आंदोलन के बाद की अवस्था

मुरली मनोहर तिवारी :आंदोलन समाप्त होने के बाद मधेश की अवस्था क्या है ? पहले और बाद में क्या फर्क आया ? ऐसा क्यों लग रहा है, हालात पहले से और बदतर होते जा रहे है ? ऐसा क्यों हो रहा है, अब अपने ही साथ छोड़कर अलग हो रहे है ? क्या सबकुछ समान्य है या समय के गर्भ में कुछ और ही पल रहा है ? कई पेचीदा सवाल हंै, जिनके जवाब ढूढ़ने होंगे । जिस नारे से आंदोलन का जन्म हुआ था, बेशक नारे के रूप में उनकी कई उपलब्धियां हैं, लेकिन जिन उद्देश्यों और सिद्धांतों को लेकर आंदोलन हुआ था, वह कमजोर हुआ है । आंदोलन से एक उम्मीद बंधी थी कि राष्ट्रीय स्तर पर कुछ बदलाव होगा, पर वैसा तो नहीं हुआ, लेकिन इसका असर यह जरुर हुआ कि इस आंदोलन के बाद जो कभी अपने बूते सत्ता में नहीं पहँुच सकते थे, वे अब सत्ता के करीब पहँुच रहे हंै, वह भी अंतिम बार और मधेशी जनता आंदोलन करने का दण्ड भुगत रही है । नाका बंदी खुलने के बाद, सब जगह रुके काम को पूरा करने का भागमभाग लगा है । समय सीमा पकड़ने की दौड़ में सारे काम नियम कानून को ताक पर रख कर हो रहे हंैmadhesh sarkar 2

भ्रष्टाचार को खुली मान्यता मिल गई है । पर्सा बारा के हर महकमें में दलालों की चाँदी हो रही है । जि.बी.स से लेकर गा.बी.स तक में ब्रह्मलूट मचा हुआ है । सड़को पर पुलिस का आतंक फैला हुआ है, कोई भी सवारी दिखी नहीं की उसका चालान कट जाता है । गांव से टोल तक थाना के एजेंट तैनात है । कोई साधारण सा विवाद को हवा देकर बड़ा बनाना, फिर किसी को पकड़वाना, उसे छुड़ाने के लिए मोटी रकम उसुलना, यहाँ की दिनचर्या हो गयी है । नाम ना बताने की शर्त पर, एक पुलिस ने बताया कि पहले तो पर्सा में सरूआ के लिए मोटा पैसा देना पड़ा, अभी कुछ वसूल भी नही हुआ कि बंदी शुरू हो गई, बंदी में हाथ खाली रहा, ऊपर से हाकिम लोगों का आदेश आता था, गैस सिलेन्डर और राशन भेजो, अपने पैसे से जीप भर भरकर भेजा । आगे से खाली सिलेन्डर भी वापस नही आया, अब उसके भी पैसे भर रहा हुँ, मुझे जल्दी ये पैसे उठाने होंगे, इसलिए कुछ पुराने केस ढूंढ रहा हँु ।

पर्सा–बारा के हरेक बैंक में लोन लेने वालो की कतारें दिखती है । बैंक वाले कर्ज का किश्त नहीं आने का रोना रो रहे हंै । धरती से सोना उगाने वाले किसान भी अगली खेती करने के लिए कर्ज के वास्ते दर–दर की ठोकर खा रहे है । जबकि सुनने में आता है, नेपाल कृषि प्रधान देश है । क्या यही किसानो की प्रधानता है ? इसके आलावा फिर से बंद होने का संशय घेरे रहता है । शहीद परिवार और घायलों की सुध लेने वाला कोई नही है । हर तरफ दुःख, उदासी, मातम छाई है । हर जगह अफरातफरी और अराजकता का माहौल है । जब भी कोई आंदोलन अपने मूल से भटकता है, तब वह सत्ता परिवर्तन से खुश तो हो जाता है, लेकिन ये भूल जाता है कि सत्ता पाने की एक अनिवार्य शर्त है, व्यवस्था की बुराई से समझौता करना । ऐसे में आंदोलन के सिद्धांत बेमानी हो जाते हैं । जहाँ तक आंदोलन में साथ खड़े लोगों के उसका साथ छोड़ने की बात है तो आंदोलन चलाने के लिए सिद्धांतों की और सत्ता चलाने के लिए दुनियादारों की जरुरत होती है । जब सरकार चलाने के लिए दुनियादार भर लेते हैं, तो सिद्धांत वाले लोग पीछे छूट जाते हैं ।

एक तरह से यह आंदोलन सत्ता और संगठन पर कब्जे की कोशिश बन के रह गई । आंदोलनकारी होने के कुछ सुत्र होते है, शुद्ध आचरण, शुद्ध विचार, निष्कलंक जीवन, अपमान सहने की ताकत एवं सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता । हैरानी की बात यह है कि मोर्चा के पहली पंक्ति के नेता ही इन विचारों पर खरा नहीं उतरते । यह अच्छा नहीं होगा यदि आन्दोलन बिखर जाए । यह मधेश के लिये दुखद होगा कि आन्दोलन पथ पर चलते चलते मोर्चा के आंदोलनी लटके झटके और हाइप्रोफाइल निर्देशन की वजह से आंदोलन कहीं ‘राजपथ’ पर जाकर भटक न जाए । इसमें सन्देह नहीं कि उपनिवेशवाद मधेश का बड़ा मुद्दा और समस्या है, लेकिन मधेश में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी किसानों की बदहाली, बढ़ता सरकारी आक्रमण, निषेध की नीति आदि इतने मामले हैं जिन्हें नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता । संबैधानिक अधिकार के साथ साथ आंदोलनकारी को इन मुद्दों पर भी सोचना होगा ।

मधेश की जनता तो कई बार कई तरह से और लगभग प्रत्येक चार पांच बरस पर ठगी जाती है, उसे हर एक छोटे बड़े मुद्दे पर बारी बारी से खड़ा करना इतना आसान नहीं है । आंदोलनकारी टीम को यह भी समझना पड़ेगा कि मंत्री, नौकरशाह और कर्मचारी तो शोषण साजिश कर ही रहे हैं लेकिन इनके साथी के रूप में जो मोटी चमड़ी वाले, संवेदनहीन, खाँटी, खुराट व्यापारी हैं, उनका क्या किया जाए ? उदारीकरण के दशक बाद हम ‘गहराते अन्तर्विरोध’ के शिकार हैं । देश के सत्ताधारी अर्थशास्त्री, समाजशास्त्रियों और राष्ट्रवादियों के समूह के साथ ओली और प्रचंड की गठजोड़ ने देश के लोगों के बीच की आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृति असमानता को इतना बढ़ा दिया है कि मामला ८० प्रतिशत बनाम २० प्रतिशत का हो गया है ।

जिस संविधान की दुहाई देकर ये लोग जय–जयकार कर रहे हैं उसी संविधान की मूल अवधारणा को खारिज कर हमारे शासन के लोग और योजनाकारों ने अराजकता में देश को खुला खेलने के लिये छोड़ दिया है । क्या मोर्चा वाले इस विषम वैश्वीकरण, बांझ विकास, विषमता बढ़ाने वाली वृद्धि, कथित उदारवाद आदि के खिलाफ भी कुछ बोलेंगे ? ताकि मधेश में भूखे मरते किसान, बढ़ती बेरोजगारी व दिशाहीन राजनीति को एक व्यापक मंच मिल सके और व्यवस्था परविर्तन की मुक्कमल लड़ाई छिड़ सके । मशहूर लातीनी अमरीकी क्रान्तिकारी रोगी देबे्र कहते हैं, ‘क्रांति की गति वर्तुल या चक्रीय होती है । वह दुबारा अपनी रीढ़ की हड्डी पर फिर खड़ी की जा सकती है । ’ यदि हमने आन्दोलन और जन उभार के इस मोड़ पर रूककर स्वस्थ्य एवं ईमानदार आलोचना तथा आत्ममंथन नहीं किया, तो फिर मधेश अपने को ठगा महसूस करेगा और भविष्य में खड़ा होने वाले वास्तविक आन्दोलन में शामिल होने से हिचकेगा ।

इस जनआक्रोश को व्यापक जन आन्दोलन में तब्दील करने के लिये केवल मोर्चा के लोग ही नही बल्कि मधेश के सभी चिन्तक, समाजकर्मी, बुद्धिजीवी, किसान, नौजवान स्त्री, पुरुष, दलित, मुस्लिम आदि को सोचना ही होगा और इन आन्दोलन में सक्रिय भाग लेकर इसे सही दिशा में मोड़ना होगा । यही समाज की जरूरत और मांग है । कवि मुकुट बिहारी सरोज ने लिखा था– ‘अस्थिर सबके सब पैमाने तेरी जय जय कार जमाने बन्द किवाड़ किये बैठे हैं अब कोई आए समझाने फूलों को घायल कर डाला कांटों की हर बात सह गए कैसे कैसे लोग रह गए ’

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