आखिर सच सामने आ ही गया

मधेश आन्दोलन से ‘अधिकार’ लेकर रहेगा अन्दाजा हो गया तो उन्हे कैसे खत्म किया जाए षड्यन्त्र तहत एमाले, राप्रपा नेपाल और एमाओवादी सहित का छोटा छोटा दल को अपने अधीन में लेकर सरकार बनाया गया है ।
कैलाश दास:मधेश आन्दोलन को अढाई महीना हो चुका । इस आन्दोलन ने विश्व में ही कीर्तिमान कायम किया है, वह भी अधिकार के लड़ाई के लिए । इतनी लम्बी लड़ाई किसी भी देश में नहीं हुई होगी यह माना जा सकता है । अपने ही देश में एक समुदाय की जनता अधिकार के लिए हर प्रकार का कष्ट सहकर भी आन्दोलन कर रही हो और उस पर सरकार द्वारा गोलियाँ बरसायी गयी होे ऐसा शायद किसी भी देश का इतिहास नहीं है, और अगर आन्दोलन का इतिहास है भी तो एकलौते शासन, सत्ता को अन्त और देश के बँटवारा के लिए । खस शासक वर्ग मधेश आन्दोलन को यथार्थवादी, विखण्डनकारी की संज्ञा देकर विश्वस्तर पर बहादुरी नही दिखाया है बल्कि लज्जा में डुबा दिया है ।
२०७२ के मधेश आन्दोलन का सबसे बड़ा धन्यवाद का पात्र नेपाली जनता भी है । वह चाहे मधेश मे रहने वाला हो वा पहाड़—हिमाल में । मधेशी जनता को अधिकार चाहिए, इसलिए वह कल–कारखाना, बाजार, यातायात, शिक्षण संस्थान यहाँ तक की अपना पेशा भी बन्द करके सड़क पर आन्दोलन में आ चुका है । जबकि खाद्य वस्रुतु से लेकररु खाद्यान्न तक नेपाल में कम पडतु से लेकर खाद्यान्न तक नेपाल में कम पड़ चुका है । दूसरे देश पर निर्भर रहे इस देश में पेट्रोलियम पदार्थ, खाना पकानेवाला गैस का अभाव तो है ही जलावन (लकड़ी) नमक, तेल तथा किराना दुकान में उपलब्ध समान भी नही मिल रहा है ।
दूसरी ओर हिमाल—पहाड़ की कुछ ऐसी भी जनता है जो खस शासक को (मधेशी को अधिकार देने से कतराने वाले अर्थात आन्दोलन विरोधी) समर्थन करते हुए आन्दोलन से प्रभावित होकर हम भूखा रह सकते है किन्तु मधेश में चल रहे अधिकार के आन्दोलन के आगे नही झुकेंगें कहते हंै । और इसी बल पर सत्ता में रहे नेकपा एमाले, एकीकृत नेकपा माओवादी, राप्रपा नेपाल सहित का दल मधेश आन्दोलन को लेकर कभी भारत विरोधी वक्तव्य देते हैं तो कभी चीन के शरण में जा कर पेट्रोलियम पदार्थ तथा गैस के लिए अनुनय विनय करते हैं । यह भी भलीभाँति मालूम है कि भारत से अलग रहकर हमें साँस तक लेना मुश्किल है । फिर भी भारत को चेतावनी और चीन के शरण में जाकर अपना देश में गृह युद्ध करवाने पर तुले है । जबकि मधेशी नेता बारम्बार दोहरा रहे हैं कि ‘मधेश की समस्या’ समाधान करे, किसी की शरण में जाने की आवश्यकता नही है ।
मधेश आन्दोलन से देश की आर्थिक स्थिति जर्जर हो चुकी है । करीबन ६० अर्ब रुपैया राजस्व घाटा है । फिर भी सत्ता पक्ष इसकी परवाह न कर आनन—फानन में देश का ही नही जनता के भी भविष्य के साथ खिलवाड़ करने पर लगे हुए हैं । बन्द, हड़ताल और आन्दोलन लोकतन्त्र की पहचान है और यह सब राजनीति तवर से जन्म लेती है । इन्हें राजनीति तवर से ही समाधान करनी चाहिए । किन्तु वर्तमान सरकार का जिस प्रकार का रवैया दिख रहा है आनेवाला कल राजनीतिक समस्या समुदायिक समस्या में परिवर्तित नही होगा कहा नही जा सकता है ।
अढ़ाई सौ वर्ष से मधेशी जनता खस शासक से शोषित, पीडि़त, दमित रहा जिस प्रकार से राजनीतिकर्मी का मुख्य एजेण्डा था आखिर आज वह मधेशी जनता के समक्ष साबित भी कर ही दिया है । मधेश में दो—दो बार आन्दोलन हुआ है, जिनमे सौ से ज्यादा लोग की मौत हुई है । फिर भी खस शासक को जिस प्रकार का पुराना ढाँचा है शोषण, दमन का उसमे परिवर्तन नही हुआ है । कहते है आन्दोलन जितना दबाओ उतना ही उग्र रूप लेता है और आन्दोलन के उग्र रूप से परिवर्तन निश्चित है । नेपाल का इतिहास साक्षी है— राणा शासन और राजतन्त्र विरुद्ध आन्दोलन हुआ था जिन्हें शासक वर्ग ने दवाने की कोशिश की थी किन्तु वह दबा नही बल्कि शासन सत्ता में परिवर्तन कर दिया । मधेश आन्दोलन भी अधिकार के आन्दोलन को छोड़कर परिवर्तन के आन्दोलन का रूप नहीं लेगा यह कहा नही जा सकता है । इसका भी प्रमुख दोषी वर्तमान खस शासक वा सत्ताधारी ही होगा ।rally birgnj
आखिर सच क्या है ?
मधेशी, दलित, जनजाति, आदिवासी थारुवान, मुस्लिम सहित के मधेश में बसोवास करनेवाले सभी खश शासकों से वर्षो से शोषित पीडि़त और दमित रहे मधेश की नई पीढी पढ़ती आ रही थी । चाहे वह राणा शासन हो या राजतन्त्र शासन । किन्तु इस बार मधेश आन्दोलन ने पूर्णरूप से साबित कर दिया है कि अभी भी मधेशी जनता खसवादी से अवहेलित, दमित और शोषित है । इसका वर्तमान उदाहरण राप्रपा नेपाल का कमल थापा, नेकपा एमाले के खड्ग प्रसाद ओली और एकीकृत नेकपा माओवादी के पुष्प कमल दाहाल बन चुके हैं ।
शाही काल में राजा की वकालत करने वाले कमल थापा गृहमन्त्री थे । उस समय तत्कालीन प्रचण्ड पथ माओवादी भूमिगत थे । भूमिगत माओवादियाें ने देश का खर्बो की भौतिक संरचना ध्वस्त कर दिया । हजारों नेपाली जनता चाहे मधेशी हो वा पहाड़ी को मार दिया गया । फिर से २०६२÷०६३ में जनआन्दोलन हुआ । वह भी १९ दिनों तक चला, उस वक्त के तत्कालीन गृहमन्त्री थापा ने १९ नेपाली जनता की हत्या करवा दिया । राजतन्त्र विरुद्ध १९ दिनों का जनआन्दोलन हुआ और राजतन्त्र को अन्त कर लोकतन्त्र आया । उसके बावजूद भी कमल थापा राजा की वकालत करना नही छोड़ा । लोकतन्त्र ने हिन्दू राष्ट्र की जगह धर्मनिरपेक्ष ला दिया । पूर्व राजा का वक्तव्य आने पर गणतन्त्र की सरकार ने कारवाही की माँग तक किया था । किन्तु राजा और हिन्दु राष्ट्र का वकालत करने वालों पर किसी प्रकार की कारवाही अब तक नही हुई है ।
दूसरा एमाओवादी जो अपने आप को सर्वहारा कहलाते थे पार्टी का अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड को जिन्हें पहाड़ी समुदाय ने संविधान सभा चुनाव में लज्जास्पद तरीके से हराया । जब कहीं से किसी प्रकार का रास्ता नही दिखा तो मधेश में आकर सफेद झूठा भाषण देकर मधेशी जनता को ढाल के रूप में प्रयोग किया । उसने सिरहा जिला निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवारी दी । भोलीभाली मधेशी जनता ने यह सोचकर कि एमाओवादी मधेशी जनता को अधिकार दिलाएगा इस विश्वास पर जिताया भी । एमाओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड जीतने के वाद भावविभोर होकर मधेश के जिलों में सफेद झूठा भाषण देना शुरु दिया कि ‘मधेश से हमें लभ’ हो गया है । जब तक मधेशी जनता को अधिकार नही दिलाएँगे सत्ता में नही जाएँगें । इसबार मधेश नेतृत्वकर्ता दल भी प्रचण्ड के चालबाज राजनीति में फस गयी । मधेश नेतृत्वकर्ता दलों ने अधिकार के लिए मोर्चा बनाया जिनका संयोजक एमाओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड को बना दिया । मधेश में आकर मधेशवादी दल के साथ एमाओवादी ने शक्ति प्रदर्शन किया और अपना स्वार्थ पूरा कर लिया ।
इधर नेकपा एमाले मधेशी जनता के उतना करीब नही होते हुए भी नयाँ रणनीति अन्तर्गत संविधान सभा चुनाव २०७० का घोषणा पत्र में उन्होंने मधेश का सभी माँग सम्बोधन करने का वादा किया । वरिष्ठ साहित्यकार खगेन्द्र संग्रोल के अनुसार एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली दक्षिण भारत अर्थात दिल्ली दरबार के सबसे करीब ही नही राँ का कार्य भी करता था । संग्रोला कहते हैं नेपाली काँग्रेस, एमाले और एमाओवादी का नेतागण दिल्ली दरबार के डिजाइन पर चलते थे । सरकार बनाने और गिराने के लिए भी वहीं जा कर अनुनय विनय करते थे ।
यहाँ तक कि २०६३÷०६४ को मधेश आन्दोलन में मधेशी मोर्चा और सरकार के साथ हुए सम्झौता में गवाह के रूप में भारत को रखा गया था । आज भारत के नजदीक रहकर सबसे ज्यादा फायदा लेनेवाला खसवादी शासक जब नेपाल—भारत सीमा नाका को मधेशी दल अवरुद्ध किया है तो नाका अवरुद्ध हटाने में भारत से सहयोग माँगा । इस पर भारत का जवाब आया कि यह आपकी आन्तरिक समस्या है, आप अपनों नागरिक की समस्या समाधान करे कहने पर भारत उपर आलोचना की बोरिया खोल दी है और चीन के शरण में जाने लगे है ।
‘नेपाल का संविधान २०७२’ आषाढ ३ गते नेपाली काँग्रेस, नेकपा एमाले, एमाओवादी सत्ता पक्ष ने मधेश और मधेशी जनता को अधिकार से वञ्चित कर दिया है । जबकि संविधान लाने से पहले इन्हीं दलों ने १६ बुँदे सम्झौता कर फास्ट ट्याक नामाकरण कर संविधान लाने की साजिश रची उसका भी मधेश में जोरशोर से विरोध किया गया । विरोध के वावजूद भी सेना और पुलिस के बल पर मसौदा तैयार किया गया जिन्हें मधेशी जनता ने बहिष्कार ही नही किया उसे जलाया भी । कहने का मतलव विभेदकारी संविधान को मधेशवादी दल ही नही जनता भी प्रारम्भ से ही विरोध करते आ रहे है ।
मधेश आन्दोलन से ‘अधिकार’ लेकर रहेगा अन्दाजा हो गया तो उन्हे कैसे खत्म किया जाए षड्यन्त्र तहत एमाले, राप्रपा नेपाल और एमाओवादी सहित का छोटा छोटा दल को अपने अधीन में लेकर सरकार बनाया गया है । डेढ महीना तक मधेश में आन्दोलन होने के वाद भी सरकार ने अनभिज्ञता प्रकट किया तो मधेशवादी दलों ने भारत का नाका अवरुद्ध किया । करीबन एक महीना से ज्यादा नाका अवरुद्ध होने पर खस मानसिकता की सरकार भारत विरुद्ध वक्तव्यबाजी कर भारत और मधेशी जनता के बीच रहे बेटी रोटी के सम्बन्ध को तोड़ने का प्रयास कर रहे है । वर्षो से अधिकार से वञ्चित मधेशी जनता अधिकार के अन्तिम कड़ी पर पहुँचने पर सभी शासक एक हो चुके हंै । भले ही जितनी गलती किया हो पर जब आज मधेश को देने का सवाल आया है तो ये सभी एक होकर मधेश की जनता को दरकिनार करने पर लगे हुए हैं । पर शायद ये नहीं जानते कि अब ऐसा करना आसान नहीं होगा क्योंकि मधेश और मधेश की जनता अपने अधिकारों के प्राप्ति सजग हो चुकी है आज नहीं तो कल इन्हें उनका अधिकार देना ही होगा ।

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