आखिर कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान ?

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म्यांमार में दस लाख के करीब रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं । यह कौम आजकल भीषण मानवीय त्रासदी से जूझ रहा है, एक पूरी कौम को उस देश से बेदखल किया जा रहा है जहां वो पुश्तों से रहते आए हैं । कोई नहीं जानता म्यांमार से निकलकर रोहिंग्या कहां जाएंगे कौन उन्हें पनाह देगा । और शायद इसकी चिंता उस म्यांमार सरकार को भी नहीं है जिसकी मुखिया मानवाधिकारों की रक्षक कही जाने वाली नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सांग सू की हैं । वही सू की, जिन्होंने मिलट्री शासन के दौरान अपने देश की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर दशकों तक संघर्ष किया । उसी सू की के देश में रोहिंग्या मुसलमान दर–ब–दर हो रहे हैं और वो खामोश हैं । दुनिया के तमाम मानवाधिकार संगठनों का उनकी यह चुप्पी साल रही है, लेकिन सू की ने अभी तक इस मुद्दे पर कोई ऐसा पुख्ता आश्वासन नहीं दिया है जिससे दहशत और अनिश्चितता के साये में जी रहे रोहिंग्या मुसलमानों को कोई उम्मीद की किरण दिख सके । ऐसे में रोहिंग्याओं के पास अपनी जान बचाने के लिए कोई सुरक्षित आसरा ढूंढने के सिवाय कोई चारा ही नहीं है । रोहिंग्या मुसलमानों के लिए सबसे बड़ी समस्या है उनकी पहचान का संकट । यूं तो म्यांमार में रोहिंग्याओं की आबादी दस लाख के करीब है लेकिन आज तक वह म्यांमार के मूल नागरिक नहीं बन पाए हैं । उन्हें आज भी बांग्लादेशी शरणार्थी के तौर पर देखा जाता है ।
बौद्ध बहुसंख्यक आबादी वाले म्यांमार में लंबे समय तक सैनिक शासन रहा है इसलिए वहां अभी भी मानवाधिकारों की बहुत ज्यादा पैरोकारी नहीं की जाती है । ऐसे में रोहिंग्याओं को आज भी दोयम दर्जे का नागरिक ही माना जाता है । यह सब चलता रहता तब भी ठीक था कम से कम उन्हें म्यांमार में रहने की अनुमति तो रहती, लेकिन पिछले कुछ दिनों में हुई
घटनाओं ने रोहिंग्याओं को अपना देश छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया । कुछ दिनों पहले मौंगडोव सीमा पर स्थित पुलिस स्टेशन में घुसकर ९ पुलिस अधिकारियों की हत्या कर दी गई थी । जिसका आरोप रोहिंग्याओं के विद्रोही गुट पर लगा था । इसके अलावा २५ और पुलिस स्टेशनों पर भी हमले का आरोप है जिसमें काफी संख्या में पुलिसकर्मी घायल हुए हैं ।
इसी के बाद से म्यांमार पुलिस और सेना ने रोहिंग्या विद्रोहियों के खिलाफ अभियान चलाया हुआ है । आरोप है विद्रोहियों के बहाने सभी रोहिंग्याओं को निशाना बनाया जा रहा है । महिलाओं से बलात्कार किए जा रहे हैं । पिछले कुछ दिनों में ऐसी तस्वीरें भी आई जिनमें म्यांमार के सुरक्षाबलों द्वारा रोहिंग्याओं के बच्चों को गोली मारते दिखाया गया है । अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी काफी निंदा हुई लेकिन म्यांमार सरकार इन सबसे बेखबर अपना अभियान जारी रखे हुए है ।
म्यामांर में रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर मानवीय त्रासदी की रोज नई नई तस्वीरें सामने आ रही हैं । कुछ दिन पहले ही म्यांमार से भागकर बांग्लादेश में शरण लेने पहुंचे रोहिंग्या मुसलमानों की नाव बंगाल की खाड़ी में डूब गई, जिसमें १२० से ज्यादा लोगों के मारे जाने की खबर आई ।
समुंद्र के पानी में तैरते शवों ने एक बार फिर उस मानवीय त्रासदी की यादों को ताजा कर दिया जो बीते कुछ सालों से हम सीरिया और इराक में देखते आ रहे हैं । हाल के दिनों में ये धारणा बनी है कि दुनिया में सबसे ज्यादा सताई जा रही कौम रोहिंग्या मुसलमानों की ही है । शायद दुनिया की ये अकेली कौम है जिसका अपना कोई स्थायी ठिकाना नहीं है यहां तक की कोई उसे अपनाने को भी तैयार नहीं है । रोहिंग्या मुलसमान अब तक जिस म्यांमार को अपना मुल्क मानते आए थे अब वहां से उन्हें दुत्कारा जा रहा है । पिछले दस सालों में दो लाख से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमानों ने म्यामांर से भागकर पडोसी बांग्लादेश, भारत, नेपाल और खाड़ी के मुल्कों में पनाह ली है । इनमें से एक लाख ४० हजार के करीब रोहिंग्या अकेले बांग्लादेश में रह रहे हैं और उसके बाद ४० हजार के करीब रोहिंग्या भारत में अवैध तरीके से पनाह लिए हुए हैं ।
म्यांमार में दस लाख के करीब रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं । रोहिंग्या की ज्यादातर आबादी म्यांमार के रखाईन प्रांत में है । लेकिन म्यांमार इन्हें अपने मूल निवासी नहीं मानता, वहां धारणा है कि बांग्लादेश से भागकर इन लोगों ने यहां पनाह ली थी, इसलिए हमेशा से इन्हें वहां हिकारत की निगाह से देखा जाता है ।
हालांकि रोहिंग्या कई पीढियों से म्यामांर में बसे हुए हैं । लेकिन म्यांमार की बहुसंख्यक बौद्ध आबादी के साथ आज भी ये घुल मिल नहीं सके हैं । रखाईन प्रांत के एक गांव का नाम रोहिंग है, माना जाता है उसी के नाम पर यहां आकर बसे मुलसमानों को रोहिंग्या कहा जाने लगा ।
म्यांमार में हमेशा से इन्हें इनके मुल्क बांग्लादेश भेजे जाने की बात उठती रही है लेकिन बांग्लादेश भी इन्हें मान्यता देने को तैयार नहीं है । हालांकि वो इन्हें उदारता के साथ पनाह तो देता है, लेकिन एक शरणार्थी के रूप में ही ।
बांग्लादेश में ही सबसे ज्यादा १ लाख ४० हजार के करीब रोहिंग्या शरणार्थी रहते हैं । शरणार्थी जीवन जीने के कारण ही रोहिंग्या मुसलमानों का कोई विकास नहीं हो पाया, इनकी ज्यादातर आबादी आज भी खानाबदोश जिंदगी जीती है । न इन्हें शिक्षा के अच्छे अवसर मिल सके न रोजगार के । कुछ रोहिंग्या विद्रोहियों ने पुलिस अधिकारियों को निशाना बना रखा है । इसके बाद भड़की पुलिस ने रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया, जिसमें विद्रोहियों की पहचान करके उन्हें जेल में डाला जा रहा है । जिसमें सेना भी उनकी मदद कर रही है । हालांकि आरोप लगाए जा रहे हैं कि अभियान के बहाने पुलिस और सुरक्षाबल बेगुनाह रोहिंग्याओं को भी निशाना बना रहे हैं । पिछले कुछ समय में ही १०० से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमानों की हत्या कर दी गई ।
सैनिकों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप भी लग रहे हैं । उन पर प्रताड़ना और बलात्कार के आरोप भी लगाए जा रहे हैं । कहा जा रहा है कि इसमें उन्हें देश के बहुसंख्यक बौद्धों का भी समर्थन हासिल है । हालांकि रखाइन प्रांत में साल २०१२ से ही सांप्रदायिक हिंसा का दौर चल रहा है, जिसमें हजारों लोग मारे जा चुके हैं जबकि दो लाख से ज्यादा देश छोड़ चुके हैं ।

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