आओ चलकर सैर करें हम

महेशचन्द्र शर्मा

हाथ पकड़कर गीता माता, मुझको चलना सिखाती है ।
सबसे प्रेम करो मेरे बेटे, मुझको यही सिखाती है ।।

जब जब मैं देवालय जाता, प्रभु से नाता जुड़ जाता ।
सात दण्डवत करते ही, परम शान्ति को मैं पाता ।।

एक दिन मैं गया जामा मस्जिद, सीढ़ी चढ़ता ताबड़तोड़ ।
खुले गगन चौड़े आँगन में, मैंने दोनों हाथ दिए जोड़ ।।

जीएमटी के चर्च में एक दिन, चला गया मैं सैलानी ।
सूली लटके प्रभु–पुत्र की, भावुक करुण कथा जानी ।।

भगवान बुद्ध की शरण में जाकर, बोला “ॐ मणिपद्मे हुम“ ।
दीपक जलते सुन्दर लगते, सबसे सुन्दर स्वयंभू तुम ।।

गुरुद्वारों में रखते कदम ही, आनन्दित हो जाता हूँ ।
शीश झुकाकर अरदास करता, लंगर छककर खाता हूँ ।।

पारसियों के मन्दिर में, अग्निशिखा की ज्योति देख ।
मेरे मुँह से सहज ही निकला, सबका रब्बा, मालिक एक ।।

यदु यहूदी जैन जितेन्द्रिय, एक माला के मोती अनेक ।
मानव जाति एक कुटुम्ब है, मानव–रक्त का रंग भी एक ।।

क्यों रहते हो अलग–थलग से, फँसे पड़े किस उलझन में ।
आओ चलकर सैर करें हम, प्रिय माधव के मधुवन में ।।

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि सच में न प्रणश्यति ।।

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