आइए मैं भी बिकने को तैयार हूँ : कैलाश महतो

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कैलाश महतो , परासी, १० अगस्त |

तकरीबन अगहन–२०७२ की बात है । एक मित्र के सिफारसि से मेरी धर्मपत्नी को परासी के एक सरकारी कार्यालय में करार सेवा अन्तर्गत एक मध्यम स्तर पर नौकरी मिली थी । नौकरी पर रखते समय उस कार्यालय के हाकिम ने मेरी परिवार से मेरा शिकायत करते हुए कहा था, “म्याडम, आपके महतो सर से मेरा ३६ का आँकडा है, क्यूँकि वो गाली देने में किसी हाकिम को नहीं छोडते हंै । मुझे भी नहीं । वो इमानदार ही हैं तो क्या कर लिए ?, उनकी इमानदारी उन्हें क्यूँ नहीं खिलाता ? वैसे इंसान का इस संसार में कोई काम नहीं है । मैं भी महतो जैसे इंसान को पसन्द नहीं करता हूँ ।”
वैसे वो कोई हाकिम भी नहीं है । वे कुछ भू–तस्करों के साथ मिलकर अपने सम्बन्धित मन्त्रालय और विभाग के अधिकारियों को खिला पिला कर कर्मचारी सरुवा बढुवा के नियम विपरीत तकरीबन डेढ दशक से ज्यादा समय से एक ही जिला में टिके हुए हैं । उनसे सीनियर किसी अधिकारी को सहज रुप में वहाँ काम नहीं करने दिया जाता हैं । जिसके कारण कोई भी अधिकारी वहाँ ठहरना नहीं चाहता और वो बारम्बार कायम–मुकायम हाकिम बन जाते हंै । मेरे परिवार से शुरु के दिन ही बात करते समय उन्होंने हिदायत दी कि उनके कार्यालय में वो हिन्दी नहीं बोल सकती । मेरी परिवार उनसे हिन्दी में बात की थी । क्यूँकि वो मधेशी समुदाय के हंै । साथ ही और कर्मचारियों के साथ करने बाली भाषायी दुव्र्यवहार ही उनके साथ भी करने की कोशिश की गयी इन शब्दों साथ, “म्याडम, तिमी यहाँ हिन्दी बोल्न पाउँदैनौं ।” “तिमीे” शब्द के साथ और आज्ञार्थक शब्द प्रयोग होने पर मेरे परिवार ने विरोध किया कि वो किसी भी कर्मचारी को “तिमी” नहीं कह सकते । और अगर उस शब्द का प्रयोग होता रहा तो वो उस कार्यालय में नौकरी नहीं कर सकती । मगर उन्होंने तानाशाही रुप से उस शब्द का प्रयोग करना नहीं छोडा तो तीन दिन बाद मेरी परिवार ने वहाँ जाना छोड दी ।
मैं इस बात को अपने आलेख में इसलिए चर्चा करने की कोशिश किया हूँ कि मधेशी जनता इस बात को जाने कि नेपाल की शिक्षा पद्धतियों ने ऐसा मधेशी जनशतिm तैयार किया है कि वो नेपाली भाषा, संस्कृति, शासन, शैली और व्यवहार को अपने तथा अपने समुदाय के उपर लादने का काम करने में ही गर्व और सुरक्षा महशुश करते हैं । वो दिलो दिमाग से दरिद्र बन चुके हैं । नेपालियों के गुलामी में अपने अस्तित्व समेत को भूल चुके हैं । अपने ही लोगों को मान मर्दन करने में वे अपने को शासक और प्रशासक समझते हैं ।
वे भू–माफियों को प्रश्रय देकर मधेश के कृषि योग्य जमीनों को नेपालियों के हाथों बेचबाने में मशगुल हैं ।
कुछ दिन पहले के समाचार अनुसार पहाड और हिमाल में पाये जाने बाले आर्सागुम्बा को नेपाल सरकार के सुरक्षाकर्मियों के सुरक्षा में चीन अधिनस्थ तिब्बत में आर्सागुम्बा के व्यापारियों को भेजा जाता है और पन्द्रह लाख रुपये प्रति किलो बेचकर वहाँ के लोग करोडपति और अरबपति बन रहे हैं । उस आर्सागुम्बा में मधेशियों का कोई हक या हिस्सा नहीं बन पाता है जबकि मधेश में उबजने बाले मधेशी किसानों के उत्पादों को नेपाल सरकार और उसके सुरक्षाकर्मी अपना बपौती सम्पति समझते हैं । मधेशी किसानों को अपने उत्पादों को उनके अपने खेतों से उनके घरों तक सहज रुप में नहीं ले जाने की अवस्था है । नेपाली सुरक्षाकर्मी मधेशी किसानों को हर जगह परेशान करती है । वे अपने उत्पादों को एक जगह से दुसरे जगह ले जाने में घबराहट महशुश करते हैं । नेपाली लोग मधेश को अपनी बपौती जायदाद आखिर माने भी तो क्यँ नहीं ? क्यूँकि मधेश के मधेशी कुछ दलालों ने ही उन्हें मधेश पर हुकुमत करने की न्यौता जो दे रक्खा हैं ! उन्हें यह ज्ञात ही नहीं है कि उनके बाद उनके आने बाले सन्तानों की नेपालियों की चरम उपनिवेश में क्या होने बाला है ?
कभी मधेश के पूर्ण नियन्त्रण में रहे मधेश के वन जंगलों को आज नेपाली शासन और उसके प्रशासनों ने अपने कब्जे में इस तरह ले चुकी है कि कृषि प्रधान कहे जाने बाले मधेश के जमीनों को जोतने के लिए हर (हल) बनाने तक के लिए मधेशी किसानों को काठ उपलब्ध नहीं हो पा रहा है । मधेश के सारे चीज और विभागों को नेपालियों द्वारा कब्जा करने की अख्तियारी दिन प्रति दिन मजबूत होता जा रहा है । मधेश के युवा जनशतिm अपने भूमियों को छोड कर विदेश के ४५ डिग्री सेल्सियस के तापक्रमों को अपना भविष्य मान कर अपने घर परिवार, बच्चे, रिस्तेदार, माता पिता सबों को निर्जन बनाने को विवश हैं । उनके कमाई को भी यहाँ कोई सुरक्षा नहीं है ।
मधेश के पास श्रम शतिm, जमीन और विशाल पाकृतिक तथा भौतिक पूर्वाधार होने के बावजुद मधेशी पार्टी, बुद्धिजिवी, प्राध्यापक, कर्मचारी, कानुन व्यवसायी, शिक्षक, युवा तथा विद्यार्थियों के पास वो रोड म्याप ही नहीं है जो मधेश को स्वराज बनायें एवं मधेशियों को स्वरोजगारी । हमारे कर्मचारी तथा बुद्धिजिवियों में, शिक्षक, प्राध्यापक तथा विद्यार्थियों में सम्मानित जिन्दगी जिने की चाहत निर्माण करनी होगी । अपने स्वतन्त्रता, स्वाभिमान तथा आत्म सम्मान के लिए मधेशी युवाओं को जागृत होना होगा ।
मधेश और मधेशी दोनों की भविष्य खतरे के बेहद करीब हैं । कुछ तस्कर, गुलाम और स्वार्थी मधेशियों के अलावा पूरा मधेश और मधेशी एक तरफ अवसरहीन और दरिद्र होता जा रहे हैं तो वहीं पर नेपाली लोगों का क्रय शतिm अकल्पनीय रुप में बढता जा रहा है । नेपालियों के पास इतने पैसे हैं कि सारा मधेश को अगर कोई सौदा कर दें तो पलक भलपकते ही दश बीस नेपाली लोग ही बाँकी सारा मधेश की जमीन, पाकृतिक तथा भौतिक साधन श्रोत एवं श्रम शतिm समेत को खरीद सकने की हैसियत में हैं ।
अब इस समय आम मधेशियों के साथ, और विशेष रुप से मधेश के पढे लिखे कहे जाने बाले लोगों को हिम्मत करना होगा यह रास्ता तय करने के लिए कि मधेश और मधेशियों को वर्तमान के सरकार चाहिए या आजाद होने का आधार चाहिए ?, मधेशी दलों की दलिल चाहिए या मधेश की अपनी मंजिल चाहिए ?, प्रान्तीय सरकार चाहिए या आजाद मधेश की अपनी सरकार चाहिए ? मधेशी दलों को गालियाँ देना छोड कर हमें आगे निकलना ही समस्या की समाधान है या उन दलों की शिकायत में वतm गँवाने में ?
मधेश की भूमियों से नाइन्साफी करने बाले उन मधेशी अधिकारियों को मधेश अगर सम्मान देना मधेश की शान समझती है तो हम क्या करेंगे ? जब सारा मधेश ही बिक्री में है तो उसके एक छोटा सा भाग मुझे भी उसी तराजु में बैठना होगा जिसमें बाँकी मधेश को तौला जायेगा । किसी की इमानदारी और निश्छलता भी पढे लिखे कर्मचारी और समाज को पसन्द अगर नहीं है तो आइए मैं भी बिकने को तैयार हूँ । अब मेरी बिक्री बाँकी

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