आखिर कितना सार्थक हुआ शिक्षा का अधिकार ? सपना मांगलिक

सपना मांगलिक, ५ सेप्टेम्बर | ( भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. राधाकृष्णन की जन्मतिथि 5 सितम्बर को भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है । आज शिक्षक दिवस पर प्रस्तुत है यह आलेख )

वो नाजुक नन्ही सी कलियाँ हैं ,माना कि अभी वह दूसरे पुष्पों की गति से खिली नहीं हैं ।उनके खिलने की गति मंद हैं तो क्या उन्हें आप तोड़कर फैंक दोगे ? क्या उनके विकास की गति अन्य पुष्पों से कम होने की वजह से मात्र वो आपके लिए उपेक्षित और बेकार हो गए ?।क्यों हमारा समाज ऐसी नन्ही कलियों को उतने ही स्नेह से नहीं देखता है जैसे खिलते गुलाब को ?।क्यों उनकी ज़रा – ज़रा सी कमियों अनदेखा करने के बजाय उसे समाज अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर करता है? ।हमारे समाज में लाखों ऐसे बच्चे हैं ,जो समाज में रहते हुए भी समाज से तिरस्कृत है, क्योंकि उनकी समझ और सोच हमारे समाज की गति के अनुरूप नहीं है। दुखद है कि हमारा समाज इन्हें गति देने के लिए कोई प्रयत्न भी नहीं करता। आज हर एक स्कूल में कोनों में बैठे डरे सहमे कुछ बच्चे ऐसे आपको जरूर मिल जायेंगे जो अपनी किसी शैक्षिक कमजोरी या सामाजिक व्यवहार में बाकी बच्चों से थोड़ा सा कमजोर होने के कारण स्कूलों द्वारा स्पेशल बच्चों में शुमार कर लिए जाते हैं ।और फिर शुरू होता है उन बच्चों के वजूद को धीरे – धीरे तहस नहस करने और मिटा देने का सिलसिला ।

sikshak

आये दिन माँ बाप को स्कूलों में बुलाकर बच्चे के व्यवहार की शिकायतें ,ब्लेक बोर्ड से काम न उतारने की शिकायतें ,क्लास डिस्टर्ब करने की शिकायतें ।और न जाने क्या – क्या कहकर उसे समाज से धीरे धीरे अलग कर दिया जाता है ।शिक्षकों की अत्यधिक टोकाटाकी और कटु व्यवहार से आहत बच्चा उस समय और ज्यादा बिखर जाता है जब उसके हमउम्र साथी भी उसका मजाक उड़ाने लगते हैं और उसे हर एक पल यह अहसास दिलाया जाता है कि वो बाकी बच्चों से अलग है ।वो बच्चा जो थोड़े से प्यार और समझदारी से एक अच्छा मृदुभाषी और सफल इंसान बनने की राह पर अग्रसर हो सकता है ।वही बच्चा चिडचिडा हो जाता है उसका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है और जितना और जो वह कर रहा था या कर सकता था उसे भी करने में वह परेशानी का अनुभव करता है ।मेरे एक जानकार के बच्चे को adhd की समस्या है पांच वर्ष का मासूम हर चीज में होशियार है बस एकाग्रता की कमी और अति सक्रियता की वजह से वह एक जगह ज्यादा देर तक बैठने में असमर्थ है ।इकलौता पुत्र होने की वजह से माध्यम वर्गीय माँ बाप ने उसे शहर के प्रतिष्ठित स्कूल में दाखिला दिलवाया ।मगर स्कूल बालों ने बच्चे और माँ बाप का जीना हराम कर रखा है ।वह कहते हैं कि आपके बच्चे की वजह से स्कूल का माहौल खराब हो रहा है ,या तो आप इसके लिए एक केयर टेकर रखें या फिर बच्चे को अपने घर रखें ।उन्होंने दो महीने उस बच्चे को स्कूल नहीं आने दिया क्योंकि माँ बाप को कोई केयर टेकर नहीं मिल पा रहा था ।डेढ़ लाख सालाना खर्च वाले स्कूल के लिए उन्होंने छह हजार मासिक पर एक लड़के को लगाया तो स्कूल वालों ने यहाँ भी नाक मुंह चढ़ाए कि स्कूल में लड़कियां भी पढ़ती हैं ।इसलिए किसी महिला केयर टेकर को ही लगायें ।फिर कुछ दिन और छुट्टी करने के वावजूद एक केयर टेकर मिली तो इत्तिफाक से कुछ दिनों बाद उस केयर टेकर के परिवार के एक सदस्य का देहांत हो गया और वह स्कूल बच्चे के साथ नहीं जा सकी ।माँ बाप ने स्कूल अप्लीकेशन लिखकर भेजी मगर स्कूल वालों ने बच्चे को रिसेप्शन पर पूरा दिन बैठाए रखा मगर क्लास में नहीं भेजा ।क्योंकि उस पांच साल के मासूम की वजह से उनकी क्लास डिस्टर्ब होती है ।इतनी दिक्कतों के कारण उस बच्चे के माँ – बाप भी अवसाद में रहते हैं और उन्हें भी वक्त के साथ अपना लाडला अब बोझ लगने लगा है । मैं पूछती हूँ क्या एक मामूली सी कमजोरी जो वक्त के साथ  ठीक भी हो जाती है या हो सकती है के लिए मासूम बच्चों पर इतना अत्याचार जायज है?।नहीं ,हमारे देश की शिक्षा प्रणाली और विदेशी शिक्षा प्राणाली में यही अंतर है ।हमारी शिक्षा प्रणाली  रट्टू तोते और कोल्हू के बैलों का निर्माण करती है और विदेशी शिक्षा प्रणाली वैज्ञानिक और खिलाड़ीयों का ।शायद यही वजह है कि ओलम्पिक में डेढ़ करोड़ की आबादी वाला भारत एक – एक मैडल को तरसता है और दिल्ली ,मुंबई जैसे शहरों की जनसख्या वाले देश अनगिनत मैडल झटक कर ले जाते हैं ।मेरा इस घटना का जिक्र करने से तात्पर्य यह है कि सरकार द्वारा सर्व शिक्षा अभियान चलाये जाने और ret एक्ट लागू किये जाने के वावजूद हमारे फूल से नन्हे मुन्नों के साथ हमारा समाज और स्कूल इस तरह का व्यवहार कैसे कर सकते हैं? ।जबकि सरकार सर्व शिक्षा के तहत जिन बच्चों को कुछ समस्या है, उनको व्यक्तिगत शिक्षण प्रणाली के तहत शिक्षा दिलाये जाने और उसके लिए सरकारी सुबिधायें स्कूलों को उपलव्ध कराने की घोषणा कर चुकी है ।इसके वावजूद न तो गरीब को निजी स्कूलों में प्रवेश दिया जा रहा है और न ही सामान्य से थोडा भिन्न बच्चों को स्कूलों में रखा जा रहा है । हमें और हमारे समाज को यह समझना होगा कि हर बच्चा अपने आप में अलग होता है ।हर बच्चे में कुछ खामियां और कुछ विशेषताएं होती हैं मगर हमारा समाज उन विशेषताओं को तो अनदेखा कर देता है । इसके आज भी हमारें विद्यालय ऐसे बालकों के लिए साधनहीन नजर आते है जिनकी विभिन्न ज्ञानेन्द्रिय, शारीरिक , बौद्धिक,  सामाजिक, आर्थिक कारणों के कारण कुछ विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकतायें है ।
वर्तमान में विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकताओं वाले बालकों के लिए शिक्षा की दो प्रकार की व्यवस्थाएं है । एक वह जिन्हे हम विशेष विद्यालय कहते है, जो ज्यादातर शहरों मे स्थित आवासीय है ।  जिनका उदेद्श्य केवल एक प्रकार के विशिष्ट बालकों की विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करना होता है । और दूसरा तरीका है कि उन्हे अन्य सभी बालकों के साथ  आस-पड़ोस के सामान्य विद्यालय में भेजा जाये और वही उनकी विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने की व्यवस्था कि जायें। यदि बालक इस प्रकार के विद्यालय में जाता है तो वह अपने अन्य भाई बहनों के समान अपने माँ बाप के साथ रह सकता है । दूसरा इस प्रकार के विद्यालयों में  सभी बालक एक दूसरे से मिलजुल कर एक दूसरे से सीख सकते है । इसके अलावा बालक को बाद में अपने आपको दुनिया में समायोजित करने में सहायता मिलती है क्योंकि आखिरकार उसको रहना तो उसको उसी समाज में है जिसका कि वो हिस्सा होता है इसलिए क्यों न बालक को प्रारम्भ से ही उस माहौल में रखा जाये जहाँ उसे विद्यालय की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् रहना है? इसलिए अच्छा है कि आरम्भ से बालक को  मुख्यधारा वाले ऐसे विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा जाये जहाँ अन्य सामान्य बालक भी जाते है । इस अवधारणा के साथ समावेशित शिक्षा व्यवस्था प्रणाली का आरम्भ हुआ । समावेशी शिक्षा से तात्पर्य ऐसी शिक्षा प्रणाली से है जिसमें प्रत्येक बालक को चाहे वो विशिष्ट हो या सामान्य बिना किसी भेदभाव के, एक साथ, एक ही विद्यालय में, सभी आवश्यक तकनीकों व सामग्रियों के साथ, उनकी सीखने सिखाने के जरूरतों को पूरा किया जायें । मगर होता क्या है ?हमारा समाज और ये  स्कूल उनकी खामियों को उनके विरुद्ध हथियार बना उनके वजूद और आत्मा को लहुलुहान कर डालते हैं ।सर्व शिक्षा कक्षा में विविधताओं को स्वीकार करने की एक मनोवृत्ति है जिसके अन्तर्गत विविध क्षमताओं वाले बालक सामान्य शिक्षा प्रणाली में एक साथ अध्ययन करते है । शिक्षा के अधिकार के तहत प्रत्येक बालक अद्वितीय है और उसे अपने सहपाठियों  की भाँति विकसित करने के लिए कक्षा में विविध प्रकार के शिक्षण की आवश्यकता हो सकती है । बालक के पीछे  रह जाने के लिए उसे दोषी नही ठहराया जा सकता है, बल्कि उन्हें  कक्षा में भली प्रकार समाहित न कर पाने का जिम्मेदार अध्यापक को स्वंय समझना चाहिए ।  आज “हमारी अंतरा “जैसे धारावाहिक और “तारे जमीन पर जैसी ” फिल्मों को दिखा इन बच्चों की कमजोरियों से लोग पैसा कमाते हैं ,सहानभूति बटोरते हैं पर ऐसे बच्चों के हक़ के लिए लड़ने को उनकी साहयता को कोई आगे नहीं आता ।काश कि हम इन बच्चों की जगह खुद को रखकर देखें और महसूस करें कि निरंतर उपेक्षा और दुत्कार से इन बच्चों के नाजुक ह्रदय पर क्या बीतती होगी ?कैसे तार तार होते होंगे इनके नन्हे मुन्ने सपने ।कितना रोता होगा इनका दिल जब भीड़ में उनको अकेला कर दिया जाता है यह कहकर कि जाओ तुम्हारा हम सक्षम लोगों की दुनिया में कोई स्थान नहीं ।  सोचकर देखिये अगर हमें किसी ऐसे प्रदेश में छोड़ दिया जाए जहाँ हमारी बोली और हाव भाव कोई न समझता हो ।हमारी जरूरत तक हम बता पाने में असमर्थ हों तब हम कितना लाचार और विवश खुद को पायेंगे ?ऐसा ही ठीक इन मासूमों के साथ हर दिन हर पल होता है ।इनके लिए भी यह स्कूल और समाज वो अनजान प्रदेश है जहाँ यह बच्चे हर दिन संघर्ष करते हैं अपनी जरूरतों के लिए ,जरा से प्रेम के लिए ,पर इन्हें कोई नहीं समझ पाता ।यहाँ तक कि समाज के तानों और व्यंग्य बाणों से आहत इनके माता पिता  भी इनसे बेरुखी पूर्ण व्यवहार करने लगते हैं ।उफ्फ कितना रोता होगा इन मासूमों का दिल ।

Sapana Manglik

(साहित्यकार सपना मांगलिक,एफ -६५९ कमला नगर आगरा )

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