आखिर क्यों होते हैं भूकम्प ?

भूपटल में होने वाली आकस्मिक कंपन या गति जिसकी उत्पत्ति प्राकृतिक रूप से भूतल के नीचे (भूगर्भ में) होती है । भूगर्भिक हलचलों के कारण भूपटल तथा उसकी शैलों में संपीडन एवं तनाव होने से शैलों में उथल–पुथल होती है जिससे भूकंप उत्पन्न होते हैं । विवर्तनिक क्रिया, ज्वालामुखी क्रिया, समस्थितिक समायोजन तथा वितलीय कारणों से भूकंप की उत्पत्ति होती है । ज्वालामुखी क्रिया द्वारा भूगर्भ से तप्त मैग्मा, जल गैसें आदि ऊपर निकलने के लिए शैलों पर तेजी से धक्के लगाते हैं तथा दबाव डालते हैं जिसके कारण भूकंप उत्पन्न होते हैं । इसी प्रकार भू–आकृतिक प्रक्रमों द्वारा भूपटल की ऊपरी शैल परतों में समस्थितिक संतुलन बिगड़ जाने पर क्षणिक असंतुलन उत्पन्न हो जाता है जिसे दूर करने के लिए समस्थितिक समायोजन होता है जिससे शैल परतों में आकस्मिक हलचल तथा भूकंप उत्पन्न होते हैं । कुछ सीमित भूकंप पृथ्वी के अधिक गहराई (३०० से ७२० किमी) में वितलीय कारणों से भी उत्पन्न होते हैं ।
भूकंप, भूचाल या भूडोल भूपर्पटी के वे कंपन हैं जो धरातल को कंपा देते हैं और इसे आगे पीछे हिलाते हैं । भूपर्पटी में शैलों की (या शैलों के अंदर) एक तीव्र अभिज्ञेय कंपन–गति एवं समायोजन, जिस परिणामस्वरूप प्रत्यास्थ घात तरंगें उत्पन्न होती हैं और चारों ओर सभी दिशाओं में फैलती हैं ।
पृथ्वी में होनेवाले इन कंपनों का स्वरूप तालाब में फेंके गए एक कंकड़ से उत्पन्न होने वाली लहरों की भाँति होता है । भूकंप बहुधा आते रहते हैं । वैज्ञानिकों का मत है विश्व में प्रति तीन मिनट में एक भूकंप होता है । साधारणतया भूकंप के होने के पूर्व कोई सूचना नहीं प्राप्त होती है । यह अकस्मात् हो जाता है । वैज्ञानिक दृष्टि से भूकंप पृथ्वी स्तर के स्थानांतरण से होता है । इन स्थानांतरण से पृथ्वीतल पर ऊपर और नीचे, दाहिनी तथा बाई ओर गति उत्पन्न होती है और इसके साथ साथ पृथ्वी में मरोड़ भी होते हैं । भूकंप गति से पृथ्वी के पृष्ठ पर की तरंगो भाग पर पानी के तल के सदृश तरंगें उत्पन्न होती हैं । १८९० ई. में असम में जो भयंकर भूकंप हुआ था उसकी लहरें धान के खेतों में स्पष्टतया देखी गई थीं । पृथ्वी की लचीली चट्टानों पर किसी प्रहार की प्रतिक्रिया रबर की प्रतिक्रिया की भाँति होती हैं । ऐसी तरंगों के चढ़ाव उतार प्रायः एक फुट तक होते हैं । तीव्र कंपन से धरती फट जाती है और दरारों से बालू, मिट्टी, जल और गंधकवाली गैसें कभी कभी बड़े तीव्र वेग से निकल आती हैं । इन पदार्थाें का निकलना उस स्थान की भूमिगत अवस्था या अधःस्तल अवस्था पर निर्भर करता है । जिस स्थान पर ऐसा विक्षोभ होता है वहाँ पृथ्वी तल पर वलन, या विरूपण, अधिक तीक्ष्ण होता है । ऐसा देखा गया है कि भूकंप के कारण पृथ्वी में अनेक तोड़ मोड़ उत्पन्न हो जाते हैं ।
बड़े बड़े भूकंपों के कुछ पहले, या साथ साथ, भूगर्भ से ध्वनि उत्पन्न होती है । यह ध्वनि भीषण गड़गड़ाहट के सदृश होती है । भूकंप की यह विकट गड़गडाहट मटीली जगहों की अपेक्षा पथरीली जगहों में अधिक शीघ्रता से सुनी जाती है । भूकंप से आभ्यंतर भाग की अपेक्षा पृथ्वी के तल पर कंपन अधिक तीव्र होता है । असम के सन् १८९७ वाले भूकंप की ध्वनि रानीगंज की कोयले खानों में सुनी गई थी, पर उस भूकंप का अनुभव वहाँ नहीं हुआ था ।
भूकंप का वितरण
अब तक जितने भूकंप इस भूमंडल पर हुए हैं, यदि उन सबका अभिलेख हमारे पास होता तो उससे स्पष्ट हो जाता कि पृथ्वी तल पर कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ कभी न कभी भूकंप न आया हो । जो क्षेत्र आज भूकंप शून्य समझे जाते हैं, वे कभी भूकंप क्षेत्र रह चुके हैं । इधर भूकंप के संबंध में जो वैज्ञानिक खोज बीन हुई है,उससे ज्ञात हुआ है कि भूकंप क्षेत्र दो वृत्ताकार कटिबंध में वितरित है । इनमें से एक भूकंप प्रदेश न्यूजीलैंड के निकट दक्षिणी प्रशांत महासागर से आरंभ होकर, उत्तर पश्चिम की ओर बढ़ता हुआ चीन के पूर्व भाग में आता है । यहाँ से यह उत्तर पूर्व की ओर मुड़कर जापान होता हुआ, बेरिंग मुहाने को पार करता है और फिर दक्षिणी अमरीका के दक्षिण–पश्चिम की ओर होता हुआ अमरीका की पश्चिमी पर्वत श्रेणी तक पहुंचता है । दूसरा भूकंप प्रदेश जो वस्तुतः पहले की शाखा ही है, ईस्ट इंडीज द्वीप समूह से प्रारंभ होकर बंगाल की खाड़ी पर बर्मा, हिमालय, तिब्बत, तथा ऐल्प्स से होता हुआ दक्षिण पश्चिम घूमकर ऐटलैंटिक महासागर पार करता हुआ, पश्चिमी द्वीपसमूह (वेस्ट इंडीज) होकर मेक्सिको में पहलेवाले भूकंप प्रदेश से मिल जाता है । पहले भूकंप क्षेत्र को प्रशांत परिधि पेटी कहते हैं । इसमें ६८ प्रतिशत भूकंप आते हैं और दूसरे को रूपसागरीय पेटी कहते हैं इसके अंतर्गत समस्त विश्व के २१ प्रतिशत भूकंप आते हैं । इन दोनों प्रदेशों के अलावा चीन, मंचूरिया और मध्य अफ्रिका में भी भूकंप के प्रमुख केंद्र हैं । समुद्रों में भी हिंद, ऐटलैंटिक और आर्कटिक महासागरों में भूकंप के केंद्र हैं ।
भूकंप के कारण
अत्यंत प्राचीन काल से भूकंप मानव के सम्मुख एक समस्या बनकर उपस्थित होता रहा है । प्राचीन काल में इसे दैवी प्रकोप समझा जाता रहा है । प्राचीन ग्रंथों में, भिन्न भिन्न सभ्यता के देशों में भूकंप के भिन्न भिन्न कारण दिये गए हैं । कोई जाति इस पृथ्वी को सर्प पर, कोई बिल्ली पर, कोई सुअर पर, कोई कछुवे पर और कोई एक बृहत्काय राक्षस पर स्थित समझती है । उन लोगों का विश्वास है कि इन जंतुओं के हिलने डुलने से भूकंप होता है । अरस्तू (३८४ ई.पू.) का विचार था कि अधःस्तल की वायु जब बाहर निकलने का प्रयास करती है, तब भूकंप आता है । २१वीं और ज्ञठवीं शताब्दी में लोगों का अनुमान था कि पृथ्वी के अंदर रासायनिक कारणों से तथा गैसों के विस्फोटन से भूकंप होता है । १८वीं शती में यह विचार पनप रहा था कि पृथ्वी के अंदरवाली गुफाओं के अचानक गिर पड़ने से भूकंप आता है । १८७४ ई में वैज्ञानिक एडवर्ड जुस ने अपनी खोजों के आधार पर कहा था कि ‘भूकंप भ्रंश की सीध में भूपर्पटी के खंडन या फिसलने से होता है ।’ ऐसे भूकंपों को विवर्तनिक भूकंप कहते हैं । ये तीन प्रकार के होते हैं ।
१. सामान्य, जबकि उद्गम केंद्र की गहराई ४८ किमी. तक हो,
२ं मध्यम, जबकि उद्गम केंद्र की गहराई ४८ से २४० किमी. हो तथा
३. गहरा उद्गम, जबकि उद्गम केंद्र की गहराई २४० से १,२०० किमी. तक हो ।
इनके अलावा दो प्रकार के भूकंप और होते हैंः ज्वालामुखीय और निपात । १८वीं शती में भूकंपों का कारण ज्वालामुखी समझा जाने लगा था, परंतु शीघ्र ही यह मालूम हो गया कि अनेक प्रलयंकारी भूकंपों का ज्वालामुखी से कोई संबंध नहीं है । हिमालय पर्वत में कोई ज्वालामुखी नहीं है, परंतु हिमालय क्षेत्र में गत सौ वर्षाे में अनेक भूकंप हुए हैं । अति सूक्ष्मता से अध्यन करने पर पता चला है कि ज्वालामुखी का भूकंप पर परिणाम अल्प क्षेत्र में ही सीमित रहता है । इसी प्रकार निपात भूकंप का, जो चूने की चट्टान में बनी कंदरा, या खाली की हुई खानों की, छत के निपात से उत्पन्न होते हैं, भी परिणाम अल्प क्षेत्र तक ही सीमित रहता है । कभी कभी तो केवल हल्के कंप मात्र ही होते हैं ।
भूविज्ञानियों की दृष्टि भूकंप के कारणों को खोज निकालने के लिये पृथ्वी के आभ्यांतरिक स्तरों की ओर गई । भूवैज्ञानिकों के अनुसार भूकंप वर्तमान युग में उन्हीं पर्वतप्रदेशों में होते हैं जो पर्वत भौमिकी की दृष्टि से नवनिर्मित हैं । जहाँ ये पर्वत स्थित हैं वहाँ भूमि की सतह कुछ ढलवाँ है, जिससे पृथ्वी के स्तर कभी कभी अकस्मात् बैठ जाते हैं । स्तरों से, अधिक दबाव के कारण ठोस स्तरों के फटने या एक चट्टान के दूसरी चट्टान पर फिसलने से होता है । जैसा ऊपर भी कहा जा चुका है, पृथ्वी स्तर की इस अस्थिरता से जो भूकंप होते हैं उन्हें विवर्तनिक भूकंप कहते हैं । भारत के सब भूकंपों का कारण विवर्तनिक भूकंप हैं ।
भूकंप के कारणों पर निम्नलिखित विभिन्न सिद्धांतों का प्रतिपादन हुआ हैः
१. प्रत्यास्थ प्रतिक्षेप सिद्धांत– सन् १९०६ में हैरी फील्डिंग रीड ने इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया था । यह सिद्धांत सैन फ्रैंसिस्को के भूकंप के पूर्ण अध्ययन तथा सर्वेक्षण के पश्चात् प्रकाश में आया था । इस सिद्धांत के अनुसार भूपर्पटी पर नीचे से कोई बल लंबी अवधि तक कार्य करे, तो वह एक निश्चत समय तथा बिंदु तक (अपनी क्षमता तक) उस बल को सहेगी और उसके पश्चात् चट्टानों में विकृति उत्पन्न हो जाएगी । विकृति उत्पन्न होने के बाद भी यदि बल कार्य करता रहेगा तो चट्टानें टूट जाएँगी । इस प्रकार भूकंप के पहले भूकंप गति बनानेवाली ऊर्जा चट्टानों में प्रत्यास्थ विकृति ऊर्जा के रूप में संचित होती रहती है । टूटने के समय चट्टानें भ्रंश के दोनों ओर अविकृति की अवस्था के प्रतिक्षिप्त होती है । प्रत्यास्थ ऊर्जा भूकंपतरंगों के रूप में मुक्त होती है । प्रत्यास्थ प्रतिक्षेप सिद्धांत केवल भूकंप के उपर्युक्त कारण को, जो भौमिकी की दृष्टि से भी समर्थित होता है ही बतलाता है ।
२. पृथ्वी के शीतल होने का सिद्धांत– भूकंप के कारणों में एक अत्यंत प्राचीन विचार पृथ्वी का ठंढा होना भी है । पृथ्वी के अंदर (करीब ७०० किमी. या उससे अधिक गहराई में) के ताप में भूपपर्टी के ठोस होने के बाद भी कोई अंतर नहीं आया है । पृथ्वी अंदर से गरम तथा प्लास्टिक अवस्था में है और बाहरी सतह ठंडी तथा ठोस है । यह बाहरी सतह भीतरी सतहों के साथ ठीक ठीक अनुरूप नहीं बैठती तथा निपतित होती है और इस तरह से भूकंप होते हैं ।
३. समस्थिति सिद्धांत– इसके अनुसार भूतल के पर्वत एवं सागर धरातल एक दूसरे को तुला की भाँति संतुलन में रखे हुए हैं । जब क्षरण आदि द्वारा ऊँचे स्थान की मिट्टी नीचे स्थान पर जमा हो जाती है, तब संतुलन बिगड़ जाता है तथा पुनः संतुलन रखने के लिये जमाववाला भाग नीचे धँसता है और यह भूकंप का कारण बनता है
४. महाद्वीपीय विस्थापन प्रवाह सिद्धांत– अभी तक अनेकों भूविज्ञानियों ने महाद्वीपीय विस्थापन पर अपने अपने मत प्रतिपादित किए हैं । इनके अनुसार सभी महाद्वीप पहले एक पिंड  थे, जो पीछे टूट गए और धीरे धीरे विस्थापन से अलग अलग होकर आज की स्थिति में आ गए । इस परिकल्पना में जहाँ कुछ समस्याओं पर प्रकाश पड़ता है वहीं विस्थापन के लिये पर्याप्त मात्रा में आवश्यक बल के अभाव में यह परिकल्पना महत्वहीन भी हो जाती है । इसके अनुसार जब महाद्वीपों का विस्थापन होता है तब पहाड़ ऊपर उठते हैं और उसके साथ ही भ्रंश तथा भूकंप होते हैं ।
रेडियोऐक्टिवता सिद्धांत– सन् १९२५ में जॉली ने रेडियोऐक्टिव ऊष्मा के, जो महाद्वीपों के आवरण के अंदर एकत्रित होती है, चक्रीय प्रभाव के कारण भूकंप होने के संबंध में एक सिद्धांत का विकास किया । इसके अनुसार रेडियोऐक्टिव ऊष्मा जब मुक्त होती है तब महाद्वीपों के अंदर की चीजों को पिघला देती है और यह द्रव छोटे से बल के कार्य करने पर भी स्थानांतरित किया जा सकता है, यद्यपि इस सिद्धांत की कार्यविधि कुछ विचित्र सी लगती है ।
संवहन धारा सिद्धांत– अनेक सिद्धांतों में यह प्रतिपादित किया गया है कि पृथ्वी पर संवहन धाराएँ चलती हैं । इन धाराओं के परिणामस्वरूप सतही चट्टानों पर कर्षण होता है । ये धाराएँ रेडियोऐक्टिव ऊष्मा द्वारा संचालित होती हैं । इस कार्यविधि के परिणामस्वरूप विकृति धीरे धीरे बढ़ती जाती है । कुछ समय में यह विकृति इतनी अधिक हो जाती है कि इसका परिणाम भूकंप होता है ।
उद्गम केंद्र और अधिकेंद्र सिद्धांत– भूकंप का उद्गम केंद्र पृथ्वी के अंदर वह विंदु है जहाँ से विक्षेप शुरू हाता है । अधिकेंद्र पृथ्वी की सतह पर उद्गम केंद्र के ठीक ऊपर का बिंदु है ।
भूकंपों की भविष्यवाणी के संबंध में रूस के ताजिक विज्ञान अकादमी के भूकंप विज्ञान तथा भूकंप प्रतिरोधी निर्माण संस्थान के प्रयोगों के परिणामस्वरूप हाल में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि यदि भूकंपों के दुबारा होने का समय अभिलेखित कर लिया जाय और विशेष क्षेत्र में पिछले इसी प्रकार के भूकंपों का काल विदित रहे, तो आगामी अधिक शक्तिशाली भूकंप का वर्ष निश्चित किया जा सकता है । भूकंप विज्ञानियों में एक संकेत प्रचलित है भूकंपों की आवृति की कालनीति का कोण और शक्तिशाली भूकंप की दशा का इस कालनीति में परिवर्तन आता है । इसकी जानकारी के पश्चात् भूकंपीय स्थल पर यदि तेज विद्युतीय संगणक उपलब्ध हो सके, तो दो तीन दिन के समय में ही शक्तिशाली भूकंप के संबंध में तथा संबद्ध स्थान के विषय में भविष्यवाणी की जा सकती है और भावी अधिकेंद्र तक का अनुमान लगाया जा सकता है
भूकंप का प्रभाव
भूकंप का प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों पर अलग अलग ढंग से पड़ता है । पेड़ गिर जाते हैं तथा बड़े–बड़े शिलाखंड सरक जाते हैं । अल्पकाल के लिये बहुधा छोटी अथवा विशाल झीलें बन जाती हैं । विशाल क्षेत्र धँस जाते हैं और कुछ भूखंड सदैव के लिये उठ जाते हैं । कई दरारें खुलती एवं बंद होती है । सोते बंद हो जाते हैं तथा सरिताओं के मार्ग बदल जाते हैं । भूकंप तंरगों का सबसे विध्वंसक प्रभाव मानव निर्मित आकारों, जैसे रेलमार्गाे, सड़कों, पुलों, विद्युत एवं टेलीग्राफ के तारों आदि पर पड़ता है । सहस्त्रों वर्षाे से स्थापित सभ्यता एवं आवास को ये भूकंप क्षण भर में नष्ट कर देते हैं । इनके कारण भ्रंशों का, विशेषकर अननुस्तरी भ्रंशों का होना बताया जाता है ।
पृथ्वी का झटका
भूकंप के कारण बहुधा मिट्टी इस तरह से फेंकी जाती है कि नदीतल के समांतर में दरारें पड़ जाती है । यहाँ पर जड़त्व गुरुत्व से अधिक महत्वपूर्ण कारण है । भूकंप से भूकंपी फव्वारे इत्यादि भी बन जाते हैं तथा पहाड़ों की ढलानों पर पड़ी हुई चट्टानें तथा अन्य चीजें वहाँ से लुढ़क कर नीचे आ जाती हैं । समुद्र में भूकंप से शुनामिस नामक तरंगें पैदा होती है । ये समुद्र में छोटे छोटे ज्वालामुखी के फूटने से, तूफान से, या दाब में एकाएक परिवर्तन होने से उत्पन्न होती है । ये जापान और हवाई द्वीपसमूह के निकट अधिक संख्या में अभिलिखित की गई हैं तथा इनसे समुद्रतटों पर बहुत क्षति होती है ।
भूकम्प से सुरक्षा के उपाय
भूकंप आना पृथ्वी की भूगर्भीय गतिविधियों का एक भाग है, जो कभी भी कहीं भी आ सकता है । यदि आप यह सोचते हैं कि जहां आप रहते हैं वो इलाका भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील नहीं है, तो आप गलत हैं । भूकंप तब आता है जब पृथ्वी के नीचे की सतह पर मौजूद प्लेटें, जिन्हें टेक्टॉनिक्स कहते हैं, खिसकती हैं । और टेक्टनॉनिक कहीं भी खिसक सकती हैं या आपस में टकरा सकती हैं । इसलिए आपको हमेशा पता होना चाहिये कि भूकंप आने पर क्या करना चाहिये । प्रस्तुत हैं कुछ टिप्स जो आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा तैयार की गई हैं–
१. भूकंप के लिए हमेशा और हर वक्त तैयार रहना चाहिये । घर बनवाते वक्त हमेशा भूकंप की दृष्टि से मजबूत घर बनवाना चाहिये, ताकि भूकंप आने पर घर पर ज्यादा असर नहीं पड़े ।
२. घर में इस प्रकार सामान रखें कि आपदा के वक्त आप आसानी से बाहर निकल सकें । यह नियम ऑफिस में भी लागू होता है । घर में फसर््ट एड किट हमेशा तैयार रखनी चाहिये । जब भूकंप आये ! जैसे ही आपको भूकंप के झटके महसूस हों, वैसे ही आप किसी मजबूत टेबल के नीचे बैठ जायें और कस कर पकड़ लें । जब तक झटके जारी रहें, तब तक एक ही जगह बैठे रहें । या जब तक आप सुनिश्चित न कर लें कि आप सुरक्षित ढंग से बाहर निकल सकते हैं ।
३. बड़ी आलमारियों से दूर रहें, यदि वो आपके ऊपर गिर गई तो आप चोटिल हो सकते हैं ।
४. यदि आप ऊंची इमारत में रहते हैं तो खिड़की से दूर रहें ।
५. यदि आप बिस्तर पर हैं तो वहीं रहें और उसे कसकर पकड़ लें । अपने सिर पर तकिया रख लें ।
६. यदि आप बाहर हैं तो किसी खाली स्थान पर चले जायें, यानी बिल्डिंग, मकान, पेड़, बिजली के खंभों से दूर ।
७. यदि आप उस समय कार चला रहे हैं तो कार धीमी करें और एक खाली स्थान पर ले जाकर पार्क कर दें । तब तक कार में बैठे रहें, जबतक झटके खत्म नहीं हो जायें ।

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