?
म्यांमार में दस लाख के करीब रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं। रोहिंग्या की ज्यादातर आबादी म्यांमार के रखाईन प्रांत में है। लेकिन म्यांमार इन्हें अपने मूल निवासी नहीं मानता, वहां धारणा है कि बांग्लादेश से भागकर इन लोगों ने यहां पनाह ली थी, इसलिए हमेशा से इन्हें वहां हिकारत की निगाह से देखा जाता है।

हालांकि रोहिंग्या कई पीढ़ियों से म्यामांर में बसे हुए हैं। लेकिन म्यांमार की बहुसंख्यक बौद्ध आबादी के साथ आज भी ये घुल मिल नहीं सके हैं। रखाईन प्रांत के एक गांव का नाम रोहिंग है, माना जाता है उसी के नाम पर यहां आकर बसे मुलसमानों को राहिंग्या कहा जाने लगा।

म्यांमार में हमेशा से इन्हें इनके मुल्क बांग्लादेश भेजे जाने की बात उठती रही है लेकिन बांग्लादेश भी इन्हें मान्यता देने को तैयार नहीं है। हालांकि वो इन्हें उदारता के साथ पनाह तो देता है, लेकिन एक शरणार्थी के रूप में ही।

बांग्लादेश में ही सबसे ज्यादा 1 लाख 40 हजार के करीब रोहिंग्या शरणार्थी रहते हैं। शरणार्थी जीवन जीने के कारण ही रोहिंग्या मुसलमानों का कोई विकास नहीं हो पाया, इनकी ज्यादातर आबादी आज भी खानाबदोश जिंदगी जीती है। न इन्हें शिक्षा के अच्छे अवसर मिल सके न रोजगार के।म्यामांर में पिछले कुछ दिनों से सेना और सुरक्षाबलों ने रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। इस कार्रवाई के पीछे एक घटना को माना जाता है जिसमें कुछ दिन पहले म्यांमार के मौंगडोव सीमा पर पुलिस स्टेशन में घुसकर 9 पुलिस अधिकारियों की हत्या कर दी गई थी।

उस समय कहा गया था कि कुछ रोहिंग्या विद्रोहियों ने पुलिस अधिकारियों को निशाना बना रखा है। इसके बाद भड़की पुलिस ने रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया, जिसमें विद्रोहियों की पहचान करके उन्हें जेल में डाला जा रहा है। जिसमें सेना भी उनकी मदद कर रही है। हालांकि आरोप लगाए जा रहे हैं कि अभियान के बहाने पुलिस और सुरक्षाबल बेगुनाह रोहिंग्याओं को भी निशाना बना रहे हैं। पिछले कुछ समय में ही 100 से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमानों की हत्या कर दी गई।

सैनिकों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप भी लग रहे हैं। उन पर प्रताड़ना और बलात्कार के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि इसमें उन्हें देश के बहुसंख्यक बौद्धों का भी समर्थन हासिल है। हालांकि रखाइन प्रांत में साल 2012 से ही सांप्रदायिक हिंसा का दौर चल रहा है, जिसमें हजारों लोग मारे जा चुके हैं जबकि दो लाख से ज्यादा देश छोड़ चुके हैं।

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